आदमी को मुकम्मल बनाने वाली कविताएं

शहंशाह आलम
आनन्द गुप्ता

जन्म : 19 जुलाई 1976, कोलकाता

शिक्षा : कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में स्नातकोत्तर

प्रकाशन : देश की कुछ महत्वपूर्ण पत्र-पत्रिकाओं में कविताओं का प्रकाशन। कुछ आलेख भी प्रकाशित।

 कई ब्लॉग पर कविताएँ प्रकाशित।

कुछ भारतीय भाषाओं में कविताओं के अनुवाद प्रकाशित। 

आकाशवाणी एवं दूरदर्शन कोलकाता केंद्र  में कविता पाठ। 

सांस्कृतिक पुनर्निर्माण मिशन द्वारा कविता नवलेखन के लिए शिखर सम्मान ।

संप्रति, पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा संचालित विद्यालय में अध्यापन । 

संपर्क पता : गली नं. 18, मकान सं.- 2/1, मानिकपीर, पोस्ट-कांकिनारा, ज़िला – उत्तर 24 परगना ,   

 प.बंगाल -743126

मोबाइल : 09339487500

ई-मेल : anandgupta19776@ gmail.com

  इस हफ्ते के कवि: आनन्द गुप्ता

  चारों तरफ़ चुप्पियाँ थीं

          सारे पेड़ चुप थे

          जबकि उनके विरुद्ध तमाम साज़िशें जारी थीं

          एक कोयल की कूक से टूटी ख़ामोशी

          आकाश का सीना छलनी

          फिर भी चुप्पियाँ तारी

          बादलों के लिए असहनीय थी यह स्थिति

          गरज पड़ा बादल

          पहाड़ चुप था

          जबकि सैकड़ों ज़ख़्मों के निशान स्पष्ट थे

          एक प्रेमी ने

          अपनी प्रेमिका का नाम ज़ोर से पुकारा

          पहाड़ बोलने लगा

          सिकुड़ते तालाब की चुप्पी

          तो एक बच्चे के लिए बिलकुल असहनीय थी

          उसने तलाब की तरफ एक कंकड़ उछाला

          एक कंकड़ से काँप उठा तालाब

          शहरों, क़स्बों और गाँवों में

          अब भी कुछ लोग थे

          चुप्पियों के ख़िलाफ

          हवा में लहरातीं जिनकी मुट्ठियों की अनुगूँज

          सत्ता के गलियारे तक पहुँच ही जाती थी

          पर आश्चर्य है

          तुम्हारी चुप्पियाँ कभी क्यूँ नहीं टूटतीं।

                                                            – आनंद गुप्ता

 

     हम जिसे आधुनिक समय कहते हैं या जिस समय में ख़ुद का आधुनिक बनना कहते हैं, यह समय कितने संत्रास से भरा पड़ा है, यह वह नहीं जान पाता कि ख़ुद वह व्यक्ति, जो अपने को आधुनिक कह रहा है, उसके समय में फैला संत्रास कहाँ-कहाँ नहीं दिख रहा है। लेकिन समय तो समय ठहरा, उसको बेशक यह पता होता है कि वह कितना रोज़ ज़ख़्मी किया जा रहा है, आधुनिक पुकारे जाने को तत्पर मनुष्य द्वारा। यह समय तो बिना ठहरे आगे निकल लेगा। आधुनिक मनुष्य लेकिन अपने तनाव से शायद ही कभी निकल पाए। सवाल यहाँ यह निकल रहा है, ध्वनि यहाँ यह निकल रही है, समग्रता में बात यह सामने आ रही है कि उस कवि का क्या, जो समय के साथ चलता हुआ समय से भी आगे बढ़ जाता है? कोई आदमी, जो कवि है, वह किसी आधुनिक मनुष्य के जैसा आधा-अधूरा तो रहता नहीं। कवि तो अपने आधे-अधूरे समय तक को पूर्ण करता रहता है। फिर क्या जो कवि है, वह अपने समय के संत्रास से बचा रह सकता है? बेशक बचा रह सकता है। कवि ही तो है, जो अपने समय के संत्रास को मंज़रे-आम पर लाता है यानी कवि ही तो है, जो हर मनुष्य को बताता रहता है कि देखो, तुम आधुनिक बनने के चक्कर में कितने अकेले रह गए हो। समय तुमसे कितना आगे निकल चुका है। तुम हो कि अपनी आँख की बिनाई देख नहीं रहे। यह भी नहीं देख रहे कि तुम तो आधुनिक बनते-बनते किसी जानवर से भी बदतर होते जा रहे हो। खरा-खरी आप सुनना चाहें तो सुनें मियाँ, आधुनिक-वाधुनिक कुछो नहीं हैं, आप बस उनके ग़ुलामों में से हैं, जो आपको ऐसा जीवन देकर विवश भर कर रहा है। आप जानवरों से भी बदतर इसलिए हैं कि अब आप अपने आका के कहने पर हमें अपनी पसंद के साथ मुहब्बत करने पर, अपनी पसंद का खा लेने पर, अपनी पसंद का कपड़ा-लत्ता पहन लेने पर जान से मार देते हैं जबकि कोई ख़ूँख़ार जानवर हमको इस बात के लिए कहाँ मार पाया आज तक कि तुम मुहब्बत करोगे तो मार दिए जाओगे, तुम कुछ लज़ीज़ खा लोगे तो मार दिए जाओगे, तुम कुछ पसंद का पहन लोगे तो मार दिए जाओगे। आप तो बस हमें मारते ही जाते हो और तुर्रा यह कि आगे भी ऐसे ही मारे जाते रहेंगे हम तुम्हारे क़ातिल हाथों से। जब हमें मारा ही जाना है तो हम इस बात की डुगडुगी काहे को बजाते जाते हैं कि विश्व भर में आप ही का डंका बज रहा है। एक तरह से सचमुच में इस बात के लिए डुगडुगी बजाई जा रही है कि अभी बस हत्यारों, बलात्कारियों और तानाशाहों की डुगडुगी की आवाज़ फैली हुई है हर सन्नाटे में। मगर डंके की चोट पर आप सबसे आनंद गुप्ता जैसा कवि कहता है कि जो स्त्री सारी रात जागकर आकाश तक बुहार आती है, उस स्त्री की कैसी दुर्गति तुम करते हो, तुम हत्यारे, तुम बलात्कारी, तुम तानाशाह। मगर तुम क्या जानो, वह एक ऐसी स्त्री है कि तुम्हारा भी अच्छा सोचकर अपनी अच्छाई से तुम्हारा मुँह ही तो चिढ़ाती है :

