केशव शरण की 6 कविताएं

केशव शरण

प्रकाशित कृतियां-तालाब के पानी में लड़की  (कविता संग्रह)जिधर खुला व्योम होता है  (कविता संग्रह)दर्द के खेत में  (ग़ज़ल संग्रह)कड़ी धूप में (हाइकु संग्रह)एक उत्तर-आधुनिक ऋचा (कवितासंग्रह)दूरी मिट गयी  (कविता संग्रह)सम्पर्कः एस 2/564 सिकरौलवाराणसी  221002मो.   9415295137

  1. न संगीत, न फूल

उसका हंसना

याद आ रहा है

संगीत का बिखरना

और फूलों का झरना

याद आ रहा है

याद आ रहा है

मेरा मर मिटना

उसकी उस दिलकश हंसी पर

और इसी के साथ

आ रहा है रोना

उसका दुखी, बीमार

उदास होना

क्या बताऊं

अखर रहा है

किस क़दर

कुछ इस क़दर

कि न संगीत अच्छा लग रहा है

न फूल अच्छे लग रहे

  1. राम, उसे आराम दो !

राम!

उसे आराम दो,

अब से

उसकी पीड़ा को विराम दो !

वह भी एक दिल है

वह भी एक जान है

इतना कष्ट मत मेरे राम दो

कि उसके होंठों पर बस

मौत का नाम हो

होली-दीवाली

शादी-विवाह

प्रभावित क्यों उसके नित्य के काम हों

कि वह हंसने-मुस्कुराने को तरसे

अपनों के लिए कुछ कर पाने को तरसे

प्रभु !

तुम्हारी करुणा

कुछ उस पर भी बरसे

कि उसे स्वस्थ, सानंद देख

पूरा घर हरसे।

3. ध्यान रहे, महादेव!

ध्यान रहे, महादेव!

गंगाजल से नहा रहे हो

दूध से नहा रहे हो

घी से नहा रहे हो

शहद से नहा रहे हो

ध्यान रहे, महादेव!

आंसुओं से नहाना

न पड़े

वह भी प्यार के

गहरे और सच्चे प्यार के

ध्यान रहे ,महादेव!

वह आया है

सब तरफ़ से हार के।

4. और क्या चाहता

बीमार बीवी के

होंठ चूमे

और उन्हीं होंठों से

ओम् नमः शिवाय करने लगा

बीवी ठीक हो जाय

और मैं क्या चाहता!

5. चांदनी के बिना

ऐ चांद!

जैसे तू है

और तेरी चांदनी है

वैसे ही

मैं हूं

और मेरी चांदनी है

तू अपनी चांदनी के बिना रह सकता है क्या?

मैं क्यों रहूं?

चांद

आज रात-भर

तू मेरे लिए

दुआ कर !

6. यह राग है

यह राग है

यह आग है

यह आग जला देती है

शुष्क मस्तिष्क की सारी दार्शनिकता

जब यह जलती है हिये

शोले उठते हैं

संयोगावस्था में

और तरल, तप्त धारा निकलती है

वियोगावस्था में

जो बहा देती है

सूखी आंखों की समूची आध्यात्मिकता!

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