शिवदयाल की कहानी ‘खटराग’

ईश्वरी बाबू मेरे पड़ोसी हैं। अक्सर शाम को हम साथ ही बैठते हैं और चाय पीते हुए देर तक बातें करते रहते हैं। इसमें रस बहुत मिलता है। और ईश्वरी बाब तो जरा-सी बात को ऐसा मोड़ और ऐसी गहराई दे देते हैं कि मन नहीं चाहता कि उनकी बात खत्म हो। उनके पास जानकारी का खजाना है। न जाने वह क्या-क्या जानते हैं। तीन बच्चे, तीनों अपने पाँव पर, छोटा-सा मकान, कोई झंझट नहीं, खिच-पिच नहीं। उनकी किस्मत पर भी रश्क होता है। इस जमाने में जबकि आदमी नाक से पानी पीने को मजबूर है, ईश्वरी बाबू चैन की बंसी बजाते हैं।

एक दिन मैंने बातों ही बातों में अपने मुहल्ले के रमेन्द्र बाबू के बारे में जिक्र किया तो कहने लगे, ‘अजी, मैं उन्हें जानता हूँ। उनकी भी एक कहानी है, पीड़ा भरी।’

मैंने सोचा ईश्वरी बाबू मुझसे भी गप हाँक ही लेते हैं। भला वे महीना भर पहले इस मुहल्ले में किरायेदार के रूप में आये रमेन्द्र बाबू के बारे में क्या जानते होंगे। और वह भी उनकी कहानी पीड़ा भरी हो? यह हो सकता है क्या? वे इंजीनियर हैं, ठाठ से रहते हैं, चार चक्के की सवारी है। सुनते हैं कहीं मकान भी बनवा रहे हैं।

मैंने यूँ ही उन्हें छेड़ने की गरज से पूछा, ‘‘आप रमेन्द्र बाबू को भला कैसे जानते हैं? वे तो आपकी जात के भी नहीं है?‘‘

‘‘अब बताइए, इतने दिनों का आपसे सम्बन्ध है। मैं आपसे झूठ कहूँगा भला? आप दीना बाबू, मुझ पर शक भी कर लेते हैं और पूछते भी हैं। कोई एक छोर पकड़िए।‘‘ कहकर ईश्वरी बाबू कुर्सी पर आराम से फैल-से गये। मैं थोड़ी देर चुप रहा लेकिन अब तो मेरे मन में रमेन्द्र बाबू ही रमेन्द्र बाबू थे। सो ईश्वरी बाबू से कहा-

‘‘आप भी ईश्वरी बाबू, जरा-सी बात का अर्थ-अनर्थ निकालने लगते हैं। अब जब आपने यह किस्सा छेड़ा है तो चुप क्यों हो गये? सुनाइए क्या कहानी है? लेकिन जो हो वो बताइएगा. नमक-मिर्च मत लगाइएगा।‘‘ मैने मनुहार करते हुए कहा।

‘‘क्या बताएँ। लम्बा किस्सा है!‘

‘‘क्या किस्सा है, कहिए तो।‘‘

‘‘आपने उनके घर कभी किसी महिला को देखा है?‘‘

‘‘नहीं, कभी नहीं!‘‘ मैंने जैसे याद करके कहा।

‘‘बच्चों को?‘‘

‘‘बिल्कुल नहीं! क्यों?‘‘

‘‘यह आपको किस्सा नहीं लगता? यही तो कहानी है भाई! अब कुछ पकौड़ियाँ वगैरह मँगाइए….‘‘

मैंने अन्दर आवाज दी। फिर ईश्वरी बाबू शुरू हो गये….

‘‘उन दिनों मेरी पोस्टिंग आर.एम.एस. में थी। बाबू विष्णुदेव नारायण मेरे सहकर्मी भी थे और पड़ोसी भी। बड़े सज्जन पुरुष थे। लेकिन उनकी एक बहुत बड़ी कमजोरी थी। वह थी सुरा, शराब! कभी-कभी तो वे दफ्तर में भी पीकर आ जाते थे। उनकी सज्जनता की खातिर उनकी इस आदत को हम नजर अन्दाज कर देते थे। बल्कि कभी-कभी तो उनकी हरकतें आर.एम.एस. के शुष्क और मशीनी माहौल में राग-रंग भर देतीं। उनके तीन बच्चे थे- दो बेटे और एक बेटी। सबसे बड़ा था पुरुषोत्तम नारायण। बड़ा मेधावी! उसके बाद ममता थी,  सबसे छोटा था आदित्य नारायण। यह कुनबा अपने पुराने व बेरौनक-से पुश्तैनी मकान में रहता था जो पीढ़ी दर पीढ़ी बँटता चला आया था। उसमें के तीन कमरे इस परिवार को मिले थे। सच पूछिए तो बाबू विष्णुदेव नारायण के भाई-पट्टीदार ही उनके निकटतम पड़ोसी थे। अपने ही लोग जब अपने पडोसी हो जाते हैं तो एक विचित्र-सी स्थिति पैदा हो जाती है। मानो अपने लोगों से भी पड़ोसियों-सा व्यवहार करना पड़ता है। इसमें सुख-दुःख, जन्म-मरण आदि जगत्-व्यवहार भी बदल जाते हैं।

