ऐसे होते हैं हमारे पहले के कवि


जबलपुर में कवि मलय से मुलाकात पर लिखा है डॉ करण सिंह चौहान ने

अजीब बात थी कि मध्यप्रदेश के अधिकांश शहरों में जाना हुआ लेकिन जबलपुर में जाना यह पहली बार हुआ । और जाना भी क्या ऐसा-वैसा ! अपने वरिष्ठ कवि मलय का सम्मान करने के लिए जाना । यह गौरव की बात हुई ।

मलय वैसे तो नब्बे पार कर चुके हैं पर उनसे मिलना शायद पहली बार हो रहा था । यूँ कहीं सभा-गोष्ठी में हुआ हो तो अब ठीक से याद नहीं ।

शहर में प्रवेश करते ही इस बात का अहसास हो जाता है कि हमारी पहली पीढ़ी के ये लोग किसी और मिट्टी के बने हैं । जैसे ही मैंने रेलगाड़ी से उतरकर अलस्सुबह लगभग छः बजे जबलपुर की धरती पर पैर रखा तो सबसे पहले उनका ही फोन आया और पूछा कि क्या मैं सकुशल पहुँच गया हूँ ! सर्दियों की सुबह में छः बजे तो अँधियारा होता है जब लोग अक्सर बिस्तर की गरमाई में ही दुबके रहना चाहते हैं । उसपर मलय तो रिटायर हैं और नब्बे साल के हैं ।

यानी उन्होंने कहीं से मेरा नंबर लिया होगा, कौन सी गाड़ी से कब आ रहा हूँ यह मालुम किया होगा और इतने सवेरे गाड़ी पहुँचने का इंतजार कर रहे होंगे कि कब गाड़ी पहुँचे और वे फोन से दरयाफ्त करें ।

ऐसा प्रेम और ममत्व तो अब आत्मीयों में भी नहीं रह गया है ।

फोन से ही उन्होंने होटल का रास्ता समझाया और कहा कि वहाँ जाकर दैनिक क्रियाओं से निवृत्त हो कुछ देर आराम कर लूँ तभी वे वहाँ आएंगे ।

मैंने कहा कि अभी आने का कष्ट न करें क्योंकि मैं आज का दिन शहर और उसका आसपास देखने में बिताना चाहता हूँ । वहाँ से आकर शाम को या कल सुबह इत्मीनान से उनसे भेंट होगी । तब तक बाकी लोग भी आ चुके होंगे ।

मुझे शहर में नया आया समझ उन्होंने विस्तार से देखने वाली जगहों के बारे में बताया और कहा कि अगर फिर भी कोई दिक्कत हो तो वे स्वयं मुझे उन स्थलों पर लेकर जाएंगे । यह तो उनके साथ अन्याय होता इसलिए होटल में सामान रख और स्नान कर मैं स्वयं उनके बताए रास्ते और वाहनों पर सैर को निकल पड़ा । उनमें सबसे पहला तो था शहर से लगभग २0-२५ किलोमीटर दूर भेड़ाघाट, जहाँ नर्मदा नदी के ऊपर से गिरते झरनों का मनोहारी दृश्य है । साथ ही पंचवटी का नौका विहार ।

वे लगातार फोन करते रहे कि कहीं मैं भटक न जाऊँ ।

इसमें शाम को काफी देर हो गई । मेरे होटल पहुँचते ही वे वहाँ तुरत पहुँच गए । नब्बे वर्ष के इस कवि में ऐसी तत्परता, स्फूर्ति, गहरा ममत्व देखकर हैरान ही हुआ जा सकता था ।

रात को अन्य मित्र भी आ गए । बैठे-बैठे मुक्तिबोध के पुनर्मूल्यांकन प्रसंग पर चर्चा चल गई । उनके चेहरे पर बढ़ता आवेश स्पष्ट दिखाई दिया कि वे इस तरह के प्रयासों से प्रसन्न नहीं हैं । वे मुक्तिबोध के साथ रहे हैं और उन्हें आज भी वैसे ही मानते हैं जैसा महत्व हिंदी साहित्य ने उन्हें दिया है । यह भी लगा कि वे इस बीच हो रही बहसों की पूरी जानकारी रखते हैं और किस पक्ष से कौन क्या कह रहा है, इसे खूब समझते हैं ।

कुछ मित्रों ने जब मुक्तिबोध के प्रति भक्तिभाव की चर्चा की और इस स्थिति को बदलने पर जोर दिया तो मलय जी काफी देर तक तर्काधारित विवेचन करते रहे । उनका वक्तव्य, कहन के पीछे का आवेग, आत्मीयता से उपजी गहरी संवेदना किसी भी तर्क पर भारी पड़ रही थी । बहस में ऐसी ऊर्जा दर्शनीय थी ।

