केशव शरण की 41 कविताएं : व्यथा, जो कविता में ढल गई

कविता एक आवेग है। एक ऐसा आवेग, जिसे कवि शब्दों से संभालने की कोशिश करता है। वह शब्द देता है, आवेग उसमें ढलता जाता है। इस तरह जन्म लेती है एक कविता। कवि अपने और अपने आसपास के लोगों के जीवन, सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक परिस्थितियों से प्रभावित होता है। यही परिस्थितियां उसे उद्वेलित करती हैं। कभी वह गुस्से से खौल उठता है तो कभी शान्त हो जाता है, कभी प्रेम के आवेग में बह जाता है तो कभी उसके शब्द पीड़ा से टभकने लगते हैं।

वरिष्ठ कवि केशव शरण की जो कविताएं हम यहां प्रस्तुत कर रहे हैं, उसका एक एक शब्द दर्द से सराबोर है। विरह-वेदना-वियोग। इसी साल के शुरू में केशव जी की पत्नी अंजू जी का देहावसान हो गया। केशव जी के जीवन के लिए यह अपूरणीय क्षति थी। पत्नी का जाने से उनका मन इतना व्यथित हुआ कि आंखों से आंसू निकलते रहे और कलम से दर्द भरे शब्द। पत्नी अस्पताल में दर्द से जब तड़प रही थी, तब उन्होंने भगवान से प्रार्थना की,

 राम!

उसे आराम दो

अब से

उसकी पीड़ा को विराम दो !

 

अस्पताल में पत्नी को दर्द से तड़पता देखना उनके लिए किसी अभिशाप से कम नहीं था। वह हर हाल में उन्हें इस दर्द से मुक्ति दिलाना चाहते थे। अस्पताल में डॉक्टर कोशिश कर रहे थे तो काशी में महादेव से भी गुहार लगाई उन्होंने। 

 ध्यान रहे, महादेव!

 गंगाजल से नहा रहे हो

दूध से नहा रहे हो

घी से नहा रहे हो

शहद से नहा रहे हो

 

ध्यान रहे, महादेव!

आंसुओं से नहाना

न पड़े

वह भी प्यार के

गहरे और सच्चे प्यार के

 ध्यान रहे ,महादेव!

वह आया है

सब तरफ़ से हार के।

 

लेकिन मृत्यु को कौन टाल सका है। यह अटल सत्य है। जाने वाला चला जाता है लेकिन उससे प्रेम करने वाला जो व्यक्ति पीछे छूट जाता है, वह तड़पता रहता है। आजन्म, पूरी उम्र।

 मैं नहीं जानता

तुम्हारा पता

तुम कहां हो

लेकिन मैं हूं यहां

अकेलेपन के नर्क में।

 

और ऐसे दर्द में वह ईश्वर को भी अभिशाप देने से नहीं डरता।

 एक दिन

प्रकृति मर जायेगी

रोयेगा ईश्वर

उसके बिन

तन्हा

 

केशव शरण की कविताओं में दर्द की यह एक बानगी भर है। कुल 41 कविताएं हैं। इन्हें आप 41 अलग अलग कविताएं भी मान सकते हैं, या फिर एक लंबी कविताएं भी। कविताएं एक दूसरे से जुड़ी हुई भी हैं और स्वतंत्र भी लेकिन कवि के दर्द को आप तभी समझ पाएंगे, जब सारी कविताएं एक साथ पढ़ेंगे। इसलिए सभी 41 कविताएं यहां प्रकाशित की जा रही हैं। हमारे लिए भी यह एक नया प्रयोग है। आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा।   

–सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

 

केशव शरण

प्रकाशित कृतियां-

तालाब के पानी में लड़की  (कविता संग्रह)

जिधर खुला व्योम होता है  (कविता संग्रह)

दर्द के खेत में  (ग़ज़ल संग्रह)

कड़ी धूप में (हाइकु संग्रह)

एक उत्तर-आधुनिक ऋचा (कवितासंग्रह)

दूरी मिट गयी  (कविता संग्रह)

सम्पर्कः एस 2/564 सिकरौल

वाराणसी  221002

मो.   9415295137

  1. न संगीतन फूल

उसका हंसना

याद आ रहा है

संगीत का बिखरना

और फूलों का झरना

याद आ रहा है

 

याद आ रहा है

मेरा मर मिटना

उसकी उस दिलकश हंसी पर

और इसी के साथ

आ रहा है रोना

 

उसका दुखी, बीमार

उदास होना

क्या बताऊं

अखर रहा है

किस क़दर

 

कुछ इस क़दर

कि न संगीत अच्छा लग रहा है

न फूल अच्छे लग रहे

 

  1. रामउसे आराम दो !