तब केन्द्र में मोरारजी भाई की सरकार गिर गयी थी। हम लोग नयी राजनीतिक परिस्थिति पर चर्चा करते दफ्तर में काम शुरू कर रहे थे कि खबर मिली- विष्णुदेव बाबू नहीं रहे। बड़ा सदमा पहुँचा। हम लोग फौरन उनके घर पहुंचे। पता चला, रात को ठीक से खा-पीकर सोये थे। सुबह-सुबह उठने में देर हुई तो उन्हें जगाया जाने लगा। मालूम हुआ, इतना जगाने के बाद भी वे उठते नहीं हैं। नब्ज-नाड़ी देखी गयी, डॉक्टर बुलाया गया। पता चला कि अलस्सुबह तकरीबन चार बजे वे अन्तिम यात्रा के लिए प्रस्थान कर चुके थे। मैं उनका पड़ोसी तो था ही, सहकर्मी भी था। जो भी तत्काल आर्थिक सहायता विभाग के द्वारा हो सकती थी, उसका इन्तजाम किया गया। व्यक्तिगत स्तर पर भी मुझसे जो कुछ हो सकता था, मैंने किया। पुरुषोत्तम तब कोई उन्नीस-बीस साल का रहा होगा। सब उसे ही करना पड़ा। रिश्तेदार तो बस नाम भर को सामने खड़े रहे। मैंने और कुछ अन्य मित्रों ने इस घोर विपत्ति में उस परिवार के लिए जितना बन सकता था, हर स्तर पर उतना किया। मेरी पत्नी तो कोई हफ्ता भर पुरुषोत्तम की माँ को ही सँभालने में लगी रहीं।

अब मृतक स्व. विष्णुदेव नारायण के आश्रित की नियुक्ति का मामला सामने था। मेरी पत्नी ने पुरुषोत्तम की माता से बात की। दो ही व्यक्ति पात्रता में फिट बैठते थे एक स्वयं श्रीमती नारायण एवं दूसरा पुरुषोत्तम। पुरुषोत्तम की माँ ने भरे दिल से कहा- बच्चों को किसके सहारे छोड़कर नौकरी के लिए निकलूँ। लड़की भी सयानी हो रही है। पुरुषोत्तम ही ठीक रहेगा। वह पढ़ाई भी साथ में करता रह सकता है। मैं पढ़ी-लिखी भी कहाँ हूँ! मुझे तो ज्यादा से ज्यादा चपरासीगिरी ही मिल पाएगी। पुरुषोत्तम तो फिर भी क्लर्क बहाल हो जाएगा।‘‘

पुरुषोत्तम को ही उपयुक्त माना गया। आवश्यक औपचारिकताएं पूरी करके दैनिक श्रेणी लिपिक के दर पर उसकी नियुक्ति कर ली गयी। इसके कोई तीन-चार माह पश्चात् की बात है। मैं रात में रेडियो पर समाचार सुन रहा था। दरवाजे पर दस्तक हुई। बच्चे पढ़ रहे थे, मैंने खुद ही दरवाजा खोला- पुरुषोत्तम था और अन्दर आने में झिझक रहा था। हाथ में उसके एक लिफाफा नजर आया। मैंने उसे अन्दर लाकर बिठाया, हाल-चाल पूछा। उसने हाथ का लिफाफा मेरी ओर बढ़ा दिया।

मैंने लिफाफे के अन्दर से कागज निकाला और एकबारगी खुशी से उछल पड़ा। पुरुषोत्तम का मेडिकल कॉलेज में नामांकन के लिए बुलावा आया था। मैंने उसे खूब शाबाशी दी। पत्नी भी रसोई छोड़कर आयीं और बच्चे भी आकर खड़े हो गये। मैंने बच्चों को कहा, ‘‘देखो, लड़का हो तो पुरुषोत्तम जैसा। एक ही प्रयत्न में मेडिकल निकाल लिया। इसी से कहता हूँ मन लगाकर पढ़ो, पूरी मेहनत और लगन से। सफलता जरूर मिलेगी, जैसी पुरुषोत्तम को मिली।’ बच्चों ने सुना और पुरुषोत्तम से मिठाई की मांग शुरू कर दी। और तब मैंने लक्ष्य किया- पुरुषोत्तम तो जैसे इन बातों में है ही नहीं। मैंने पूछा-

‘‘पुरुषोत्तम, क्या बात है?‘‘

‘‘चाचा, वह होगा कैसे?‘‘ उसने मुझे बुझी आँखों से देखा और नजरें नीचे कर लीं।

‘‘मतलब? बेटा, यह भगवान ने तम्हें ऐसा अवसर दिया है और तुम इस तरह की बात कर रहे हो?‘‘ मैं कुछ उत्तेजित हो आया।

‘‘कैसे हो पाएगा! या तो नौकरी छोड़ूं या फिर मेडिकल कालेज। बताइए क्या करूं।‘‘

‘‘क्या कहते हो पुरुषोत्तम!‘‘ मैं आहत हो गया। देखा कि वह हथेलियों में चेहरा छुपाये रोने लगा है। उसे देखकर पहली बार स्व. विष्णुदेव नारायण के लिए मन में इतनी घृणा उपजी कि क्या कहूँ। निठल्ला आदमी कितना कुछ बर्बाद कर गया। इस फूल से बच्चे के भविष्य को चौपट कर गया, दारूबाजी के चक्कर में। ऐसा कुलदीपक! जो समूचे खानदान का नाम रोशन करता, आज अपनी तकदीर पर आँसू बहा रहा है। कैसे उस नराधम की आत्मा को शान्ति मिलेगी। ईश्वर उसे कभी माफ नहीं करेगा।

बेचारा पुरुषोत्तम आखिर चला गया। पत्नी ने जो मिठाई उसके लिए इस बीच मंगा ली थी, वह प्लेट में रखी ही रह गयी। बड़ी पीड़ा हुई। मैं उसे क्या कहता। वह तो खुद कितना समझदार था। इस कमसिन उम्र में उसकी समझदारी से न मालूम क्यों बहुत अफसोस होता था।

दिन निकलते गये। पुरुषोत्तम हमारे दफ्तर का एक काबिल और कर्मठ कर्मचारी साबित हुआ। उसके जिम्मे विभाग की कुछ महत्त्वपूर्ण फाइलें आ गयीं। कहता अब भी मुझे वह चाचा ही था लेकिन साथ-साथ काम करते हमारे बीच पीढ़ियों का अन्तर होते हुए भी उतनी दूरी नहीं रह गयी थी, बल्कि एक सख्य-भाव हम दोनों के बीच विकसित होता गया था। कभी-कभी अपनी घरेलू समस्याओं की भी चर्चा हम एक-दूसरे से कर लेते और कभी-कभी तो मार्गदर्शन भी करते। चूँकि वह मेडिकल छोड़कर आया था इसलिए दफ्तर में अपने समकक्षों के बीच उसका रुतबा कुछ अधिक था। लेकिन वह शरीफ लड़का था, कभी आपे से बाहर नहीं गया।