देर रात में बहस जब बंद हुई तो मलय जी बहुत ही विनम्र स्वर में सबसे माफी माँगते हुए कह रहे थे –
“ देखिए भाई, हम तो पुराने आदमी हैं, अब बदल भी नहीं सकते । मुक्तिबोध या अन्य साथियों के बारे में हमारे जो विचार हैं वे स्थिर और दृढ़ हैं । उनपर कोई चोट करे तो हमसे बर्दास्त नहीं होता । आवेश में अगर कुछ गलती हो गई हो तो माफ कर दीजिएगा । वैसे भी मैं समीक्षक तो हूँ नहीं ।“

आज के दंभ से अफरे इस जमाने में ऐसी विनम्रता हतप्रभ करने वाली है ।
अगले दिन सुबह सभी लोग उनके घर नाश्ते के लिए गए । उन्होंने बताया कि पत्नी के न होने से दोनों बेटे (जो स्वयं रिटायर हैं) सब काम करते हैं ।

एक श्रमजीवी लेखक के छोटे से ड्राइंगरूम नुमा उस कमरे में इतने लोगों के बैठने की जगह नहीं थी । वे बड़े उत्साह से कुर्सियाँ लाकर लगा रहे थे, खाने-पीने की चीजें रसोई से उठाकर ला रहे थे और अपने हाथ से डाल रहे थे ।

और यह सब करते हुए उनके चेहरे और हाव-भाव से प्रसन्नता छलक रही थी जैसे इन साहित्यिक अतिथियों की सेवा करके उन्हें अपार संतोष और आनंद मिला है । किसी को कुछ करने ही नहीं दे रहे थे ।

ऐसे हैं हमारे ये पायेदार पहले के लेखक ! उनसे इतना प्यार पाकर मन अंदर तक भीग जाता है ।

ऐसे कवि का सभा में सम्मान कर हम स्वयं और वहाँ उपस्थित समाज सम्मानित महसूस कर रहे थे । इसके लिए पूरी “लहक” टीम को एक बार पुनः बधाई कि वे इस कार्य को संपन्न कर रहे हैं और लगभग भुला दिए अपने इन शीर्ष लेखकों पर पुनः ध्यान केंद्रित कर रहे हैं ।

इस अवसर पर “लहक” पत्रिका में संपादकीय स्वरूप मलय जी पर छपा परिचयात्मक विवरण यहाँ दिया जा रहा है –

मलय

नवंबर १९, सन १९२९को तत्कालीन मध्यप्रदेश (अब छत्तीसगढ़) के जबलपुर जिले के गाँव सहशन में जन्में हिंदी के कवि मलय अब ९० साल को होने आए हैं । उस जमाने में उनका साहित्य में जो रुतबा रहा या समकालीन लेखकों ने उन्हें जो सम्मान दिया उसको याद करने पर एक महत्वपूर्ण लेखक कवि के रूप में मलय का व्यक्तित्व उभरता है ।

मुक्तिबोध के साथ उनके निकट के संबंध रहे और उनसे लगातार पत्र व्यवहार रहा । उस समय के ख्यात लेखक श्रीकांत वर्मा ने उनकी पुस्तक की भूमिका लिखी । तबसे लेकर आज तक बिना अंतराल के वे साहित्य साधना में लीन रहे हैं ।

ऐसे लेखक के परिचय की किसी भाषा में दरकार हो, इसे उस भाषा और साहित्य का अँधेरा काल ही माना जा सकता है । लेकिन यह पहले भी हुआ है और आज भी हो रहा है । विज्ञापन, आत्म-विज्ञापन, कैरियरवाद और प्रचार अभियानों, साहित्यिक वादों और प्रतिवादों की राजनीति और रणनीति के चलते इधर काफी कुछ ऐसा घटित हो रहा है जिसमें रचना और रचनाकार से अधिक महत्व साहित्येतर सरोकारों और षढ़यंत्रों को मिलने लगा है ।

इसी संदर्भ में मलय जैसी जिजीविषा के लेखक की मौन में निरंतर की गई साहित्य साधना को साहित्य के केंद्र में ले आना एक बड़ा सार्थक हस्तक्षेप कहा जा सकता है ।

मलय ने लेखक कमलाप्रसाद को समर्पित ‘मुक्त रंग’ संस्था द्वारा बनाए गए कविता पाठ के वीडियो सीरीज में अपनी साहित्य यात्रा का परिचय देते हुए कहा है –

