बढ़ती अमानुषिकता के ख़िलाफ़ आवाज़ बुलन्द करती पत्रिका

कथन अंक 83-84

बढ़ती अमानुषिकता से जूझती दुनिया पर केंद्रित

संपादक :  संज्ञा उपाध्याय

पता :107, साक्षरा अपार्टमेंट्स

ए -3, पश्चिम विहार,

नयी दिल्ली-110063

फोन–9818184806

मूल्य 100 रुपए

पत्रिका

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

कोरोना वायरस से बचने के लिए पुरी दुनिया ने खुद को ताले में बन्द कर लिया है। पूरी दुनिया में लॉकडाउन है तो हवा शुद्ध हुई है, नदियों का पानी साफ हुआ है, पक्षियों की चहचहाट बढ़ी है लेकिन आदमी का मन? यह इस संकट काल का सबसे जरूरी सवाल लगता है मुझे। इसलिए क्योंकि कोरोना संक्रमण से बचने के लिए लॉकडाउन के एलान के साथ ही भूख और वंचना की जो तस्वीरें सामने आईं, वह हृदय विदारक थी। राशन-पानी वाले जब कोरोना से डर कर घर में दुबक गए, तब भूख के डर से रोज कमाने खाने वाला एक बहुत बड़ा वर्ग देश के तमाम शहरों से अपने गांवों की ओर निकलने को मजबूर हो गया। सबने इसे पलायन कहा लेकिन पलायन नहीं था। यह मजबूरी में लौटना था। इन्हें किसी की हमदर्दी नहीं मिली। पुलिस ने डंडे पर बरसाए, सरकारों ने वादों की बौछारें कीं और सभ्य समाज ने आरोप लगाया कि इन लोगों की वजह से कोरोना ज्यादा फैलेगा। यह अमानुषिकता  का सबसे क्रूर चेहरा था। कोरोना ने सबसे पहले दुनिया के इसी चेहरे को बेनकाब किया है। यह वक्त अपने अन्दर झांकने का भी है कि हम कितनी अमानवीयता के शिकार हैं और कितनी अमानवीयता हमारे अन्दर भरी हुई है.

इस साल के शुरू में आए चर्चित साहित्यिक पत्रिका ‘कथन’ के 83-84वें संयुक्तांक में अमानुषिकता की इसी समस्या का विश्लेषण बहुत गहराई से किया गया है। यह अंक ‘बढ़ती अमानुषिकता से जूझती दुनिया’ पर केंद्रित है। अंक तो जनवरी में ही मिल गया था लेकिन पढ़ा अब। गंभीर विषय के साथ पत्रिका की संपादक संज्ञा उपाध्याय पूरी गंभीरता के साथ न्याय करती हुईं नज़र आईं हैं। ऐसी पत्रिका पठन में भी गंभीरता की मांग करती है।

आइजक डोयचर का आलेख ‘भविष्य का मनुष्य’ और पाओलो फ्रेरे की पुस्तक ‘उत्पीड़ितों का शिक्षा शास्त्र’ का एक संपादित अंश ‘अमानुषीकरण से मुक्ति’ विषय को बेहतरीन ढंग से समझने में मदद करते हैं। दोनों आलेखों का शानदार अनुवाद वरिष्ठ कथाकार-उपन्यासकार रमेश उपाध्याय ने किया है। रामशरण जोशी ने ‘अमानुषीकरण का प्रतिरोध’  आलेख में भारतीय संदर्भ में इस समस्या का गहराई से विश्लेषण किया है। अमानुषीकरण किस तरह लोकतांत्रिक मान्यताओं और व विवेचनात्मक चेतना का हरण करता है, इसे उन्होंने उदाहरण के साथ समझाया है। वो आज के संदर्भ में बिल्कुल सही लिखते हैं, ‘जब शासक वर्ग स्वयं को असुरक्षित समझता है, तो सबसे पहले वह जन से भयभीत होने लगता है। समाज और जन को प्रतिरोध की चेतना से वंचित करने के लिए वह सत्ता तंत्र का इस्तेमाल करता है, अमानुषीकरण के मनोवैज्ञानिक शस्त्रों का प्रयोग करता है, प्रचार माध्यमों पर कब्जा करता है, संस्कृति-साहित्य-कला के माध्यम से बुद्धिजीवियों के विरुद्ध ‘सॉफ्ट प्रॉक्सी युद्ध’ चलाता है, समाज का ध्रुवीकरण करता है और समाज को प्रतिक्रियात्मक रूप में विभाजित कर स्वयं की किलेबंदी करने लगता है।’

अमानुषीकरण के कई पहलू हैं। आर्थिक, सामाजिक, धार्मिक, सांस्कृतिक, जातीय। विषय के हिसाब से बेहतर सामग्री जुटाने की संपादक की यह ललक ही है कि ब्राह्मणवाद पर उन्होंने द हिन्दू में छपे राजीव भार्गव के आलेख का अनुवाद छापा है।  ‘ब्राह्मणवाद के विरोध का वास्तविक अर्थ’ शीर्षक वाले लेख में राजीव ने ब्राह्मणवाद की बहुत सटीक परिभाषा दी है। वह लिखते हैं, ‘ब्राह्मणवादी विचारधारा केवल ब्राह्मण जाति तक ही सीमित नहीं है। न ही यह हिन्दू धर्म तक सीमित है। आप किसी भी जाति के हों, किसी भी धर्म या मत को मानते हों, अगर आप विशेषाधिकार प्राप्त ‘अभिजन’ हैं, तो आप इस विचारधारा को अपनाए बिना नहीं रह सकते।’ गौहर  रजा अमानुषीकरण से लड़ने के लिए गांधीवादी राह  अपनाने की वकालत  करते हैं। उनका मानना है कि गांधी का अहिंसावादी तरीका ही हमें अमानुषीकरण से निजात दिला सकता है।