एक दिन लंच के समय हम अपने-अपने टिफिन डब्बे के साथ बैठे थे। कहने लगा-‘‘चाचा, कोई लड़का दिखे ठीक-ठाक तो कहिए।‘‘

‘क्या करना है?‘‘ मैंने यों ही पूछा, कुछ नहीं समझकर।

‘‘अरे, ममता के लिए चा…!‘‘

‘‘ओ हो ! हाँ हाँ, जरूर ! कोई दिखेगा तो जरूर कहूँगा। बल्कि मैं भी चलूँगा तुम्हारे साथ।‘‘

‘‘बड़ा टाइट मामला है चचा! कुछ समझ में नहीं आता, बेड़ा कैसे पार लगेगा!‘‘

‘‘ऊपरवाला है न बेटा! वही सबको पार लगाता है। बेटी किसी की कभी घर बैठी रही है भला? देखना तुम, ममता की खूब अच्छी शादी होगी। तुम चिन्ता न करो।’’

‘‘देखिए चा…इनती मेहनत तो कर रहा हूँ। सुबह नौ बजे बाहर निकलता हूँ तो वापस नौ बजे ही घर लौट पाता हूँ।‘‘

‘‘क्यों? शाम को क्या करते हो?‘‘

‘‘कुछ ट्यूशनें कर रखी हैं। नहीं तो कैसे ममता की शादी का मामला निपेटगा।‘‘

‘विष्णुदेव बाबू को जो डेथ बेनिफिट मिला, वह तो होगा न? काम निकल जाएगा!‘‘ मैंने याद करके जैसे आश्वस्त होते हुए कहा।

‘आप भी चचा…! उतने में लड़की का ब्याह आजकल एक चपरासी के साथ नहीं हो सकता।‘‘

मैंने सोचकर देखा। ठीक ही तो कह रहा था वह। उसके लिए मन में संवेदना उपजी। फिर मैंने उसका हौसला बढ़ाया और इत्मीनान रखने को कहा।

    मैंने जहाँ-तहाँ बात चलायी भी लेकिन माँग इतनी थी कि उसे पूरा करना पुरुषोत्तम के वश का नहीं था। इस स्थिति में अब मेरे लिए अपनी तरफ से पहल करना सम्भव नहीं रह गया था।

बालेश्वर बाबू हमारे मुहल्ले के पुराने बाशिन्दों में थे। उनके घर कभी-कभी आना-जाना होता था। वे बुजुर्ग थे- पुराने रईस। रईसी तो अब तक नहीं रही थी लेकिन सम्मान बचा हुआ था। लम्बा-चौड़ा परिवार था उनका। अक्सर उनके घर कोई न कोई अतिथि आया होता और वह ज्यादातर उनका करीबी रिश्तेदार ही हुआ करता। हम, उनके पड़ोसी उनके आतिथेय पर चकित रहते और अक्सर मन ही मन उनकी आमदनी और खर्च का हिसाब लगाते रहते। मगर हाथ कुछ न आता।

इतवार का दिन था। सुबह नाश्ता-पानी करके बालेश्वर बाबू के घर गया। उनसे अपने एक रिश्तेदार के लिए मकान की व्यवस्था करने के सम्बन्ध में बात करनी थी। मकान दिलवाने के वे विशेषज्ञ माने जाते थे। पहुँचा तो वे बाहर बरामदे में ही हजामत कर रहे थे- बड़े मनोयोग से। और बीच-बीच में मुझसे बात करते जाते। मैं उन्हें दाढ़ी-मूंछ से विरक्त ही समझता था, सफाचट ! लेकिन उस दिन मालूम हुआ कि वे बहुत हल्की और बारीक मूंछों की एक सफेद पंक्ति-सी बनाना नहीं भूलते और इसमें उनका खासा समय खर्च होता है। बाद के दिनों में जब भी मुलाकात होती, पहले उनकी मूंछों पर ही दृष्टि जाती जो एक ही रूपाकार में उनके मोटे होठों और खिंचे हुए नथुनों के बीच एक सफेद विभाजक रेखा की तरह चिपकी रहती।

हजामत कर चुकने पर उन्होंने सामान उठा ले जाने के लिए आवाज दी तो एक नवयुवक बाहर निकला, घड़ी भर को खड़ा रहा फिर सामान लेकर अन्दर चला गया। उसे पहले कभी देखा नहीं था, सो पूछ बैठा। उन्होंने बताया, ‘‘यह रमेन्द्र है, मेरा भांजा। ओवरसियरी करके आया है। कुछ दिनों रहेगा। मैंने कह रखा है कि नौकरी का जुगाड़ होने तक यहीं रहे।‘‘

वह युवक यानी रमेन्द्र मुझे भा गया। शिष्ट और शालीन लड़का मालूम हुआ। और तत्क्षण ही ममता का ध्यान आया, पुरुषोत्तम की बहन।

‘‘आजकल ऐसे लड़के दिखते कहाँ हैं साहब! बताइए इतना शिष्ट और सादा लड़का। इनके पिता कहाँ हैं?‘‘

’’हेडमास्टर हैं। सत्संगी। अहाहा! क्या व्यक्तित्व है उनका। देखते ही आदमी अभिभूत हो जाए। मैं कहता हूँ ईश्वरी बाबू, मैं बहुत भाग्यवान हूँ जो उनकी सोहबत मिली मुझे। हम बहुत अच्छे मित्र भी हैं न!‘ वे अन्त में हंसे, लयबद्ध हँसी, और मुझे चाय लेने को इशारा किया। अब तक चाय आ चुकी थी।