“ हुआ ये कि मैं जब गाँव में था तो मेरा लिखना-पढ़ना छुड़वा दिया गया । तो मैं बहुत विषाद में आ गया । तब मैंने अनजाने-जाने कविता लिखना शुरू किया । फिर १९५२ के चुनाव के बाद मुझे परिवार के साथ जबलपुर आना पड़ा । यहाँ पर मुझे लिखने का माहौल तो मिला ही, उसके साथ रामकृष्ण श्रीवास्तव, जीवनलाल विद्रोही, स्वयं मुक्तिबोध और हरिशंकर परसाई और और लोग भी मिले । क्योंकि ये सारे लोग प्रतिबद्ध लोग थे इसलिए स्वाभाविक रूप से ज्ञान और संवेदना के सहारे मैं भी बराबर जो दुखी जन हैं, उनकी ओर बढ़ गया । इस तरह प्रतिबद्ध लोगों के संपर्क में आने से मैं भी कविता लिखना सीखने लगा ।“

इस विनम्र आत्म-परिचय के बाद यू-ट्यूब के इस वीडियो में उनकी अपनी आवाज में उनकी महत्वपूर्ण १५ कविताओं का दुर्लभ पाठ है जिसे सभी कविता प्रेमियों को सुनना चाहिए ।

मलय के कविता संग्रहों में ‘हथेलियों का समुद्र’, ‘ फैलती दरार में ‘, ‘शामिल होता हूँ’, ‘अँधेरे दिन का सूर्य’, ‘निर्मुक्त अधूरा आख्यान’, ‘लिखने का नक्षत्र’, ‘काल घूरता है’ प्रमुख हैं । इसके अतिरिक्त एक कहानी-संग्रह ‘ खेत’ तथा आलोचना-पुस्तक ‘सदी का व्यंग्य’ है । उन्हें भावानी प्रसाद मिश्र पुरस्कार, भवभूति अलंकरण, चंद्रावती शुक्ल पुरस्कार, रामचंद्र शुक्ल पुरस्कार से नवाजा जा चुका है । २०१७ में उनपर शिल्पायन से ओम भारती द्वारा संपादित ‘जीता हूँ सूरज की तरह’ पुस्तक आई है जिसमें मुक्तिबोध के पत्र के साथ ही लगभग ५० लेखकों के लेख और साक्षात्कार हैं जो उन्हें समझने के लिए एक अच्छी किताब है । इधर सुना है कि किसी प्रमुख प्रकाशन से उनकी रचनावली का प्रकाशन हो रहा है ।

हिंदी जगत एक ऐसे लेखक का सम्मान कर रहा है और उनके अवदान को सामने ला रहा है । उनके व्यक्तित्व और रचनाकर्म के समग्र मूल्यांकन की यह अच्छी शुरूआत है । फिलहाल उनके संबंध में सामाजिक माध्यम पर जो चर्चा लेखकों के बीच हुई है, उसके कुछ अंशों को सबके लिए प्रस्तुत करना बहुत प्रासंगिक है –

कवि विजेंद्रः अपने प्रिय कवि मलय को हार्दिक शुभकामनाएँ । वे बराबर सक्रिय रहें…..कुछ दिन पूर्व जब मैंने सुना कि वे ९० वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं तो मैंने फोन पर उन्हें बधाई दी । वे बहुत प्रसन्न थे … एक बार किसी कार्यक्रम में उनसे जयपुर में मिला भी हूँ, बहुत सरल और सहृदय कवि हैं…हिंदी समीक्षा का यह दुर्भाग्य ही है कि उनकी तरफ अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया ।

उमाशंकर परमारः अपने समय की तीन बड़ी मेधाओं मुक्तिबोध, श्रीकांत वर्मा तथा हरिशंकर परसाई के आत्मीय हाते में रहे रचनाकार हैं ।… मलय को मान मिलता था लेकिन विशिष्ट कवियों में मानने का किसी को ध्यान न था ।

अजीत प्रियदर्शीः मुक्तिबोध के संगी मलय की कविता में जीवन के रंग, दुख, संग, जिजीविषा, अनूठे अनुभव और कहन, सहजता का आकाश है ।

मलय की कविता में बीहड़ अनुभव हैं और पूँजीवादी सत्ता की सच्चाई तल्ख रूप में आई है । मगर हाय रे जमाने के मीडियाकर आलोचकोँ-संपादको, तूने मलय को हमेशा किनारे लगाया ।

