अपने समय को रेखांकित करती कहानियां : कथा कहानी की 11वीं गोष्ठी

हरियश राय की रिपोर्ट

दिनांक 15 जून, 2019 को गांधी शांति प्रतिष्ठान में कथा – कहानी की ओर से एक कथा गोष्ठी का आयोजन किया गया . गोष्ठी की शुरुआत में कथा कहानी के संयोजक हरियश राय ने सभी का स्वागत करते हुए कहा कि कथा कहानी का मकसद हमारे समय में लिखी जा रही उन कहानियों को रेखांकिंत करना है जिनमें हमारे समय और समय के अंतर्विरोधों की गूंज हो. इस गोष्ठी में मधुसूदन आनंद ने अपनी कहानी ‘ बुद्धा ’ प्रियदर्शन ने अपनी कहानी ‘अदृश्य लोग’ व आकांक्षा पारे काशिव ने अपनी कहानी ‘नीम हकीम’ का पाठ किया 

आकांक्षा पारे की कहानियों पर बोलते हुए योगेन्‍द्र आहूजा ने कहा कि उनकी कहानियों के शीर्षक आकर्षक ही नहीं वरन खुद में एक मुकम्‍मल कहानी होते हैं. उनकी कहानियों में आज का ही नहीं सिर्फ अभी का वक्‍त होता है, बल्कि तत्काल होता है जिसे रचना में पकड़ पाना सबसे मुश्किल होता है. इसलिए तत्काल कभी स्थिर या जड़ित या टिका हुआ नहीं लगातार बदलता हुआ होता है और हमारे समय में तो और भी तेजी से बदलता है. यह कहानी हमारे जीवन के इस लक्षण को रेखांकित करती है कि हमारे समाज के सर्वाधिक पुरातनपंथी हिस्से में आभासी दुनिया में प्रवेश करने की हड़बड़ी सबसे ज्यादा है. कहानी में पिता और पुत्र दो पात्र तंत्र मंत्र टोटके का स्वांग रचते हैं और तर्क और विवेक से कोसों दूर रहते हैं. उन्‍होंने कहा कि आभासी दुनिया हमारे रिश्तों और व्यवहार का जो ध्वंस कर रही है उस पर आकांक्षा जी की बहुत पैनी नजर है . प्रियदर्शन की कहानी अदृश्य लोग के बारे में उनका मानना था कि यह कहानी हममें से बहुत सारे लोगों की कहानी है जो देखकर भी नहीं देखते. इस कहानी ने मुझे तीखा एहसास कराया है कि अपने भीतर से स्‍वर्णत्‍व को खुरच – खुरच कर निकालने की तमाम कोशिशों के बावजूद शायद उसका अवशिष्ट बाकी है. मधुसूदन आनंद की कहानी के बारे में उनका मानना था कि इस कहानी में तमाम परतें और तहें हैं लेकिन यह कहानी उस तरह की कहानी है जो अपने सारे मायने एक साथ नहीं खोलती . कुछ खोलती है कुछ मुट्ठी में बंद कर लेती है. उन्‍होंने कहा कि यह कहानी उन प्रवासियों की कहानी है जिनके लिए बुद्धा के मायने बुद्ध या उनके संदेश नहीं बल्कि एक प्रतिमा है और जिनके लिए बुद्ध केवल एक सजावटी आइटम है . यह कहानी उपभोगवाद के जबड़े में फंसे जीवन पर,ऐसे समुदाय की सांस्कृतिक विपन्‍न्‍ता पर, उनकी सरोकार विहीनता पर एक तीखी टिप्‍प्‍णी करती है.