बड़ी अच्छी जोड़ी जंच रही थी। दूसरे दिन दफ्तर में ही पुरुषोत्तम को मैंने रमेन्द्र के विषय में बताया। पहले तो वह ओवरसियर सुनकर हतोत्साहित हुआ लेकिन जब मैंने बताया कि लड़का संस्कारी परिवार का है तब वह खुश हो गया। बात चलाने की जिम्मेवारी उसने मुझपर ही डाल दी। मैं कुछ पसोपेश में पड़ा लेकिन पुरुषोत्तम के लिए इतना करने में मझे कोई दिक्कत न थी। उस दिन दफ्तर से लौटा तो यह बात उत्साह में पत्नी को भी बताने से अपने को रोक न सका। वह तो फौरन ऐसे खुश हो गयी कि लड़का मानो उसकी मुट्ठी में हो। मेरा उत्साह और बढ़ा लेकिन इस बीच एकाध हफ्ते के लिए विभागीय कार्य से मुझे बाहर जाना पड़ा। वापस लौटा तो इस प्रसंग में अलग ही किस्सा सुनने को मिला। मैं बहुत संकोच में पड़ गया।

बालेश्वर बाबू की सबसे छोटी अनब्याही लड़की मंजू और ममता पक्की सहेलियाँ थी- संग-संग पली-बढ़ीं और पढ़ीं। दोनों एक-दूसरे के घर आती जाती रहती, कभी पढ़ाई की खातिर तो कभी कढ़ाई-बुनाई का खातिर । तब टीवी का प्रचलन नहीं था। आजकल के बच्चे तो अक्सर दोस्तों के घर वीडियो कैसेट्स देखने जाते हैं। खैर ! तो ममता मंजू के घर जाती ही रहती! रमेन्द्र के आने के बाद से यह आना-जाना थोड़ा बढ़ गया था। दोनों एक-दूसरे को पसन्द करने लगे थे। यह बात उस तंग और दकियानूस मुहल्ले में छिपी न रह सकी थी। पत्नी ने बताया कि मंजू के जरिये यह मेल-जोल रिश्ते में बदलने को आतुर हो रहा था। बस रमेन्द्र की नौकरी का सवाल था। उसने वचन दे रखा था कि नौकरी मिलते ही वह ममता से विवाह कर लेगा। वह अपनी तरफ से ठीक ही सोचता था। उसके बस दो बहनें ही तो थीं। बड़ी बहन का विवाह बहुत पहले हो चुका था और छोटी तो रमेन्द्र से दो-तीन बरस छोटी ही थी सो जिम्मेदारी का जैसा कोई बोझ न था। माता-पिता तो प्रायः सत्संग में ही लीन रहते । सो कोई दिक्कत न थी। बस वही नौकरी का मामला था और उसके लिए इन्तजार किया जा सकता था।

बात इतनी एडवांस सुनकर तो में जैसे झेंप गया। अब क्या करें, किससे कहें, कुछ समझ में नहीं आया। आखिर पुरुषोत्तम को ही पकड़ा।

‘‘भइया, तुम क्यों न खुद पहले बालेश्वर बाबू से पूछ देखो ?‘‘

वह चुप रहा।

‘‘क्यों, ठीक न होगा? मैं भी रहता हूँ तुम्हारे साथ।‘‘

‘अब आपसे क्या छुपाना चचा…‘‘

‘‘हाँ-हाँ, बोलो बेटा, हमसे संकोच न करो।‘‘ मैं जैसे जानबूझकर अनजान बन रहा था।

‘‘चचा, ये दोनों तो प्रेम में पड़ गये। जैसा कि ये कहते हैं। क्या करूँ कुछ समझ में नहीं आता चचा….‘‘

मैं थोड़ी देर को चुप हो रहा। आखिर बोलूं तो क्या बोलूँ। यह अनुभव मेरे लिए था भी एकदम नया, ताजातरीन। इसमें देखता कि स्वाद बहुत है और उससे भी ज्यादा जुगुप्सा! लेकिन मामला तो बेचारे पुरुषोत्तम का था सो जिम्मेदारीपूर्वक पेश आना था।

‘‘तो सोच में क्या पड़े हो बालक? यह तो अच्छी बात है। भगवान का इशारा समझो ! जब मियाँ-बीवी राजी तो क्या करेगा काजी?‘‘

‘‘आप भी यही कहते हैं चा…?‘‘ वह मुस्कराया!बड़ी प्यारी और विश्वासभरी मुस्कान! जाने क्यों मन भर आया, लेकिन उल्टे मैं हँसने लगा।

रमेन्द्र बहुत शालीनता से पेश आया। बल्कि हमने इसकी कल्पना नहीं की थी। वह तो बालेश्वर बाबू ही प्रस्ताव से कुछ परेशान दिखे, सो भी उन्होंने बड़ी चालाकी से सब कुछ अपने बहनोई यानी रमेन्द्र के पिता पर छोड़ दिया। सिर्फ यह तसल्ली भर दी कि वे हमारे प्रस्ताव को ‘स्ट्रांगली रिकमेंड‘ करेंगे। मुझे उनकी बात पर हैरत हो रही थी। अभी कुछ ही दिन पहले जब मैं उनके घर गया था तो उन्होंने अपने बहन-बहनोई के आध्यात्मिक रुझानों के बारे में बताया था और बड़े फख्र से कहा था कि उन लोगों की तरफ से जो दुनियादारी की दरकार होगी वह सब स्वयं उन्हें ही पूरी करनी है। यानी कि भांजे-भांजी की शादियों में एकमात्र दखल उन्हीं का होगा।

फिर भी हम आश्वस्त थे कि बात बनकर रहेगी।

रमेन्द्र ने भी सकुचाते-सकुचाते कहा था कि विवाह कोई विजातीय भी तो नहीं होगा जो पिता उज्र करें। वे दुनियादारी से ऊपर हैं इसलिए पुत्र की खुशी को ही सर्वोपरि मानेंगे। उसकी बात से पुरुषोत्तम को बहुत सहारा मिला। बेचारे ने साफ-साफ कह दिया कि वह ज्यादा खर्च करने की स्थिति में नहीं है। लेकिन रमेन्द्र ने उसे आगे बोलने से एकदम रोक दिया… विनयपूर्वक! बालेश्वर बाबू ने कहा था रमेन्द्र के पिता के बारे में कि एक बार आदमी उन्हें देख ले तो अभिभूत हो जाए। फिलहाल मैं तो रमेन्द्र को ही देख-सुनकर अभिभूत हो गया था। वह भी तो उससे इतनी बात करने का अवसर इसलिए मिल गया कि हम जिस वक्त वहाँ पहँचे, बालेश्वर बाबू घर में नहीं थे, कोई आधा घंटा बाद आये।

