कविता का नया रहस्य

  • शहंशाह आलम

कविता को समझने के लिए कई प्रतिमान गढ़े गए हैं। प्रतिमान गढ़ने का तरीक़ा सबका अपना होता है। एक कवि होने के नाते कवितारत रहते अकसर मेरे मन में कविता को समझने की कोशिश चलती रही है और कशमकश भी। जिस तरह मनुष्य होने के नाते मैं एक स्त्री के साथ जीते हुए स्त्री का रहस्य-पक्ष खोलना चाहता हूँ, तब भी स्त्री का रहस्य खोलना कठिन सिद्ध होता जाता है। ऐसा करते हुए मेरे समक्ष समस्या यह खड़ी होती है कि जिस स्त्री के साथ इतने वर्षों साथ रहा, उस स्त्री ने अपनी स्त्रीत्व का रहस्य जब पूरा प्रकट नहीं किया तो मैं उस स्त्री का रहस्य जितना जान पाया उतना ही तो प्रकट कर पाया, अपने जीवन में। यह सच है, स्त्री कोई हो… माँ हो, बहन हो, पत्नी हो… उनका सारा रहस्य हम अंत तक जान कहाँ पाते हैं। अब कोई व्यक्ति, जो उग्र टाइप होगा, मेरे इस कथन को नकारते हुए कह दे सकता है कि एक स्त्री के सारे रहस्य मैं जानता हूँ, समझता भी हूँ। वैसे व्यक्ति की उग्रता को नकारते हुए मैं यहाँ फिर-फिर कहूँगा कि एक स्त्री अपना बहुत सारा रहस्य अपने अंत समय तक बचाकर रखती है। कविता भी एक स्त्री की भाँति ही है, जिसका रहस्य पाना चाहें तो पूरा नहीं पा सकते। कविता के रहस्य को भली-भाँति पाने के लिए एक स्त्री के जीवन-रहस्य को जानना, एक स्त्री के जीवन-तिलिस्म को पहले खोलना पड़ेगा। यह विवाद केन्द्रित नहीं है बल्कि कविता की प्रकृति एक स्त्री जैसी ही है।

कविता के रहस्य से गुज़रने के लिए वैसा शुद्ध मन चाहिए होता है, जिस शुद्ध मन से हम किसी स्त्री को पाने की चाहत करते हैं। उस कवि की तरह नहीं, जो अपनी कविता को तो कालजयी मानता है, दूसरे कवि की कविता को बेहद तुच्छ मानता है, जैसे कोई अमीर आदमी अपने घर की स्त्रियों को महान स्त्री मानता है और किसी ग़रीब स्त्री, किसी कमज़ोर स्त्री के साथ अपनी रातें हसीन कर सकता है परन्तु अपने जीवन का हिस्सा नहीं बना सकता। जिस तरह एक स्त्री के लिए यह एक वीभत्स, एक विस्मयकारी, एक घृणा करने योग्य समय है, कमोबेश कविता का समय भी कविता के लिए ऐसा ही है। जैसे एक स्त्री किसी बलात्कारी के नियंत्रण में रहती है तो वह बलात्कारी उस स्त्री की इज़्ज़त से खेलकर उसकी जान बख़्श देता है। वैसे ही आप किसी बड़े कवि से नियंत्रित जब तक रहते हैं, वह बड़ा कवि आपको कवि की हैसियत से सम्मान देता है। फिर जैसे ही आप उस बड़े कवि के नियंत्रण को ठेंगा दिखाते हैं, वह बड़ा कवि आपकी भद्द पिटवाने से, आपकी बेइज़्ज़ती करने से, आपका उपहास करने से बाज़ नहीं आता। यही सिद्धांत भी है इस तथाकथित आधुनिक समय का। इसलिए कि सामाजिक होना अपमानित होने जैसा है, शापित होने जैसा है आज की तारीख़ में। आप इससे इनकार नहीं कर सकते। ऐसे ही तो आप कविता का सही रहस्य पाने से वंचित किए जाते रहे हैं। सवाल यह भी उठता है कि एक स्त्री के रहस्य से कविता के रहस्य को जोड़ा कैसे जा सकता है? सवाल वाजिब है। इसलिए कि एक स्त्री, जिसमें जीवन है, जिसमें नायिका है, जिसमें मानवीय चेतना है, उस स्त्री के रहस्य से कविता के रहस्य का क्या लेना-देना है। मेरे ख़्याल से इसे समझने के लिए यहाँ हमें थोड़ा उदार होना पड़ेगा। यहाँ विश्लेषण इस बात का है कि जिस तरह कोई स्त्री रहस्यों से भरी होती है, कविता भी रहस्यों से भरी एक विधा है। जिस तरह एक स्त्री का उदय रहस्यों से भर-भरकर होता है, वैसे ही कविता का उदय रहस्यों से भरा है। जैसे एक स्त्री विविध और समृद्ध होती है, कविता भी तो उतनी ही विविध और समृद्ध है :