भरत प्रसादः मलय जी किनारे कहाँ हुए । कई प्रतिष्ठित प्रकाशकों से प्रकाशित सुपरिचित हस्ताक्षर हैं । उनकी रचनावली आ रही है । हाँ, उन्होंने जितना लिखा और दिया, शायद हिंदी साहित्य जगत ने उतना दिया नहीं ।

ओम भारतीः सालों-साल मलय ने एकदम अपनी शर्तों पर कविता की है और हमारे उनमें अनेक पाठ छुपे हुए हैं । …हिंदी कविता में लगभग असाध्यवीणा मान लिए गए मलय को समझने-समझाने के प्रयत्न नगण्य ही कहे जाएँगे ।…मलय हिंदी के वयश्रेष्ठ कवियों में एक ऐसे ध्रुवांत पर कार्यरत हैं जिनकी प्रकृति और कविताओं, दोनों का स्वरूप समकालीनता के संकीर्ण दायरे में नहीं अँट पाता ।

कात्यायनीः जीवन का कलात्मक पुनर्सृजन करते हुए मलय उज्ज्वल भविष्य का अकर्मक मध्यवर्गीय यूटोपिया या इकहरे, सरलीकृत, नियतत्ववादी आशावाद का व्यामोह नहीं रचते । कहीं ब्रेष्टीय असंपृक्तता के साथ वस्तुगत यथार्थ के द्वंद्वों को प्रस्तुत करते हुए, तो कहीं आत्मिक जगत की तरल, थरथराती सतह पर परावर्तित होती उनकी आवेगमय छवियों को आँकते हुए, मलय की कविता सत्ता, समाज और संस्कृति 
की गतिकी को समझने की और भविष्य-संकेत देने की कोशिश करती है ।

मलय के व्यक्तित्व और रचना पर की गई टिप्पणियों के ये अंश उनकी कविता के मूल्यांकन का प्राथमिक खाका प्रस्तुत करते हैं जिनको विस्तार में जाकर उनके रचनाकर्म का मूल्यांकन किया जा सकता है । अब समय आ गया है कि उनकी लंबी कविताओं, यथा ‘वसंत खुली आँखों में’, ‘सतह और जल’, ‘अनसुनी आहट में नहाकर’, ‘निर्मुक्त आकाश’ आदि और बाकी अन्य कविताओं का पुनः पाठ हो ।

यहाँ हम उनकी बहु-प्रशंसित और बहु-उद्धृत कविता ‘कैसे छोड़ दूँ यह दुनिया’ को पुनः पाठकों के लिए दे रहे हैं –

कैसे छोड़ दूँ यह दुनिया

मैं इतनी जल्दी
कैसे छोड़ दूँ
यह दुनिया !
अभी सूखती नदियों की तरह
उदास खड़ी हैं बहनें
भाई फटे गमछे से
बाँधे है कान !

और हिमालय बर्फ़ से जमा देना चाहता है
शरीर की सारी गंगोत्रियाँ
मेरी माँ बुहारती है ज़िन्दगी
साँसे जिस्म की कौंधती बिजली की तरह
चीरती हैं भाषा तक
शब्द फूटते फुग्गों की तरह
चिथड़ों में उड़ जाते
रोज़-रोज़ होती मौत
भूखे बच्चे की
सीने में लगती बेकारी की गोली से
भाई काँखता नहीं !
मैं चीख़ता नहीं क्यों ?

पुकारता हूँ
मेरा गाँव मेरा मुहल्ला
मरघट के पास मिली ज़मीन
कॉलोनी
धँसी हुई आँखों में
सामने उड़ती हैं
झालर-झालर चिंदियाँ !
पेड से चिरी-गिरी डालों की तरह
सूखती लटकती भुजाएँ
सुरंग से तोड़े गए
पत्थरों की तरह
चिल्पा-चिल्पा चिथड़ा एहसास
चुभते हैं
चुभते हैं फूल से
तोतली बोली बिलते
बच्चों की हथेलियों पर
उगे हुए काँटें
धूल भरे बिस्तरों पर
थका हुआ प्यार
पर तकिए में छुपे हुए धड़कते संकल्प
चुभते हैं
गंजी में चिपके हुए साग के टुकड़े
पर भूखी बुहनियों की त्वचा पर
जैसे कोई फूँक-फूँक
जगाता है प्यार
रचता है सार
एक हिमालय से ऊँची चढ़ाई 
चढ़ना है मुझे
साथ दोगे क्या ?
कटोरी के पानी के पार
जाना है हमें
मैं छोड़ नहीं सकता ये दुनिया
इतनी जल्दी कैसे छोड़ दूँ ये दुनिया !!

डॉ करण सिंह चौहान के फेसबुक वॉल से साभार

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