इन कहानियों पर टिप्पणी करते हुए कथन पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय ने कहा कि मधुसूदन की कहानी एक मुकम्मल कहानी है क्योंकि चीजें जहां शुरु होती हैं उससे आगे बढ़कर एक अंत तक पहूंचती हैं. कहानी में एक दंव्द भी है . मनोज के चारों ओर जो पात्र है वह अलग अलग सिरों पर है . चालीस साल पहले लिखी होने के बावजूद भी यह आज की कहानी है क्‍योंकि संबंधों में भावनाओं का दोहन दिखाई देता है . वह दोहन कहानी में उभर कर नहीं आता सिवाय अंत के जहां लेखक अपनी ओर से कहता है कि वह हंसी निर्मल हंसी नहीं थी और वही कहानी कंपलीट हो जाती है . प्रियदर्शन की कहानी पर बोलते हुए संज्ञा उपाध्याय ने कहा कि प्रियदर्शन सामाजिक सरोकार वाले कहानीकार हैं और उनकी कहानियां रोजमर्रा के सवालों को सामने रखती हैं . उन्‍होंने कहा कि कहानी में एक ऐसी व्‍यवस्‍था है जो बहुसंख्यक जनता का स्पेस कम कर रही है . कहानी में तीन तरह के पक्ष रखे गये हैं और ये तीनों पक्ष यथास्थिति को बनाए रखने वाले हैं और मशीनरी का पुर्जा बने हुए हैं, पर दूसरे छोर पर रमेश सिंह है जो अपने हक के लिए आवाज उठाता है. संज्ञा उपाध्याय ने कहानी का विस्‍त्तृत विश्‍लेषण करते हुए कहा कि उनकी कहानियों में मैं अक्‍सर आता है जो मध्‍यवर्गीय स्‍वर्ण है, पढ़ा लिखा है और जिसे जातीय दंश नहीं सालता . उन्‍होंने इस कहानी का सदिच्छा वाली कहानी मानते हुए कहा कि जीवन में जो स्थितियां नहीं हैं, कहानी में वो स्थितियां गढ़ी जा सकती हैं. आकांक्षा पारे की कहानी के बारे में उनका मानना था कि कहानी में हास्यास्पद ढंग से स्थितियों को उभारा गया है . कहानी में यह बखूबी आया कि किस तरह से एक परम दकियानूसी व्यक्ति आधुनिक तकनीक के माध्यम से पुरातनपंथी विचारधारा का इस्तेमाल करता है. कहानी की इस पंक्ति ‘’ आप उन्हें ग्राहक समझते हैं मैं उन्‍हें मतदाता की तरह मूल्यवान’’ से बड़े मिश्रा की भविष्य की योजनाओं का पता चलता है जो कहानी की ताकत है . कहानी में दो पात्रों के माध्यम से कहानी में स्थितियों को उभारा गया है. उनका मानना था कि हमारे समाज में जो अज्ञान और अतार्किकता मौजूद है उसे तोड़ने के बारे में कोई टिप्‍प्‍णी कहानी में नहीं है .उनका यह भी मानना था कि कहानी में यदि व्‍यंग्‍य होता और स्थितियों में एक अंतर्विरोध होता तो कहानी और भी बेहतर होती.
शंकर ने मधुसूदन आनंद की कहानी पर बोलते हुए कहा कि कहानी पात्रों के व्यवहार में नहीं है वरन दो स्थलों पर बनती है. एक स्थल वह है जहां एक पात्र कहता है कि हम भारतीयों की पहचान बुद्ध है और दूसरा स्थल वह है जहां एक पात्र कहता है कि दुनिया में तीन ही धर्म हैं जिनका प्रभाव पूरे विश्व पर पड़ा इस्लाम ,क्रिश्चिनियेटी ,बौद्ध . कहानी में बुद्ध का जो प्रसंग है वह कहानी की आत्मा है . कहानी जर्मनी में घटित होती है जहां दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हुई थी. वहां बुद्ध की चर्चा का मतलब शांति की चर्चा से है . शंकर ने भीष्म साहनी के इस कथन का उल्लेख किया कि सारी बातें कहानियों में नहीं कही जा सकती कुछ बातें पाठकों पर भी छोड़ दी जानी चाहिएं. कहानी में बुद्ध के माध्यम से युद्ध और साम्राज्यवाद का निषेध किया गया है . जिस मूर्ति को तालिबानियों ने ध्वस्त कर दिया कहानी बुद्ध की उसी मूर्ति को फिर से स्थापित करती है. यह कहानी इसलिए भी प्रासंगिक है कि आज के समय में जितना उन्माद है उसे शांत करने के लिए हमारे पास बुद्ध और गांधी ही हैं . इस कहानी में युद्ध के विरोध में बुद्ध के माध्यम से शांति और अहिंसा का प्रतीक खड़ा किया गया है. आकांक्षा पारे की कहानी के बारे में शंकर का मानना था कि कहानी की ताकत कहानी का खिलंदड़ापन होना है. इस खिलंदडपन के माध्यम से दोनों पात्रों की वास्तविकता को सामने लाया गया है. कहानी में बड़े मिश्रा जी की भावी योजना का संकेत है जो कहानी की उपलब्धि है. प्रियदर्शन की कहानी के बारे में उनका मानना था कि कहानी में दो स्थितियां एक साथ चलती हैं एक स्थिति है दलितों की, उनके शोषण की और दूसरी स्थिति एक मध्‍यवर्गीय व्यक्ति की. दोनों स्थितियों के बीच में मैं का दंव्द है. मध्‍यवर्गीय व्यक्ति के प्रति आलोचनात्मक दष्टिकोंण इस कहानी में है . 