राम!

उसे आराम दो, 

अब से

उसकी पीड़ा को विराम दो !

 

वह भी एक दिल है

वह भी एक जान है

इतना कष्ट मत मेरे राम दो

कि उसके होंठों पर बस

मौत का नाम हो

 

होली-दीवाली

शादी-विवाह

प्रभावित क्यों उसके नित्य के काम हों

कि वह हंसने-मुस्कुराने को तरसे

अपनों के लिए कुछ कर पाने को तरसे

 

प्रभु !

तुम्हारी करुणा

कुछ उस पर भी बरसे

कि उसे स्वस्थ, सानंद देख

पूरा घर हरसे।

 

  1. ध्यान रहेमहादेव!

ध्यान रहे, महादेव!

 

गंगाजल से नहा रहे हो

दूध से नहा रहे हो

घी से नहा रहे हो

शहद से नहा रहे हो

 

ध्यान रहे, महादेव!

आंसुओं से नहाना

न पड़े

वह भी प्यार के

गहरे और सच्चे प्यार के

 

ध्यान रहे ,महादेव!

वह आया है

सब तरफ़ से हार के।

 

  1. और क्या चाहता

बीमार बीवी के 

होंठ चूमे

और उन्हीं होंठों से

ओम् नमः शिवाय करने लगा

 

बीवी ठीक हो जाय

और मैं क्या चाहता!

 

  1. चांदनी के बिना

ऐ चांद!

जैसे तू है

और तेरी चांदनी है

वैसे ही 

मैं हूं

और मेरी चांदनी है

 

तू अपनी चांदनी के बिना रह सकता है क्या?

 

मैं क्यों रहूं?

 

चांद

आज रात-भर

तू मेरे लिए

दुआ कर !

 

  1. यह राग है

यह राग है

यह आग है

यह आग जला देती है

शुष्क मस्तिष्क की सारी दार्शनिकता

जब यह जलती है हिये

शोले उठते हैं

संयोगावस्था में

और तरल, तप्त धारा निकलती है

वियोगावस्था में

जो बहा देती है

सूखी आंखों की समूची आध्यात्मिकता!

 

 

 

  1. स्वयं याची

 

आंखों में आंसू लिये

झोली फैलाये

साष्टांग दंडवत कर

प्रार्थना करतीं 

भगवान की मूरत के आगे

इस तरह कहीं नहीं देखता हूं औरतों को

देखकर जिन्हें ठेस लगती है

और अपने को होता है

उनकी संस्तुति कर दूं

लेकिन मैं कौन होता हूं भगवान का

मैं तो स्वयं एक याची हूं

अपनी पत्नी के लिए

अस्पताल के बाहर इस मंदिर में।

 

  1. बाबा रे बाबा

 

धीरे-धीरे

रुक-रुक कर 

मिट्टी समतल की जाती है,

धीरे-धीरे

रुक-रुक कर

गिट्टी डाली जाती है,

धीरे-धीरे

रुक-रुक कर

अलकतरा पोता जाता है,

इस तरह

जिस तरह

सड़क बनती है

कई साल में,

इलाज़ होता है

जांच-दर-जांच

अस्पताल में।

बाबा रे बाबा!

 

 

  1. बुरे दिन तो ये हैं

 

तुमने कहा था​

कितने अच्छे थे वे दिन

जब पैसे होते थे कम

पास अपने

 

कितने प्यारे लगते थे बच्चे

यूनीफ़ार्म में

स्कूल आते-जाते

 

अपने आप में

अलमस्त हम

नहीं जानते थे

क्या होते हैं ग़म

 

तब डाक्टर ने

तुम्हारी ओवरी

निकाली नहीं थी

और तुम्हें व्याधियों ने घेरा नहीं था

 

बार-बार​ याद आती है

वह तुम्हारी बात

 

मेरे लिए

वे दिन भी इतने बुरे नहीं थे

जब अस्पतालों और निदान केंद्रों के

चक्कर लगाते बीतते थे दिन

महीने-महीने मैं बैठा रहता था

अस्पताल के वार्ड में

तुम्हारे बेड की बग़ल में कुर्सी पर

और रात चादर बिछाकर

तुम्हारे बेड के नीचे ही सो जाता था

‘तुम ठीक हो गयी हो

और हम सितारों की सैर पर निकल पड़े हैं’

के सपनों में​ खो जाता था

 

बुरे और बहुत बुरे दिन तो

ये हैं

जब तुम नहीं हो

 

  1. कैसे

 

मैं हंसती-बोलती दुनिया में

रोने को मजबूर

तुम दूर

बहुत दूर

 

या इतने पास

इतने पास

कि एकदम मेरे अंदर

मेरे अंदर के अंदर

 

मैं अपनी बांहें इतने अंदर कैसे ले जाऊं!