 

मेरे पास

एक माचिस की डिबिया है

माचिस की डिबिया में कविता नहीं है

 

माचिस की डिबिया में तीलियाँ हैं

माचिस की तीलियों में कविता नहीं है

 

तीलियों की नोक पर है रत्ती भर बारूद

रत्ती भर बारूद में भी कहीं नहीं है कविता

 

आप तो जानते ही हैं

कि बारूद की जुड़वाँ पट्टियाँ

माचिस की डिबिया के दाहिने-बाएँ

सोई हुई हैं गहरी नींद

 

ध्यान से देखिए

इस माचिस की डिबिया को

एक बारूद जगाता है दूसरे बारूद को

कितने प्यार से

 

इस प्यार वाली रगड़ में है कविता ( ‘माचिस’ / नीलकमल / यात्रा, अंक : 11, पृ. 24 )।

 

कविता मेरे लिए सचमुच एक रहस्य-द्वार है। इस रहस्य-द्वार के भीतर आप जितना जाते हैं, रहस्य का परदा उठता जाता है। लेकिन यह परदा उतना ही उठता है, जितना कोई कविता किसी परदानशीन स्त्री के जैसी अपनी देह का परदा उठाकर आपको दिखाना पसंद करती है। एक स्त्री का परदा-खोलना जितना भर होता है, कविता का परदा-खोलना भी उतना ही होता है। यानी कविता के रहस्य का परदा उतना ही उठेगा, जितना रहस्य कविता आप पर खोलना चाहेगी, आप नहीं। क्रांतिकारी कवि बाबा नागार्जुन से कोई पाठक या श्रोता उनकी किसी कविता का अर्थ पूछते तो वे नाराज़ हो जाते थे। इसलिए कि कविता का सजीव, विश्वसनीय, वास्तविक चित्रण कविता ख़ुद जब करती आई है तो कोई कवि अपनी कविता का अर्थ बताता क्यों फिरे! कविता की सफलता इसी में है कि कविता प्रत्येक चेतना-संपन्न मनुष्य पर ख़ुद-ब-ख़ुद खुलती चली जाए, अपने पढ़े जाने अथवा सुने जाने के समय में। कविता की व्यापकता इसी में है। हमारे अंदर कविता को बरतने की सही तमीज भी ऐसे ही आती है। इसीलिए सफल-से-सफल आलोचक की ओर से अभी तक ऐसी घोषणा नहीं आई है, न घोषणा-पत्र आया है कि वह कविता के सारे रहस्य जान चुका है और परदा पूरा उठने ही वाला है :

 

कोई बोझ नहीं मेरे अस्तित्व का

मैं इतना भारहीन

कि कभी भी उड़ सकता हूँ

 

मेरा पसारा

ठीक मध्याह्न के वक़्त

अपनी परछाईं जितना

 

कोई जगह बदलने में

कितना वक़्त लगना है मुझे

क्या है मेरे साथ, बाँधना है जिसे

दिशा का भी तो निर्धारण नहीं

 

कला आध्यात्मिक रूपांतरण है

मैं एक अदृश्य प्रयोगशाला में

निरंतर खटता हुआ

 

मैं एक वक़्त पर कई जगहों पर हूँ

और कई समयों में

 

कितना जोखिम

इस तरह निर्मूल हो रहने में

कि अपनी कोई जगह ही रेखाँकित न हो

 

पर पानी की जड़ें आख़िर कहाँ होती हैं

पानी आजीवन यात्री जो है ( ‘पानी आजीवन यात्री है’ / हेमंत देवलेकर / यात्रा, अंक : 11, पृ. 16 )।

 