वहाँ से लौटते हुए मैंने पुरुषोत्तम को कहा, ऐन उसके घर के दरवाजे पर कि वह इन्तजाम में जुट जाए और जो भी जरूरत हो, निस्संकोच कहे। मैंने उसे बहन की शादी में दो-तीन हजार देने का मन बना लिया था। वह खुश था, कछ-कुछ उत्तेजित भी।

इस बात को कोई एक सप्ताह बीता होगा कि पता चला कि रमेन्द्र वापस चला गया। उसके पिता सख्त बीमार थे, टेलीग्राम आया था। सुनकर पुरुषोत्तम कुछ चिन्तित हुआ। मैंने उसे समझाया। लेकिन दिन के बाद हफ्ते और फिर दो महीने भी निकल गये, रमेन्द्र लौटकर आया ही नहीं। यह तो खूब रही। यहाँ पुरुषोत्तम अपनी तरफ से तैयारियों में लगा था। जी.पी.एफ. लोन के लिए भी उसने आवेदन कर रखा था। कुछ ही दिनों में रकम प्राप्त हो जाने की उम्मीद थी। तभी मंजू के माध्यम से संकेत मिला कि रमेन्द्र के पिता स्वस्थ तो हैं लेकिन रमेन्द्र से दुःखी हैं। शायद उन्हें उसका प्रेम-प्रसंग कतई पसन्द न आया था। मैंने सोचा, चलो यह कोई अस्वाभाविक बात तो नहीं। बहुधा हर पिता को पुत्र से इस तरह की शिकायत होती ही है। फिर धीरे-धीरे सब ठीक हो जाता है। लेकिन बात इतनी-सी नहीं थी।

एक दिन बालेश्वर बाबू ने मुझे बुलावा भेजा। पहले मैंने सोचा, पुरुषोत्तम को साथ ले लूँ…फिर जाने क्यों उसे छोड़ दिया। वे ड्राइंग रूम में बैठे कुछ हिसाब-किताब कर रहे थे। मुझे बिठाया. चाय-पानी को पूछा और अन्दर आवाज दी। थोड़ी देर बाद तश्तरी में मिठाई चली आयी।

’’लीजिए-लीजिए ईश्वरी बाबू ! रमेन्द्र की नौकरी की खुशी में है यह मिठाई।‘‘

‘‘अच्छा! वाह-वाह! क्या बात है। आपने तो महाराज यह शुभ समाचार सुनाकर तबीयत हरी कर दी! कहाँ हैं चिरंजीवी?‘‘

‘‘पी.डब्ल्यू.डी. में लगा है। बड़ा मेधावी है ईश्वरी बाबू! आपने तो देखा सुना है उसे। और तिस पर भी एकदम सादा। दुनियादारी का जरा ध्यान नहीं । जैसा बाप, वैसा बेटा! क्या कहूँ ईश्वरी बाबू ।‘‘ पान चबाते हुए वे मुग्ध भाव से बोले।

‘‘ठीक-ठीक! अब लगे हाथ उनका लग्न भी हो जाता तो परम आनन्द की बात होती। क्यों महाराज? पुरुषोत्तम बेचारा तैयारी किये बैठा है। बड़ी सुशील लड़की है। क्या नाम है….ममता! बड़ी संभाल वाली….’’

‘‘सो तो है ईश्वरी बाबू! आपके मुंह में घी शक्कर। हम लोगों का क्या है जी ! बच्चे सब अपने पाँव पर हो लें और राजी-खुशी रहें तो नइया पार ! लग्न उनका होगा, अवश्य होगा। लेकिन क्या कहूँ, एक दुविधा है।‘‘

‘‘ कैसी दुविधा ! कहिए तो?‘‘ में सशंकित हो आया। उनकी ओर कुछ झुक-सा गया जवाब की प्रत्याशा में। वे सुपारी काट रहे थे सरौते से, और बीच-बीच में जोर लगाने को दाँत भी पीस लेते थे।

‘‘ बात यह है कि कल ही बहनोई साहब का पत्र आया है…‘‘

‘‘वे स्वस्थ तो हैं न?‘‘

‘‘हाँ-हाँ, अब बिल्कुल ठीक हैं। लेकिन बात यह है ईश्वरी बाबू कि वे इस सम्बन्ध से इनकार करते हैं।‘‘

‘‘जी? क्या कहते हैं?

‘‘क्या बताऊँ! साफ-साफ मना कर दिया है। मुझे निर्देश दिया है कि किसी अच्छे परिवार में विवाह की बात चलाऊँ!‘‘

‘‘लेकिन बालेश्वर बाबू, ऐसा क्यों? फिर रमेन्द्र?‘‘

‘‘अब आपसे क्या परदा? गुत्थी यह है कि रमेन्द्र की छोटी बहन सरोज का विवाह दहेज की रकम के अभाव में रुका पड़ा है। एक जगह बात पक्की है, सिर्फ नकद कम पड़ रहा है। अब उसकी भरपाई हो तो कैसे? वे ठहरे स्कूल मास्टर, वह भी सत्सेवी, सत्संगी।‘‘

थोड़ी देर को रुककर उन्होंने पान का बीड़ा मुंह के अन्दर किया। ऊपर से जर्दा लिया, फिर सींक से चूना निकाला। मैं हतप्रभ था। पुरुषोत्तम का ध्यान आता तो मन कैसा तो हो आता। उस पर क्या गुजरेगी ! इस कच्ची उम्र में बेचारे को क्या-क्या देखना पड़ा।