मैं अपनी बांहें क्षितिजों के पार तक कैसे फैलाऊं!!

 

  1. यह भूख और प्यास

 

एक भूख है

जो कभी नहीं मिटती

एक प्यास है

जो कभी नहीं बुझती

 

यह भूख

पेट की नहीं

प्राणों की है

यह प्यास

गले की नहीं

मन-मराड़ों की है

 

यह भूख

यह प्यास

बहुत तीक्ष्ण और तीव्र है

 

इस भूख-प्यास को लिये-लिये

कैसे जिये जा रहा जीव है

एक-एक पल !

 

यह अलग बात कि

इस भूख-प्यास से

मरता नहीं कोई

बरसों- बरसों !

 

  1. मुहब्बत

 

ये बात तो

तब मरी होती

जब मैं भी मरा होता

न कि रोता

तुम्हारे मरे होने पर

 

यही तो बात है

ये बात

मरी नहीं

न मरेगी

 

तुम्हें मैं नहीं जिला सका

लेकिन इसे मैं जिलाये रखूंगा

अपनी अंतिम सांस तक।

 

  1. तुम्हारी तस्वीर

 

तुम्हारी तस्वीर में

वह सब कुछ है

जो तुममें था

ख़ुशी, उदासी, उत्सुकता

प्रेम, सरलता, यौवन

 

रात्रि के आसमान में कोई जितना देखेगा

उसे उतनी ही दुनिया दिखायी देगी

ऐसा ही कुछ है

तुम्हारी तस्वीर में

 

यह पड़ी थी

कहीं जीर्ण होते एलबम में

इसे बड़ा करा

शीशे में जड़ा दिया

तो एक जान आ गयी

इसमें

 

यह प्रतिक्रिया भी करती है

और क्रिया भी

मैंने महसूस किया है

हृदय नेत्र में तह-तह

 

आसमान देखने की तरह

जितना ध्यान दिया है

उतना ही महसूस किया है।

 

 

  1. चांद नहीं आयेगा

 

मेरे दिल में

बहुत-बहुत प्यार उमड़ रहा है,

लेकिन मैं क्या करूं?

 

मेरे दिल में

उमड़-उमड़ कर रह जायेगा

यह बहुत- बहुत प्यार

 

चांद नहीं आयेगा

अब कभी नहीं आयेगा

आर या पार

मेरे आग़ोश में।

 

 

  1. मुझे जीना है

 

मुझे पीड़ा पहुंचाने वाला

हर एक

मौजूद है

दुनिया में,

मुझे प्यार करने वाला

चला गया

दुनिया से

 

मुझे जीना है

दुनिया में

ख़ुद अपने आंसू पोंछते हुए

ख़ुद अपने घाव धोते हुए

ख़ुद से बतियाते हुए

लेकिन प्रेम करना चाहूं तो

क्या ख़ुद को

लिपटाते हुए

संभव है ?

 

  1. उसी को मांगूंगा

 

मैं तो

मांगूंगा भगवान से

उसी को

जिसको मैंने प्यार किया है

जिसने मुझे प्यार दिया है

जिसको उसने ले लिया है

 

मैं तो

मांगूंगा भगवान से

उसी को

वापस करे वह मुझे

 

करे, न करे वह वापस मुझे

मैं तो मांगूंगा

उसी को

भगवान से

और कुछ नहीं

कभी।

 

 

  1. मैं और तुम

 

मैं नहीं जानता

तुम्हारा पता

तुम कहां हो

लेकिन मैं हूं यहां

अकेलेपन के नर्क में।

 

  1. एक दिन

 

एक दिन

प्रकृति​ मर जायेगी

रोयेगा ईश्वर

उसके बिन

तन्हा

 

  1. एक यह भी है

 