          वह सारी रात आकाश बुहारती रही

          उसका दुपट्टा तारों से भर गया

          टेढ़े चाँद को तो उसने

          अपने जूड़े मे खोंस लिया

          खिलखिलाती हुई वह

          रात भर हरसिंगार-सी झरी

          नदी के पास

          वह नदी के साथ बहती रही

          इच्छाओं के झरने तले

          नहाती रही ख़ूब-ख़ूब

          बादलों पर चढ़कर

          वह काट आई आकाश के चक्कर

          बारिश की बूँदों को तो सुंदर सपने की तरह

          उसने अपनी आँखों में भर लिया

          आईने में आज वह सबसे सुंदर दिखी

          उसके हृदय के सारे बंद पन्ने खुलकर

          सेमल के फाहे की तरह हवा में उड़ने लगे

          रोटियाँ सेंकती हुई

          कई बार जले उसके हाथ

          उसने आज

          आग से लड़ना सीख लिया।

 

     तुम हत्यारे, तुम बलात्कारी, तुम किसी डकैत से भी बड़े डकैत… तुम एक आदमी को जितनी यातना देते हो, वह आदमी उतना ही लोहे-सा कच्चा से पक्का होता जाता है। वह आदमी कौन है, एक कवि ही तो है। और कवि आनंद गुप्ता के जैसा है, तब शत्रुओं से लड़ाई का एक नया रंग इसमें दिखाई देता है कि यह कवि जो आनंद गुप्ता है, वह आदमी के शत्रुओं से लड़ाई बेहद आत्मीयता से लड़ता है। अब कवि मानवीय है तो उसकी लड़ाई भी बेहद मानवीय होती है। उन कवियों की तरह नहीं कि अपनी तेज़ चाकू जैसी कविता से आदमियों के शत्रुओं को खचाक देके मारता है। मगर आनंद गुप्ता अपने शत्रुओं को खचाक-खचाक नहीं मारते। आदमी के शत्रुओं को थोड़ा मौक़ा देते दिखाई देते है, थोड़ी मोहलत भी कि शायद आदमी के शत्रु आदमी के मित्र हो जाएँ। अब कवि तो कवि होते हैं- थोड़े नर्म कवि भी, थोड़े गर्म कवि भी। और थोड़े कवि हिटलर टाइप हुक्मराँ से हमदर्दी जताने वाले भी होते हैं। आनंद गुप्ता अपनी कविता में साकार हुए घर को हमेशा रोशनी से भरकर रखते हैं ताकि जिस आदमी को अँधेरे से बाहर आना है, आकर कवि के रौशन घर में रह सकता है। एक सच्चे कवि का दाँव यही होना भी चाहिए कि जो आदमी डरा हुआ है, सहमा हुआ है, सताया हुआ है, उस आदमी को कवि वाले घर में शरण मिल सके। इसी तरह तो शत्रुओं से किसी की हिफ़ाज़त की जाती है। ऐसा करने के लिए आनंद गुप्ता में किसी तरह का असमंजस दिखाई नहीं देता। तभी यह कवि अपनी पृथ्वी के साथ-साथ अपना आकाश भी साफ़-सुथरा रखता है। तभी आनंद गुप्ता उम्मीद से लबालब कवि हैं :