कोई कविता किसी सर्वहारा की मुक्ति के लिए, किसी क्रांति के आरंभ के लिए, किसी प्रेमिका को पाने के लिए हो सकती है। यानी कविता की स्थितियाँ-परिस्थितियाँ अलग हो सकती हैं, कविता के रास्ते अलग हो सकते हैं, कविता के प्रयत्न अलग हो सकते हैं, लेकिन रहस्य हमेशा बरक़रार रहता है। कविता की पद्धति ऐसी ही है और यह भ्रामक नहीं है। हाँ, कविता के पाठक, कविता के श्रोता भ्रमित हो सकते हैं। इसलिए कि लोकतंत्र के नाम पर जिस तरह जनता भ्रमित होती आई है और अलोकतांत्रिक पार्टियों का समर्थन कर-करके बुड़बक बनती रही है, फिर बाद में पछताती है कि ग़लती हो गई। कुछ-कुछ यही हाल कविता के पाठकों-श्रोताओं का है। बहरहाल जनता जनता है, पाठक पाठक है और श्रोता श्रोता है। इनका सम्मान हमेशा किया जाना चाहिए। क्योंकि जनता है तो देश है। पाठक और श्रोता हैं तभी कविता है, कहानी है, आलोचना है। ईमानदारी हमें बरतनी है। धोखा हमें नहीं देना है। वाम होने की अपनी सारी भूमिकाओं को हमें प्रकट करने हैं। विश्वसनीय चरित्रों का निर्माण हमीं को करना है :

 

मेरा दिन भिनभिनाता रहता है मधुमक्खी के छत्ते में

मेरी रात टूटी नाव के इर्द-गिर्द मंडराती है

 

मुझे नहीं आता याद मैंने बुरा किया किसी का

दुश्मनों तक के लिए मैंने नहीं माँगी कभी मौत

 

मैं क़ुर्बान हुआ उन पर जिनमें बच्चों-सा दिखा कुछ

जिनकी आँखों में दिखी मुझे बसंत की सुगबुगाहट

 

और मैं आज तक उससे नहीं पूछ सका- तुम कैसी हो

जिसे संभाले रखता हूँ अपने भीतर

तेज़ हवाओं में जलती मोमबत्ती-सा

उसके होंठों पर रखना चाहता हूँ गुलाब की एक पंखुरी

और इतनी-सी मुराद शायद ही पूरी हो सके

मेरी मौत के पहले

 

जिससे भी मैंने प्यार किया

चाहे वह कोई दरख़्त ही क्यों न हो

मुझे उससे छाँह नहीं मिली, उलटे

उस पर पक्षियों ने बसेरा बंद कर दिया

मैं प्रायश्चित करता रहा और मेरी पूरी ज़िंदगी का

सार है यही एक शब्द प्रायश्चित

बाक़ी दुनिया में सभी कुछ बदस्तूर होता रहा

 

अकेलेपन के गुम्बद में

मधुमक्खियों का आदिम छत्ता

टूटी नाव के इर्द-गिर्द

मंडराती मेरी प्यासी आँखें

सुनाई देती रहती हैं अंत तक और अनंत की आवाज़ें

 

शायद शहद मेरा स्वाद नहीं

और नाव में मैं कभी नहीं बैठा ( ‘शायद शहद मेरा स्वाद नहीं’ / चन्द्रकांत देवताले / वर्तमान साहित्य, अंक : 7-8, पृ. 17 )।

 

आज जिस कठिनतर समय को हम लाँघ रहे हैं। इस समय में किसी रहस्य की तह तक पहुँचने की फ़ुर्सत एक कवि के सिवा और किसी के पास कहाँ बची हुई दिखाई देती है। जीवन के रहस्यों पर से परदा हटाने के कवियों के अकाट्य उदाहरण मिलते हैं। यह काम एक कवि ही कर सकता है, कोई जासूस नहीं। एक जासूस किसी की हत्या का रहस्य सुलझा सकता है। किसी की मृत्यु के कारण में कोई जासूस मीम-मेख़ निकाल सकता है। मगर जीवन के कई अनसुलझे रहस्य को एक कवि पूरी सावधानी से, पूरी सूक्ष्मता से, पूरी सफ़ाई से करता चला आ रहा है। इससे यही सिद्ध होता है कि रहस्य-द्वार से कवियों का संबंध सर्वाधिक पुराना है। कवि-जाति द्वारा जो कुछ, जितना कुछ आज तक किया गया है मनुष्य के जीवन-क्षेत्र को विस्तारने-पसारने के लिए, वह ख़ासा महत्वपूर्ण है। प्रेरित करने वाला है। और यह प्रमाणित है। कवि की हर समय के समाज में ऐतिहासिक अनिवार्यता रही है। इसलिए कि सरकारें सबको ख़रीद लेती हैं। बड़े-बड़े अख़बार, बड़े-बड़े समाचार चैनल के मालिकों को ख़रीद लेती हैं। अपना सबसे विश्वसनीय प्रवक्ता बना लेती हैं। लेकिन सच यही है कि जो जेनुइन कवि हैं, उन्हें ख़रीदना सरकारों के लिए मुश्किल होता रहा है। इसलिए सरकारें किसी की रहें, ये कवियों से ज़रूर डरती आई हैं :