इन तीनों कहानियों पर टिप्‍प्‍णी करते हुए रमेश उपाध्याय ने कहा कि तीनों कहानियां अलग होते हुए भी एक बिंदु पर समान हैं, वह है व्यंग्य का प्रयोग। आकांक्षा पारे की कहानी में व्यंग्‍य है जो कहानी के लिए अच्छी चीज है. कहानी और भी अच्छी हो सकती थी अगर यह पता चलता कि कहानी के पात्रों की राजनीति क्या है. प्रियदर्शन की कहानी को एक मुकम्‍मल कहानी माना है .उनका मानना था कि यह कहानी ‘ मैं ‘ की कहानी नहीं है बल्कि मैं के प्रति आलोचनात्मक दष्टिकोण की कहानी है. मध्‍यवर्गीय व्यक्ति सहानुभूति तो दिखाता है लेकिन करता कुछ नहीं है. इस विडम्‍बना को कहानी में बेहतर तरीके से उभारा गया है . मधुसूदन की कहानी में एक व्‍यंग्‍यात्‍मक दृटिकोंण है. कहानी में पात्रों के माध्यम से व्‍यंग्‍य बेहतर तरीके से आया है .
आकांक्षा पारे की कहानी के बारे में संजीव कुमार ने कहा कि पोंगापंथी की आलोचना ही कहानी की ताकत है. व्‍यंग्‍य कहानी की शक्ति है . कहानी को नरेटिव के हस्तक्षेप के माध्यम से उभारा गया है . कहानी में एक प्रतिरोध है और यह कहानी प्रतिरोध की ताक़तों के साथ खड़ी होती है. प्रियदर्शन की कहानी हम सब लोगों की कहानी है जो अजीब तरह के स्पेस में है . संजीव कुमार ने कहा कि यह कहानी नहीं बल्कि स्‍टोरी आइडिया है. प्रियदर्शन की कहानी के बारे में नूर जहीर का मानना था कि यह कहानी मुझे आईना दिखाने वाली कहानी लगी. यह एक डर की कहानी है. मधुसूदन आनंद की कहानी के बारे में उन्‍होंने कहा कि बुद्ध की मूर्ति दिए जाने पर लोग मुकम्‍मल और कुटिल हो जाते हैं. सुधांशु गुप्ता का मानना था कि प्रियदर्शन ने जो कहानी का अंत किया वही न्यायिक अंत है और कहानी में व्यवसायिक मजबूरियां हॉवी हैं और मधुसूदन आनंद की कहानी मनोज के अपराध बोध की कहानी है . राजकमल ने प्रियदर्शन की कहानी को दलित विमर्श की कहानी मानते हुए कहा कि प्रियदर्शन अपने आस पास के पात्रों को ही कहानी में उठाते हैं. इस कहानी में वे अनदेखे लोग हैं जो उच्च मध्‍यवर्गीय घरों में दिखाई देते हैं जिन्हें हम नजरअंदाज करते हैं .मधुसूदन आनंद की कहानी प्रवासियों की जीवन शैली की कहानी है. अंजु शर्मा का मानना था कि आकांक्षा पारे की कहानी एक खास शिल्प की कहानी है . कहानी तकनीक पर घुसपैठ करती है. प्रियदर्शन की कहानी को अंजु शर्मा ने एक मुकम्‍मल कहानी मानते हुए कहा कि कहानी अनुपस्थित चीजों को उपस्थित करती है और मधुसूदन की कहानी जीवन के ठहराव की कहानी है. हीरालाल नागर ने मधुसूदन की कहानी पर बोलते हुए कहा कि यह कहानी युद्धों के खिलाफ है और इस कहानी में बुद्ध एक प्रतीक के रुप में आते है . इस गोष्ठी में महेश दर्पण, सुभाष अखिल,वंदना गुप्‍ता, अंजलि देश पांडे, सुमति सक्‍सेना लाल ने भी अपने विचार व्यक्त किये .

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