कमलेश भारतीय की चार लघुकथाएं

राजनीति के कान

‘मंत्री जी, आपने बड़ा कहर ढाया है’

‘किस मामले में भाई ?’

‘अपने इलाके के एक मास्टर का ट्रांसफर करके’

‘अरे , वह मास्टर ? वह तो विरोधी दल के लिए भाग दौड़….’

‘क्या कहते हैं , हुजूर ?’

‘उस पर यही इल्जाम हैं ।’

‘जरा चल कर कार तक पहुंचने का कष्ट करेंगे ?’

‘क्यों ?’

‘उस मास्टर को देख लीजिए,,,,वह चल कर आप तक तो पहुंच नहीं सकता,,,,बदकिस्मती से उसकी एक टांग बेकार है,,,,,और भाग दौड़ करना उसके बस की बात कहां ? जो अपने लिए भाग दौड़ नहीं कर सकता , वह किसी के लिए क्या भाग दौड़ करेगा ?’

‘अच्छा भाई , तुम तो जानते हो कि राजनीति के कान कच्चे होते हैं, आंखें तो होती ही नहीं, कानून की तरह,,,,खैर, मैं इस गलती को दुरुस्त करवा दूंगा ।’

खिसियाये हुए मंत्री जी ने कहा जरूर, पर आखों में कहीं भी पछतावा नहीं था ।

सबसे बड़ा क्या ?
वे हमारे परिचित हैं । लगभग रोज ही अपने परिवार की उलझनों के बारे में बात करते ही रहते हैं ।एक दिन शाम को हम लोग उनके घर गए । उनकी धर्मपत्नी बहुत उदास दिखीं । धीरे-धीरे बताया कि उनकी बहू अलग होकर मकान के ऊपरी हिस्से में रहने लगी है ।उनकी आखों में आंसू झर झर बह रहे थे ।उस दिन वे दुनिया की सबसे दुखी महिला लगी। हमने भी आज के जमाने को बुरा-भला कहा। कुछ दिन बाद गये तो उनकी पत्नी खूब चहक रही थी ।कारण उनकी बेटी ने ससुराल में अपनी सास से अलग होकर किराए का मकान ले लिया था ।आज वे दुनिया की सबसे सुखी मां लगा रही थीं । हमें समझ नहीं आया कि उनकी कौन सी वजह सही थीं ? जमाना भी वही था और जमाने के लोग भी ।
स्वाभिमान
सुबह सबेरे अखबार बांटने जब एक छोटा-सा लड़का आने लगा तब मन में उत्सुकता जगी कि पूछ लूं कि पढते लिखते क्यों नहीं ? या पापा पढाते क्यों नहीं ? इस कंपकंपाती सर्दी में जब बच्चे रजाई से बाहर नहीं निकलते तब वह अखबार बांटने क्यों और किन मजबूरियों में निकलता है । एक दिन जैसे ही वह अखबार फेंक कर चलने लगा तब मैंने रोक कर पूछा, ,रूकना , ओ लडके । ,,,,,, कहिए ।
क्या स्कूल पढ़ने नहीं जाते ?
जाता हूं और नौवीं में पढता हूं ।
फिर तुम्हारे पापा तुम्हें इस काम के लिए क्यों भेजते हैं ?कल मैं तुम्हें कुछ नोटबुकस देना चाहता हूं ।
क्यों ? मैं खुद कापियां ले सकता हूं, सर, । जो नहीं ले सकते , उन्हें दीजिए न , सर ।
इतना कहकर उसने पैडल पर पांव जमाया और अखबार बांटने चल दिया ।
शर्त
युवा समारोह में श्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार जीतने वाली कलाकार अभिनय से अचानक मुख मोड़ गयी । क्यों ? यह सवाल पूछा तब उसने ठंडी आह भर कर बताया कि सर, नाटक निर्देशक मुझे स्टूडियो मे कदम रखने से पहले कहने लगे कि अंदर जाने से पहले शर्त यह है कि शर्म बाहर रखनी होगी । बस, मेरी कला शर्मसार होने से पहले घर लौट आई ।

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