          तुम लौट  आना

          जैसे  किसी स्त्री के गर्भ में

          लौटता है नया जीवन

          जैसे लौट आती है आवाज़ें

          चट्टानों से टकराकर  हर बार

          जैसे हर पराजय के बाद

          फिर से लौट आती है उम्मीद

 

          तुम उस तरह मत लौटना

          जैसे क्षणिक सुख बिखेर कर

          वापस लौट आती है लम्बी उदासी

 

          तुम लौटना

          जैसे गहरे ज़ख़्म के बाद

          खिलखिलाती हुई

          वापस लौट आती है शरीर पर त्वचा

          जैसे पतझड़ में टूटी पत्तियाँ

          लौट आती है बसंत में

          जैसे आँगन में फुदकती शावक चिड़ियाँ

          लौट आती हैं घोंसले में सुरक्षित

 

          तुम लौट आना हर बार

          जैसे लम्बी दूरी तय करके

          प्रवासी पक्षी

          सही रास्ते लौट आते हैं अपने घर

 

          तुम लौट आना

          उन शब्दों की तरह

          जिनसे मेरी हर कविता मुक्कमल होती है।

 

     आनंद गुप्ता की कविता हर आधे-अधूरे आदमी को एक मुकम्मल आदमी बनाती है। यही वजह है कि आनंद गुप्ता की कमोबेश सारी कविताएँ सुंदर होती हैं, परिपक्व होती हैं, दिल को छू लेने वाली होती हैं। आनंद गुप्ता अप्रत्याशित आपको एक ऐसी दुनिया के सफ़र पर ले जाते हैं, जहाँ मुहब्बत बची हुई है, जहाँ जद्दोजेहद बची हुई है, जहाँ चट्टानी ताक़त बची हुई है। एक कवि की सफलता इसी में है कि उस कवि का दिलो-दिमाग़ हमेशा रौशन रहे, हमेशा कमज़ोर आदमी का हमदर्द बना रहे, हमेशा अपनी ज़िंदगी में साधारण बना रहे। एक कवि का जीवन ऐसा होगा, तभी वह अनोखा, असाधारण, जीवन से भरी कविता दे सकेगा। यह ख़्वाहिश हर सच्चे कवि की रहती है कि उसकी रचनाशीलता हमेशा उस उदास आदमी के बारे में हो, जो हारता दिखाई देता है, जो तड़पता दिखाई देता है, जो तिल-तिल मरता दिखाई देता है। आदमी के लिए ऐसा उजाला आनंद गुप्ता की कविता में भरा हुआ है। आनंद गुप्ता प्रेम के कवि हैं और क्रांति के भी कवि हैं। यह सच है, एक कवि प्रेम करता है और प्रेम करते हुए क्रांतिकारी हो जाता है। सच्चा प्रेम ही तो सच्ची क्रांति लाता है। यही वजह है कि आनंद गुप्ता हुगली नदी के किनारे बैठकर जब हुगली का पानी छूते हैं तब उन्हें बुद्ध याद आते हैं। तब उन्हें अपना खोया गाँव याद आता है। तब उन्हें आदमी के टूटे सपने याद आते हैं। तब उन्हें अपना प्रेम याद आता है। यही तो सच्चे कवि की पहचान है। हुगली का पानी मैंने भी छूकर देखा है। यही वजह है कि इसका एहसास मुझे भी है कि हुगली का पानी आपको रचनाशील बनाए रखने के लिए तत्पर दिखाई देता है। एक सच यह भी है, आपमें पानी है तभी रवानी है। यही रवानी, यही प्रवाह, यही बहाव, यही धार आनंद गुप्ता की कविता की असली वजह भी है और असली ताक़त भी। आनंद गुप्ता एक नदी से प्यार करते हैं, इसीलिए एक स्त्री से भी प्यार करते हैं और हार रहे, उदास रह रहे, परेशान रह रहे आदमी से भी बेपनाह मुहब्बत करते हैं। इनकी कविता का फैलाव इसीलिए बड़ा है और बढ़ा हुआ है। आनंद गुप्ता का कविता में बड़ा और बढ़ा होना इस बात का संकेत भी है कि उनसे कविता का रास्ता लंबा और चौड़ा अनंत दिनों तक होता रहेगा :