‘‘इन बेचारों के पास देने को है ही क्या! इनके बारे में सोचकर तकलीफ होती है। लेकिन कोई उपाय नहीं दिखता ईश्वरी बाबू । इतना होनहार लडका। अब तक डॉक्टर हुआ रहता, बेचारा किरानी की नौकरी करके परिवार ढो रहा है। कहिए, मैं क्या करूं।‘‘

‘‘कुछ सोचिए बालेश्वर बाबू, नहीं तो अनर्थ हो जाएगा। और मैं क्या कहूँ।‘‘

‘‘मैं बहनोई साहब को कहूँ तो क्या कहूँ। आखिर लड़की की शादी का मामला है। वे इस कीमत पर रमेन्द्र और ममता के लग्न को भला किस प्रकार स्वीकार कर सकेंगे। आप ही पुरुषोत्तम को समझाइए। वह समझ जाएगा। इतनी सी उम्र में उसने दुनिया देखी है, ऊँच-नीच सब जानता है वह। हम ममता के लिए कोई और वर ढूँढ़ते हैं। अब तो ईश्वरी बाबू, यह सम्बन्ध होने से रहा।’’

लंच टाइम में अपनी-अपनी टिफिन जब हम साफ कर चुके तो मैंने पुरुषोत्तम से कहा-‘‘बेटा, एक बात कहनी है। बर्दाश्त करना होगा।‘‘

उसने मुझे देखा, भयमिश्रित उत्सुकता से।

‘समझ में नहीं आता, कैसे कहूँ ।‘‘

‘कह डालिए चचा!‘‘

‘‘रमेन्द्र के पिता ने इनकार कर दिया है। आज सुबह बालेश्वर बाबू ने मुझे अपने घर बुलवाया था।‘‘

फिर मैंने सारी बातचीत उसके समक्ष रख दी।

‘‘मैं जानता था चाचा! अन्दर कहीं मन में लगता रहा था कि यह हो नहीं पाएगा।‘‘

‘‘मुझे बहुत अफसोस है बेटा। लेकिन क्या कर सकते हैं हम। यही दुनिया है बेटा। किसी का भरोसा नहीं। तुम दिल छोटा न करो। लड़कों की क्या कमी है।’’

‘‘आप क्यों चिन्ता करते हैं चचा! सदमा तो मेरे पास मेहमान की तरह आता-जाता है। उससे बहुत गाढा परिचय हो गया है मेरा। अब तो मानो वह मेहमान भी नहीं रहा।‘‘ वह कुर्सी की पीठ पर सिर टिकाकर आराम की मुद्रा में बैठ गया। लेकिन उसका चेहरा ! और आँखें! मैं सोच रहा था ईश्वर भी जिसे दुःख देता है तो मानो उसके पीछे ही पड़ जाता है।

“मेरी चिन्ता और है चचा!‘‘ उसने धीरे से कहा। ‘‘बेचारी ममता ! उससे किस मुंह से कहूँ यह सब! लेकिन चलिए। इस अलाव में जलना तो हम सभी को है।‘‘

इसके पश्चात बहुत दिन नहीं बीते होंगे कि रमेन्द्र के विवाह का समाचार मिला। सुनने में आया खूब धूम-धाम से विवाह हुआ। इधर पुरुषोत्तम ममता के विवाह के लिए दौड़-धूप कर रहा था। ममता को मैंने तब से देखा ही नहीं। वह तो जैसे घर में ही सिमटकर रह गयी। मंजू के घर उसका आना-जाना तो कब का खत्म हो चुका था। उसके विवाह की बात एक जगह प्रगति पर थी। बहुत साधारण परिवार था। लड़का भी अभी एक तरह से अर्द्ध-बेरोजगारी की स्थिति में था। एक छोटी-सी कम्पनी में मामूली-सा मुलाजिम था। पुरुषोत्तम के साथ मैं कई बार उन लोगों के घर गया और आखिरकार बात पक्की कर आया। शक्ति के हिसाब से ममता के विवाह का अच्छा ही प्रबन्ध हुआ। आश्चर्यजनक बात यह थी कि विदाई के अवसर पर भी ममता को किसी ने रोते हुए नहीं देखा। उसकी तो पलक ही नहीं झपकती थी। बस एकटक कहीं देखती रहती।

तो रमेन्द्र और ममता का किस्सा खत्म हुआ। लेकिन नहीं। एक दिलचस्प बात पता चली। पत्नी ने बताया, मंजू कह रही थी कि रमेन्द्र की अपने माता पिता से बातचीत कब से बन्द है। यही नहीं, वह शादी के कुछ ही दिनों बाद पत्नी को लेकर वाल्मीकिनगर चला गया। वहाँ के रमणीक वातावरण में अपनी नयी दुनिया बसाने। लेकिन कोई एक-डेढ़ माह पश्चात ही उसकी पत्नी मायके लौट आयी और तब से फिर अपने पति या सास-श्वसुर के पास नहीं गयी। रमेन्द्र भी तब से घर नहीं लौटा। मुझे यह बात बड़ी अजीब मालूम हुई। मैंने पत्नी को कहा, मंजू व्यर्थ ही बक रही होगी ममता की वजह से। वह रमेन्द्र और उसके घरवालों से खार खाये बैठी है। लेकिन पत्नी ने कहा, ‘‘नहीं जी, यह बात नहीं है, लड़की सच कह रही होगी। वह पानीवाला लड़का है, जरूर कुछ गड़बड़ है।‘‘

आखिर एक सज्जन मेरे परिचय के निकल ही आये थे जो रमेन्द्र के ससुरालवालों के निकट सम्बन्धी थे। किस्सा यूँ हुआ। मैं जो कह रहा हूँ वह अपनी कल्पना के फ्रेम में रखकर ! ऐसा ही कुछ हुआ होगा-