ख़त्म होने को

क्या नहीं ख़त्म हुआ है

बस हमारा रिश्ता नहीं ख़त्म हुआ है

गर हमारा रिश्ता नहीं ख़त्म हुआ है

तो क्या ख़त्म हुआ है

एक यह भी है

जिसे मेरे दिल ने लिया मान

अपने और तुम्हारी तस्वीर के दरम्यान

संवाद के दौरान

 

  1. वह प्रकृति-रस

 

मैं देख रहा हूं

इंद्रधनुषी धरती

और धूप-धुला नीला आसमान

नीले जल की चौड़ी धारा

लेकिन मेरा मन है

अकेला, मलिन, थका-हारा 

जस का तस

 

कहां चला गया

वह प्रकृति-रस

मेरे प्यार के साथ ?!

 

  1. दृश्यता- अदृश्यता

 

दृश्यता में

सब स्पष्ट रहता था

आकृति, दूरी और नज़दीकी

 

अदृश्यता में उलझन होती है सरासर

दूरी और नज़दीकी को लेकर

जबकि आकृति को लेकर

आंख रोती है झराझर

 

  1. पर्यटन का नक़्शा

 

पर्यटन​ के नक़्शे से

ताजमहल कट गया

 

मैं उत्तर प्रदेश के

पर्यटन विभाग के

नक़्शे की बात

नहीं कर रहा हूं

मैं अपने नक़्शे की बात 

कह रहा हूं

जिसमें ताजमहल ही नहीं

खजुराहो भी कटा है

और अजंता, एलोरा भी

 

लेकिन काटने वाला

मैं नहीं हूं

और न प्रादेशिक सरकारें

 

काटने वाला

ईश्वर है

 

इन कटे स्थानों वाला नक़्शा

अब मेरे किसी काम का नहीं

 

असि और वरुणा के बीच का

फैलाव ही

अब मेरा ब्रह्मांड है

 

पवित्र गंगा के

मणिकर्णिका घाट पर

तुम्हारा हो चुका

मरण कांड है

मेरा होना है

 

  1. मुख्य किरदार

 

ऐसा नहीं है

कि उदास अभी ही हुआ हूं

आंसू अभी ही निकल रहे हैं

 

इस लम्बी ज़िंदगी में

सैकड़ों बार​

ऐसा हुआ है

बहुत बार तुम्हारे सामने भी

लेकिन कोई बात

काग़ज़ पर नहीं लिखी

जैसे वो रही ही न हो इस मायने की

 

इस बार सारी दास्तान दिल पर

इस तरह लिख गयी है

जैसे पत्थर की सिल पर

मगर इसे पढ़ने के लिए

तुम नहीं हो अब

जबकि तुम ही हो

मुख्य किरदार।

 

  1. ये वो ख़ुशियां भी दें

 

जो तुमने कभी नहीं दिया

वो दर्द

तुम्हारी यादें दे रही हैं

 

ये वो ख़ुशियां भी दें तब न

जो तुमसे मिलती थीं

या नहीं मिलती थीं !

 

 

  1. अध्यात्म- मार्ग पर

 

पके फल में

कीड़ा न हो

मैं तुम्हें याद करूं कितना

मुझे पीड़ा न हो

बल्कि जो हो रही है

वह भी मौज में ढल जाये

किन जीवन-युक्तियों के द्वारा

सोचता हूं मैं चलते हुए थका-हारा

थोपे गये अध्यात्म- मार्ग पर

दैवीय शक्तियों के द्वारा।

 

 

  1. एक ख़ास चीज़

 

कुछ ज़्यादा ही

हसरत से

देखने लगा हूं दुनिया को

और होने लगा हूं उदास

 

ये चीज़ हुई है

एक ख़ास

इधर मेरे जीवन में

 

यह ज़्यादा भयानक है

या इसके पीछे का ताज़ा इतिहास

जब एक दिन अचानक

मेरे ध्यान का काया-केन्द्र ढह जाता है

और मेरे सुख-सपने बिखर जाते हैं

समस्त सृष्टि में

मगर  दृष्टि में

नहीं आते।

 

 

 

  1. असफल

 

मैं सिग्नल भेज रहा हूं

अपने नाशकेन्द्र से

प्रेमिल सृजन-कामनाओं हेतु

एक ऐसी आत्मा को

जो ब्रह्मांड में विचर रही है कहीं

इनके जीवन-सूत्र लिये

 

नासा वालों की तरह

मेरे पास वैज्ञानिक यंत्र नहीं हैं

मात्र हार्दिक उपकरणों से

मैं अपने काम में जुटा हूं

हर पल

 