 

तुम मुझे पसंद हो

अबाबील

क्योंकि तुम

इंसानी ख़ाबों की तरह

कभी ज़मीन पर नहीं उतरतीं

 

बस थोड़ी देर

पेड़ की टहनियों

या

छत की मुंडेरों पर

रुकती हो

फिर उड़ जाती हो

उड़ती चली जाती हो

 

अबाबील

पेड़ की टहनियाँ और

छत की मुंडेरें

ख़ला में परवाज़ करते

तुम्हारे झुंड को

हसरत भरी निगाहों से

देखती रहती हैं

 

पेड़ की टहनियों

और छत की मुंडेरों पर

उगने वाली हसरतें

रेज़ा-रेज़ा

ज़मीन पर

बिखरती रहती हैं

 

उस ज़मीन पर

अबाबील

जहाँ तुम्हारे झुंड

नहीं उतरते

और जहाँ

हमारे जैसे ख़ाना-ख़राब

अपनी आब्ला-पाई का

नौहा पढ़ते होते हैं

 

इसीलिए

अबाबील

तुम मुझे पसंद हो ( ‘अबाबील’ / जाबिर हुसेन / रेत-रेत लहू, पृ. 20-21 )

 

दूर से पेड़ दिखता है

उसकी पत्तियाँ नहीं फूल नहीं

पास से दिखती हैं डालें

धूल से नहाई सँवरी

 

एक स्त्री नहीं दिखती

कहीं से

न दूर से न पास से

 

उसको चिता में जला के देखो

दिखेगी तब भी नहीं

 

स्त्री को देखना इतना आसान नहीं

जितना तारे देखना

या पिंजरा देखना ( ‘स्त्री को देखना’ / बोधिसत्व / दुःख-तन्त्र, पृ. 52 )

 

मैंने धरती पर सेंधमारी की

और स्वाँग रचा विलाप का

 

मैंने जिन-जिन से नमक उधार लिया

वे सभी रक़ीब बने थे मेरे लिए

 

मैंने लड़की के बालों को छुआ

और बदले में काली घटा की वसीयत लिख दी

 

मैंने चुंबन लिया जिस स्त्री का

उसे चाँद तोहफ़े में दिया

 

भरोसे के क़ाबिल नहीं था मैं

बावजूद इसके

मेरे अंदर एक हृदय होने की अफ़वाह

ज़ोर-शोर से थी ( ‘अफ़वाह’ / अरविन्द श्रीवास्तव / राजधानी में एक उज़बेक लड़की, पृ. 55 )।

 