रमेन्द्र की पत्नी (नाम उसका याद नहीं) देखती है, विवाह के पश्चात शुरुआती दिनों में सम्बन्धों में जो ऊष्मा रहनी चाहिए वह है नहीं। रमेन्द्र उपेक्षा और अनादर नहीं करता लेकिन जैसे उसके साथ रहते हुए भी कहीं अपने में हो रहता है । न खुलकर हँसता है, न बात करता है। खुलकर हँसने की जगह मुस्करा देना, लम्बे कथोपकथन की जगह सूत्र वाक्यों में बात खत्म कर देना…. । यह तो सहा नहीं जाता। आखिर बात क्या है ! पिता ने इतना खर्च करके इतनी धूमधाम से एक इंजीनियर वर से लग्न कराया, लेकिन यह सब तो व्यर्थ हुआ जाता है।

एक दिन उसने अपने दिल की बात रमेन्द्र को कह डाली। रमेन्द्र हँसकर टाल जाता है और विश्वास दिलाता है कि वह जैसा भी है उसी का है। लेकिन साथ ही उससे एक अनुरोध भी करता है।

‘‘यह मुझे इंजीनियर साहब कहकर मेरा दिल न जलाया करो।‘‘

‘‘क्यों भला? इंजीनियर साहब नहीं तो ठेकेदार साहब कहूँ?‘‘ वह परिहास में कहती है।

‘‘नहीं, वह भी नहीं। कोई साहब कहना जरूरी है क्या?‘‘

‘‘हाँ, मुझे अच्छा लगता है ऐसे पुकारना।‘‘

‘‘तब ओवरसियर साहब कहा करो, या जेई (जूनियर इंजीनियर) साहब!‘‘

‘‘क्यों?‘‘

‘‘क्यों क्या? जो हैं वही तो कहोगी। सिपाही को हवलदार क्यों कहोगी भला?‘‘

’’क्या कहते हैं आप?’’

‘क्यों? सच ही तो कह रहा हूं।‘‘

‘‘तो क्या आप इंजीनियर नहीं हैं? आई.आई.टी. के पढ़े?‘‘

नहीं जी, मैंने तो ओवरसियरी पड़ी है और फर्स्ट क्लास में पास हुआ हूं। लेकिन तुम यह चौंक क्यों रही हो भला?‘

‘‘हे भगवान! यह तो धोखा हुआ है । बहुत बड़ा धोखा !‘‘

’’क्या कहती हो।‘‘

’’अब इतने भोले और अनजान मत बनिए।’’

‘‘मैं कुछ समझा नहीं, क्या कहना चाह रही हो तुम?‘‘

वह चेहरा हाथों में छुपाये फूट-फूटकर रोने लगती है। रमेन्द्र किंकर्तव्यविमूढ़ है। वह उसके हाथ उसके चेहरे पर से हटाने की कोशिश करता है, उसके सिर पर हाथ फेरने की कोशिश करता है। वह उसका हाथ झटक देती है। वह कुछ नहीं समझकर चुप ही रहता है, लेकिन उसका पारा धीरे-धीरे ऊपर चढ़ता है।

‘‘देखो, यह नौटंकी बन्द करो और साफ-साफ कहो क्या बात है।‘‘

‘‘धोखा किया आपने हमारे साथ। इतना बड़ा धोखा! मैं एक इंजीनियर को ब्याही गयी थी, ओवरसियर को नहीं। इतना खर्चा-वर्चा मेरे बाप ने एक दो टके के जूनियर इंजीनियर के लिए नहीं किया। छिः कितने गिरे हुए लोग हैं आप! मुंह में राम बगल में छुरी। क्या तो बाबूजी दिन-रात भगवान में ही लीन रहते हैं। हुंह ! बेटे की शादी में माल हड़पने के लिए हमसे झूठ कह दिया कि बेटा इंजीनियर है, वह भी आई.आई.टी. प्रोडक्ट ।‘‘

‘‘लेकिन मैं तो यह सब कुछ बिल्कुल नहीं जानता, विश्वास करो।‘‘

‘‘कैसा विश्वास? अर्थ समझते हैं आप इस शब्द का? दगा करके विश्वास करने को कहते हैं? भगवान इसका फल जरूर देगा। जिस तरह मेरी जिन्दगी से खेला गया है, उसका फल जरूर मिलेगा..‘‘

निर्दोष और तब भी इस कदर अपमानित रमेन्द्र सोचता है, जो हुआ ठीक ही हुआ। ममता के निश्छल और निष्पाप विश्वास को उसने तोड़ा, उसका फल उसे मिल गया। उसके पिता ने ही उसकी पीठ में चाकू मार दिया। स्वयं उसके पिता- उसके आदर्श पुरुष ! हा! कैसा प्रारब्ध है। सच है, इस संसार में कहीं कुछ अपना नहीं। माता-पिता भी नहीं । वह रमेन्द्र है, सिर्फ रमेन्द्र, अब वह बस यही याद रखेगा। भूत-भविष्य, नाते-रिश्ते, अब कुछ भी याद नहीं रखेगा वह ।

लेकिन आखिर वह पत्नी को कैसे मनाए? धोखा तो उसके साथ हुआ है। जबरदस्त धोखा। बेचारी की अभिलाषाएँ अकाल मृत्यु को प्राप्त हो गयीं। उसने सपना देखा होगा बंगले का, बंगले में गाड़ी का, गाड़ी में…। अभी तो उसे मात्र अभियन्ता बनने में कोई पन्द्रह-सत्रह वर्ष लग जाएँगे। फिर भी अब उसी के साथ निबाहना है, सब कुछ सहकर भी। एक निहायत असम्पृक्त वैवाहिक जीवन का अभिशाप तो उसे मिल ही चुका।

लेकिन यह क्या ! तीसरे दिन वह देखता है कि उसका साला आया हुआ है और उसकी पत्नी को साथ लेकर जाने को तैयार खड़ा है। न कोई बात न चीत। बस, ‘‘हम जा रहे हैं।‘‘ पत्नी की आँखों में अब भी आँसू हैं। जाते-जाते वह कहती है, दुःख व रोष में, ‘‘एक छलिया को पति के रूप में सहन नहीं कर सकती, उसके साथ पत्नीत्व का आदर्श नहीं निभा सकती। अब कभी नहीं लौटूंगी।‘‘