नासा वाले

वह ग्रह तलाशने में नाकाम हैं

जहां उनके लिए

जीवन की संभावना है,

नासा वालों की तरह

मैं भी हूं असफल

अपने मिशन में।

 

  1. यही अच्छा है

 

मैं अपने मन से

दूर नहीं जा सकता

इसलिए  मैं तुम्हारी यादों से भी

दूर नहीं जा सकता

 

मैं अपनी आंखों से

दूर नहीं जा सकता

इसलिए मैं आंसुओं से भी

दूर नहीं जा सकता

 

ऐसा होता तो

मैं पीड़ा से मुक्त हो जाता

फिर सोचता हूं कि

यही अच्छा है

वरना मैं रिक्तता युक्त हो जाता।

 

 

  1. दुख-सुख और बाज़ार

 

मेरे दुख से

बाज़ार लुढ़क गया था।

अब फिर

चढ़ने लगा है।

 

मैं ख़रीदने लगा हूं

दुख उन्मूलन की

बहुत-सी सामग्री।

 

आश्वस्त हुआ बाज़ार

अपनी मज़बूती को लेकर।

 

पिछली मंदी की भी

परिपूर्ति करते हुए

वह नया उछाल लेगा

जब मैं ख़रीदने लगूंगा

सुख के सामान।

 

 

  1. मेरी दशा

 

फूलों से अलग मेरी दशा है

वे खिले हैं किस क़दर

 

पंछियों से अलग मेरी दशा है

वे चहक रहे हैं परस्पर

 

उन जोड़ों से अलग मेरी दशा है

जिनके साये 

एक-दूसरे से लिपटे

टहल रहे हैं घास पर

 

 

  1. किशोर

 

मैं​ कैसे बाहर का रास्ता दिखाऊं

उस किशोर को

जो इस बूढ़े होते शरीर में

आज भी बसा है

जो प्रेम करना चाहता था

जो कविता लिखना चाहता था

जो प्रकृति के बीच रहना चाहता था

 

सब तो पूरा कर रहा था

यह शरीर

सब तो पूरा कर रहा है

यह शरीर

सिवाय प्रेम की इच्छा-पूर्ति के

वह भी कर ही रहा था

यह शरीर

जब तक थी वह

इस शरीर की चिरसंगिनी

मगर जो कही जायेगी

उसी की प्राणप्रिया

 

मैं इस किशोर को क्या समझाऊं

जो अपने बूढ़े होते शरीर की बात नहीं सुनता

कहता है कि उसे लाओ

मिटाओ मेरी प्रेम की भूख

बुझाओ मेरी मुहब्बत की प्यास

और रोने लगता है

एक बच्चे की तरह

हिचकियां लेकर?

 

 

  1. एक आत्म निर्देश

 

क़ाबू में रखना है

अपना दिमाग़

और दिल

मुश्किल-दर-मुश्किल

दाग़-दर-दाग़

जीवन के अंतिम

क्षण तक

 

पक गए

अभी से ?

 

नहीं, 

कुछ सपने देखो नये आसार के लिए

ज्ञान-ध्यान से अपने को भरो

और कुछ कर सकते हो

संसार के लिए

तो करो!

 

 

 

  1. तुम्हारा बिम्ब

 

तुम मेरे दिल में हो

किसी को नज़र आता है क्या

तुम मेरी आंख में हो

तो भी

किसी को नज़र आता है क्या

 

जब तक आंसू न बने

और कविता धांसू न बने

किसी को नज़र आता है क्या

तुम्हारा बिम्ब सुहाना

टटका या पुराना ?

 

  1. सवेरा

 

आंखें खोलो

पूरब में लाली छायी है

एक बड़ी सुंदर सुबह

आसमान से उतरती आ रही है

चिड़िया-चिड़िया गा रही है

स्वागत में मधुर गान

 

आंखें खोलो

मेरी जान!

सुनो

मेरी जान !

 

यह क्या अदृश्यता की चादर ओढ़ ली

जिसमें गुम होकर

सो रही हो

अभी तक !