          अभी-अभी खोली है नई किताब

          और भक्क से आई सुवासित गंध ने

          किया है मेरा स्वागत

 

          नई किताब की गंध में

          मैं अक्षरों की सुगंध

          महसूस कर पा रहा हूँ कहीं भीतर

          उन विचारों की सुगंध भी

          जो इन अक्षरों के भीतर कहीं दबी पड़ी है

 

          नई किताब की गंध में

          उम्र के तपे दिनों

          स्याह रातों की सुगंध है

          और कुछ अधूरे सपनो का भी

 

          नई किताब की गंध में

          उस आदमी के पसीने की सुगंध है

          जिनके हाथों ने टाँके हैं अक्षर

 

          नई किताब की गंध में

          शामिल है एक कटे हुए पेड़ की घायल इच्छाएँ

          एक चिड़ियाँ का उजड़ा हुआ आशियाना

          और किसी बच्चे के

          स्मृतियों में गुम गए बचपन की गंध

 

          अभी-अभी खोली है नई किताब

          मैं विचारों के साथ-साथ

          एक पेड़, एक चिड़ियाँ

          कुछ अधूरे सपनों, छूटी स्मृतियों

          और पन्नों पर अक्षर टाँकते

          दो हाथों की कहानी पढ़ रहा हूँ।

 

अथवा कवि कहता है,

          पेड़ों की डालियों पर

          गुलज़ार हैं नए पत्ते

          पलाश के फूल दिपदिपाते

          कोयल की कूक से

          हवा में घुल रहा वसंत

          मंजरियों से भर गए हैं

          आम के पेड़

          चिड़िया गाती वसंत-राग

          फुदकती है डाल-दर-डाल

          महुए की मदमाती गँध से

          झूमती हवा में

          घुल रहे हैं चैती-फगुआ के गीत

          ऐसे ही एक वसंत में

          मैंने तुम्हारे माथे पर टाँक दिया था

          प्रेम का पहला चुंबन

          तुम्हारे चेहरे पर खिल उठा था वसंत

          पर आज ना जाने क्यूँ

          मेरे लिए वसंत एक शब्द मात्र है

          जैसे मैं लिखता हूँ दुःख

          जैसे मैं लिखता हूँ उदासी

          वसंत के सारे गीत

          आनंद की जगह शोर पैदा करते हैं

          मैं कैसे गाऊँ वसंत गीत

          कि मैं देखता हूँ

          एक जूट मजदूर की उम्मीद

          हर रोज़ दम तोड़ती है

          चिमनियाँ अब नहीं उगलतीं धुआँ

          कि पैंतीस वसंत पार कर चुकी चंपा को

          आज भी अपने जीवन में वसंत का है इंतज़ार

          कि एक बूढ़े किसान की आँखों से

          कब का गुम हो गया है जो वसंत

          किसी धन्ना सेठ की तिजोरी में बंद पड़ा है

          कि अपराधीगण अब धड़ाधड़

          लेने लगे हैं हमारे भाग्य के फ़ैसले

          कि बजट की तमाम घोषणाओं के बावजूद

          अपने बुरे दिनों के जाने की

          कोई सूरत उन्हें नज़र नहीं आती

          कि एक भूखा कमज़ोर बच्चा

          हर रोज़ मेरे सपने में लड़खड़ाता गिर पड़ता है

          कि एक लड़की जिसके तन पर

          अभी-अभी वसंत ने दी थी दस्तक

          पवित्र कलश से

          शौचालय की बाल्टी में तब्दील कर दी जाती है

          मैं कैसे गाऊँ वसंत गीत

          मेरी उमंग पर भारी है मेरी शर्म

          मैं जानता हूँ

          कि मेरे काग़ज़ काले करने से

          कुछ नहीं बदलेगा

          मैं एक मज़दूर के कानों में

          खड़खड़ाती मशीनों की आवाज़ बन

          बजना चाहता हूँ

          मैं एक किसान के सपने में

          घनघोर बादल-सा गड़गड़ाड़ाना चाहता हूँ

          मैं किसी चम्पा की नींद में

          वसंत के फूल-सा खिलना चाहता हूँ

          मैं किसी भूखे बच्चे के मुख में

          निवाला बन पड़ना चाहता हूँ

          मैं किसी मजलूम की

          हवा में लहराती मुट्ठी बनना चाहता हूँ

          अभी

          मैं कैसे गाऊँ वसंत गीत

          मेरी उमंग पर भारी है मेरी शर्म।

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  1. भीतर तक झकझोर देने वाली कविताएं

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