कविता की रहस्य-प्रक्रिया जितनी कठिन है, उससे कठिन न कविता की आलोचना है, न कविता के विरोधी हैं। इसलिए कि कविता एक ऐसी प्रक्रिया है, जिससे दुनिया बदली जा सकती है। कविता की आवाज़ महीन होकर भी सबसे कड़क होती है। कविता का पक्ष हमेशा से वामपंथी, मार्क्सवादी और प्रगतिशील रहा है, जनवादी रहा है। कविता में लोकतंत्र अब भी बचा है जबकि देश की राजनीति से लोकतंत्र कबका ख़त्म हो चुका है। आज की राजनीति ने मनुष्य की समाप्ति की घोषणा कर रखी है। तभी हम पर बेरोज़गारी, महँगाई, परेशानी के लात-घूँसे की मार इन दिनों कुछ अधिक बढ़ा दी गई है। इतना ही नहीं, सत्ता पक्ष विपक्ष को लतियाता रहता है, तब भी विपक्ष की वफ़ादारी सत्ता पक्ष के प्रति जितनी रहती है, उतनी वफ़ादारी जनता को लेकर नहीं होती। अगर ऐसा नहीं है तो देश की जनता से लगाव जितना एक कवि को है, विपक्ष को क्यों नहीं! क्या सत्ता पक्ष जितना जीवन विरोधी है, देश का विपक्ष भी उतना ही जीवन विरोधी नहीं है, है, तभी तो देश में घृणा का बाज़ार सजाया जा रहा है और देश का विपक्ष मूकदर्शक बना बैठा है। विपक्ष का विरोध-स्वर सुनाई भी पड़ता है तो उस विरोध-स्वर में देश की जनता से उनकी प्रतिबद्धता नहीं बल्कि अपनी राजनितिक रोटी सेंकने से प्रतिबद्ध होकर सदन में विरोध करते दिखाई देते हैं। कविता आज के विपक्ष के विचारों की पोल भी खोल रही है। इसलिए कि विपक्ष जितना शोर मचाता है, हमारे आगे से एक मुट्ठी अन्न और कम कर दिया जाता है। सत्ता पक्ष को यह पता है कि विपक्ष का शोर-शराबा सदन के अंदर तक सिमट चुका है। वर्तमान व्यवस्था यही चाहती भी है। इस तरह से देखें तो कविता का नया रहस्य-पक्ष इतना गहरा है कि कविता आम आदमी के जीवन-संघर्ष तक को उद्घाटित कर रही है, अपनी अनोखी मुस्कान के साथ। इसलिए की कविता मनुष्या का माध्यम है और मनुष्य कविता का। कविता का यही काम है कि अगर सत्ताधीशों के, पूँजीपतियों के, आदमी के दलालों के सिर पर सिंग उग आई है तो उस उग आई सिंग को अदृश्य से दृश्य में लाना। इसमें जोखिम कितना भी क्यों न हो :

 

बहुत दिनों बाद

उसको दुःख में घुलते देख

मैंने कहा कि देखो न

हाथ-पैर आँख-नाक

ईश्वर ने तुम्हें क्या कुछ नहीं दिया

नेमत बरसी है तुम पर

कि मीठ बोल पत्नी

फूल-सा शिशु

रोटी कपड़ा मकान सबकुछ है तुम्हारे पास

इसके बाद भी तुम्हारा दुःखी रहना

ईश्वर को दुःख में डालेगा

 

वह हँस पड़ा जैसे मैंने कह दी हो

किसी बाज़ीगर के सामने

बच्चों जैसी बात

 

अपने दुःख में सुखी हैं हम

तुम अपने सुख में दुःखी हो

वह समझाते मुस्कुराते अपने रास्ते चला गया

 

दिन भर अफ़सोस रहा

मुँहबोला ही सही

आज भी खो दिया एक दोस्त

नहीं करनी चाहिए थी मुझे उससे ऐसी बात

 

जाने क्या हो गया इन दिनों

कि एक-एक कर बने साथी

चालीस की उम्र तक पहुँचते-पहुँचते

हो रहे एक-एक कर दूर

 

क्यों दुःख ही अकेला दोस्त

बचा है आदमी के लिए

आज के समय में भी

अगर रहते बुद्ध

तो पूछता उन्हीं से ( ‘ बहुत दिनों के बाद’ / राजकिशोर राजन / नूरानी बाग़, पृ. 32-33 )

 

पक रहा है पानी में

शहतीर

आग पर रोटी

रोग में तन

और आत्मा विछोह में…

 

कीचड़ और पानी में

पक रहा है काठ

सिंहल समुद्र के जल

और बैसवाड़े के पसीने से बना

शीशम का यह तना

गोह साँप गिरगिट

की रेंगन से रोमाँचित…

तितलियों-सी

पत्तियों से भरा यह शीशम

घर था अनश्वरता का

कोटरों में घोंसले

आँधियों को परास्त करते हुए…

 

उन्हीं कोटरों में रहते हैं अब

कछुए मुस्कान जैसे मुँह वाले

वहीं से बुलाती है सबको

अनश्वरता

 

कीचड़-पानी में

पक रहा है शहतीर

काठ लोहा हो रहा है

और काठी भी… ( ‘काठ और काठी’ / दिनेश कुमार शुक्ल / आखर अरथ, पृ. 17-18 )।

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3 Responses

  1. भावना says:

    बेहद सारगर्भित

  2. सुषमा सिन्हा says:

    खूबसूरत कविताओं के साथ बेहतरीन आलेख !!

  3. शहंशाह आलम says:

    Literaturepoint.com का दिल से शुक्रिया।

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