 

  1. बिछड़ जाने की पीड़ा

 

संबंध बनने की

जो ख़ुशी होती है,

संबंध बिगड़ने की

जो पीड़ा होती है

वह बराबर है लगभग

 

दोनों के जोड़ से

जितनी मात्रा बनती है

उससे ज़्यादा पीड़ा है

संबंध टूटने में

 

हर पल प्रेमपूर्वक रहते हुए

सदा के लिए अचानक

बिछड़ जाने की पीड़ा

हर जोड़-घटाव से परे हो जाती है

जिसे आंख जानती

या छाती है।

 

  1. आत्मा और देह

 

आत्मा कह रही थी

बचा लो

इसे बचा लो

यह देह है

मेरा गेह है

 

आत्मा किससे नहीं कह रही थी

 

अन्न से

औषधि से

जल से

पवन से

धरती से

आकाश से

सूर्य के प्रकाश से

 

आत्मा किससे नहीं कह रही थी

 

देवियों से

देवताओं से

महर्षियों से

मनुष्यों से

 

बचा लो

इसे बचा लो

यह देह है

मेरा गेह है

 

किसने सुना

और कितना

यह बाद की बात है

 

अभी तो आत्मा कह रही है

 इसे जला दो 

जला दो इसे !

 

 

  1. यादें और तस्वीरें

 

मेरे पास

सन् पचासी की एक तस्वीर है

तो छियासी, सतासी, अठासी, नवासी की

कोई तस्वीर नहीं है

फिर एक तस्वीर नब्बे की मिलती है

फिर तिरानबे की एक

फिर छानबे की एक

आख़िरी है सन् दो हज़ार सत्रह की एक

 

मतलब मेरे पास

तुम्हारी कुल बत्तीस तस्वीरें भी नहीं हैं

और यादें साल, महीने, हफ़्ते, दिन की

 

ये यादें आगे कहां तक जातीं

और कितनी तस्वीरें होतीं

अगर नव नवम्बर सन् सत्रह इस तरह नहीं आता

कि तुम्हें भी अपने साथ लिये जाता

 

कोई ज्योतिषी भी नहीं बता सकता

 

स्मार्ट फोन की बलिहारी

कि छायाकार तो अब मैं ही हो चला था

मगर मैं भी नहीं बता सकता

मैंने कितनी तस्वीरें खींची होतीं

तब तक तुम्हारी !

 

 

  1. वही-वही

 

जैसे अपने प्रियतम को

खोने के अहसास से गुज़रे

कोई प्रियतमा

भरी जवानी में

 

मैं गुज़र रहा हूं

पुरुष होकर

सत्तावन साल से ऊपर जाती

ज़िंदगानी में

 

वही तड़प मेरे सीने में

वही दर्द अपने

वही आंसू मेरी आंखों में

वही मृत सपने

 

 

  1. डर

 

तुम्हें खोने का

एक डर था

मेरे हृदय में

उस डर में

और कितने डर थे

 

तुम्हें खो दिया तो

डर भी खो जाने थे

यही न होना था क़ायदे से

कि और हो जाने थे डर

मेरे हृदय में

इस स्वार्थ और हिंसा से भरे समय में ?

 

 

  1. नयी व्यवस्था

 

तुम्हें सुनना चाहूं तो

किसी चिड़िया को सुनूं

 

तुम्हें देखना चाहूं तो

चांद को देखूं

 

तुम्हें छूना चाहूं तो

फूल को स्पर्श करूं

 

तुमसे कुछ कहना चाहूं तो

हवा से कहूं

 

तुम्हें बांहों में लेना चाहूं तो

पेड़ के तने को घेरूं

 

मेरे लिए

यह नयी व्यवस्था है

जीवन की

ईश्वर के द्वारा

 

 

  1. तुम्हारे ईश्वरत्व में अगर कुछ कमियां रहीं

 

पग-पग पर

चमत्कृत करते हो ईश्वर

वस्तुगत संसार हो या जीव का विधान

अद्भुत है तुम्हारी हर रचना महान

 

तुम कब किससे मिलवाओगे

कौन-सी ख़ुशी से

आह्लादित कर जाओगे

आश्चर्यजनक रूप से

कोई नहीं जानता

 

मगर क्या तुम जानते हो

तुम जब जिससे बिछड़वाओगे

सदा के लिए

किस अथाह, अपार पीड़ा से

गुज़रेगा वह

जो रह जाता है

तुम्हारे दृश्य-जगत में अकेला

 

वह लाख चाहे

एक बार उससे मिलवा दो

लेकिन नहीं,

नहीं, नहीं, नहीं!

 

तुम्हारे ईश्वरत्व में

अगर कुछ कमियां रहीं

तो कुछ यही,

यही, यही, यही !

 

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