यादवेंद्र ने अपने लेख ‘अर्थ से ज्यादा शब्दों की नीयत पर सवाल’ में इस बात की अच्छी पड़ताल की है कि मौजूदा राजनीतिक-सामाजिक परिदृश्य में किस तरह शब्दों का इस्तेमाल समाज को बांटने के लिए किया जा रहा है। भला जय श्रीराम शब्द पर किसी को क्या आपत्ति हो सकती है? जय श्रीराम कह कर अभिवादन करने की भारतीय परंपरा बहुत ही प्राचीन है लेकिन आज जब जय श्रीराम का उद्घोष होता है तो उसका अर्थ और नीयत बिल्कुल अलग होता है। यादवेंद्र ने उदाहरण देकर अपनी बातों को पुख्ता अंदाज में पेश किया है। राकेश कुमार ने अपने शोधपरक लेख में मीडिया के अमानुषीकरण पर अच्छा प्रकाश डाला है। इतिहासकार लाल बहादुर वर्मा से अमानुषीकरण के तमाम पहलुओं पर संज्ञा की लंबी और सार्थक बातचीत भी इस अंक में है।

इस अंक में द्वारकेश नेमा की कहानी ‘उत्तरदायित्व’,  सविता सिंह की कहानी ‘अनुपस्थित’, प्रियदर्शन की कहानी ‘सड़क पर औरतें’ और सीमा आजाद की कहानी ‘फेसबुक लाइव’ है। अंक में असुरारी नंदन मिश्र की पहली कहानी ‘दौड़’ भी छपी है।

द्वारकेश नेमा अपनी कहानी ‘उत्तरदायित्व’ में बड़े ही गंभीर विषय को बहुत ही संवेदना के साथ उठाया  है। आज सड़क पर अपराध होता है, हादसा होता है लेकिन लोग मदद की जगह वीडियो बनाते रहते हैं। यह आम प्रवृत्ति बन गई है। यह कहानी एक प्रसिद्ध फोटोग्राफर सुवाती के इर्दगिर्द घूमती है। एक लड़की का अपहरण होता है और सुवाती उस वक्त की तस्वीर क्लिक कर लेता है लेकिन न तो उस लड़की को बचाने की कोशिश करता है, न ही पुलिस को इसकी जानकारी देता है। बाद में तस्वीर को और ज्यादा प्रभावी बनाने के लिए बैकग्राउंड हटा देता है। यह फोटो पुरस्कृत हो जाती है लेकिन जब इसकी सच्चाई खुलती है तो अपराधबोध से ग्रस्त सुवादी को जान देकर इसकी कीमत चुकानी पड़ती है.

प्रियदर्शन की कहानी ‘सड़क पर औरतें’ दिल को छूती है। समाज में स्त्रियों की क्या स्थिति है, इसका चित्रण उन्होंने बहुत ही प्रभावी ढंग से किया है। उनके छोटे-छोटे प्रभावी वाक्य स्त्रियों की दारूण स्थिति का बयां इस तरह करते हैं कि पाठक हिल जाता है। घर से निकली लड़की को कुछ देर के लिए शरण देने वाली महिला जब कहती है, ‘सुना, अब निकलो, मेरे पति आने वाले होंगे। अगर वो जान गए कि एक अनजान लड़की को मैंने घर में रोका और खाना खिलाया , तो मेरी खैर नहीं। चलो, निकलो। सीधे घर जाना।’ उसके इस संवाद पर लड़की को लगता है कि  वह अकेले सड़क पर नहीं है बल्कि वह महिला भी उसके साथ है। अपने रात के ठिकाने के बारे में चिन्ता करती हुई लड़की क्या सोचती है, यह भी पढ़िए, ‘फिर कौन सी औरत होगी, जो उसे खाना खिलाएगी? सबके पति आ चुके होंगे। किसी का घर उनका घर नहीं होगा।’

अंक में लीलाधर मंडलोई, श्रुति कुशवाहा, विहाग वैभव, विमल चंद्र पांडेय, मुस्तफा खान, आत्मा रंजन, अनुज लुगुन की कविताएं हैं। सू लिज्ही की कविताओं का अनुवाद भी है। विहाग की कविताओं में आग है। श्रुति को पढ़ते हुए बहुत अच्छा लगा।  करीब 18 साल पहले हैदराबाद में करीब डेढ़ साल तक श्रुति मेरी सहकर्मी थीं लेकिन तब मुझे उनके कवि होने की जानकारी नहीं थी। उनकी कविताएं दिल को गहरे छूती हैं। अंक से उनकी एक छोटी कविता आपके लिए

हाथी के सिर पर बांध दिया है मोरपंख

अब हाथी दिखाएगा मोहक नाच

मोर के तो सारे पंख पहले ही नोंचे जा चुके हैं

कछुए की कहानी सुना-सुनाकर

खरगोश कर को कर दिया है पस्त

दौड़ना भूल गया है खरगोश

अरसे से रियाज कर रहे हैं कौवे

आवाज बदलने का

रंग तो पहले ही पोत लिया था सफेद

इधर, भेड़िये को सौंप दी गई है चौकीदारी

अब डरने की कोई वजह नहीं

सब महफूज हैं

पुस्तक समीक्षा से लेकर सारे नियमित स्तम्भ हैं। 234 पन्नों की पत्रिका है तो आप समझ सकते हैं कि कितनी सामग्री है। लिखते वक्त मुझसे भी बहुत कुछ ऐसा छूट गया है, जिस पर लिखना चाहिए था। जरूर पत्रिका है। हर साहित्य प्रेमी के पास यह होना चाहिए।

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