वह सच में नहीं लौटी। रमेन्द्र बाबू ने कुछ उसकी खातिर, कुछ स्वाभिमान रक्षा हेतु उसी वर्ष ए.एम.आई.ई. में दाखिला ले लिया ताकि वे तीन वर्षों के इस पाठ्यक्रम को पूरा करने के पश्चात इंजीनियर बन जाएँ। बन भी गये लेकिन पत्नी नहीं लौटी। उल्टे उन्हें कुछ वर्षों बाद तलाक के कागजात पर हस्ताक्षर करने पड़े।

इस बीच एक घटना या कि दुर्घटना हुई। एक दिन दफ्तर जरा देर से पहुंचा। मैं बड़ा बाबू हो चुका था। टेबुल पर पुरुषोत्तम का दरखास्त पड़ा मिला कि वह अपनी दुर्घटनाग्रस्त बहन को देखने जा रहा है, अस्तु तीन दिन का अवकाश स्वीकृत किया जाए। मुझे ममता को लेकर बहुत चिन्ता हुई। तब तक मैं सरकारी क्वार्टर में शिफ्ट कर चुका था, इस मायने में अब मुहल्ला बदल चुका था। कभी-कभी उस पुराने मुहल्ले में सिर्फ पुरुषोत्तम के घर ही जाना होता था। खैर, तो दूसरे दिन शाम को मैंने उसके घर जाने की सोची। रास्ते में ही पुरुषोत्तम मिल गया। उसे देखकर कोई कतई नहीं कह सकता था कि वह बमुश्किल छब्बीस-सत्ताईस का नौजवान है। उसने नमस्ते किया, फिर हम पास ही एक कच्ची दुकान में बैठे। चाय की चुस्कियों के बीच बातचीत शुरू हुई।

‘‘खैरियत तो है बालक?‘‘

‘‘चचा, आप मुझसे खैरियत पूछते तंग नहीं होते?‘‘

‘‘कैसी बात करते हो?‘‘ मैं झुंझलाया। लेकिन देखा कि उसका चेहरा स्याह हो आया है। बड़ी वेदना हई। उसकी पीठ पर हाथ रखा।

‘‘क्या बात है बेटा?‘‘

‘‘ममता जल गयी चचा…‘‘ चाय उसने बेंच पर रख दी, जाँघों पर कोहनी टिकाये आगे की ओर झुक गया. हथेलियों को मसलते हुए। मेरे शरीर में मालूम हुआ, नसों में बर्फ भर गयी है।

‘‘क्या ?‘‘ बहुत मुश्किल से मुंह से निकला।

हाँ, चचा।‘‘ उसने भर्रायी आवाज में कहा। मैंने उसे लगभग अपनी बांहों में ले लिया। उसका बदन गर्म था, मानो वह ज्वर में हो, और हल्की कंपकंपाहट थी।

‘‘तो क्या?‘‘

’’नहीं, अभी है, लेकिन अब यह ममता नहीं रही।‘‘

’’मैं समझा नहीं बेटा…’’

‘‘वह झुलस गयी, आधा, लेकिन बच गयी है। जब उसके शरीर से पटिटयाँ उतरेंगी तब वह खुद भी अपने आप को पहचान नहीं सकेगी।‘‘ उसने बेंच से चाय का गिलास उठाया और एक ही बार में बाकी बची चाय पी गया। मेरे मुंह में मानो जुबान ही नहीं थी। मैं जैसे प्रतिक्रिया करना भूल रहा था।

’‘लेकिन यह हुआ कैसे?‘‘ जैसे मुझे याद आया।

’‘यही तो समझ में नहीं आता। खाना तो उसकी सास पका रही थी, फिर ममता कैसे जली !‘‘

‘‘उसने कुछ कहा नहीं होश आने पर ?

‘‘वह एक प्रस्तर-मूर्त्ति की तरह है- विरूप और विच्छिन्न हो गयी एक प्रस्तर मूर्त्ति….कुछ नहीं कहती, कहीं नहीं देखती, किसी को नहीं।‘‘

‘‘पहले से कोई टेंशन था क्या बेटा?‘‘

क्या बताऊँ चाचा ! जब से रमेन्द्र से बात टूटी, ममता ममता रही ही नहीं। मानो एक गुड़िया हो रबर की, जो चलती-फिरती और अपना काम आप करती हो।‘‘ वह धीरे-धीरे कह रहा था, रुक-रुक कर।

‘एक तो शादी के बाद हमारे पास तीन-चार बार आयी। सो भी बहुत पूछने पर भी कभी कुछ कहा नहीं उसने।  …. तो हम ही हत्यारे हुए न चा…?‘‘ उसने कातर दृष्टि से मुझे देखा। मेरा दिल रोने को हो आया।

‘‘तकदीर बेटा ! तकदीर!‘‘ मैंने उसकी पीठ थपथपायी।

‘इस तकदीर को आखिर मुझसे कितना हिसाब चुकाना है चचा!‘‘ वह अचानक फफक पड़ा। मुझे खुद को संभालना मुश्किल लगा, सो उठ खड़ा हुआ। कुछ कहा नहीं।

बाद के वर्षों में मालूम हुआ, ममता के जलने की खबर से सबसे ज्यादा आघात रमेन्द्र को ही पहुंचा। मंजू अपने पति के साथ हमें एक समारोह में मिल गयी थी और मैंने यों ही रमेन्द्र का हाल पूछा था। उसने बताया कि बालेश्वर बाबू की मृत्यु पर वह एक दिन के लिए आया था। तभी उसे वह खबर मिली। ममता उस दुर्घटना के बाद से वापस कभी ससुराल नहीं गयी, न ही उसे कोई लाने आया। रमेन्द्र ने ममता से मिलना चाहा लेकिन कोई सूरत नहीं निकली। वह अगली ही सुबह बिना किसी को बोले बताये वापस लौट गया। बाद में पता चला, वह छह-सात महीने हरिद्वार ऋषिकेश और बदरी -केदार घूमता रहा। कैसे-कैसे उसे विभाग के लोग उसे मनाकर ले आये। किसी तरह नौकरी जाते-जाते बची। बार-बार वह यही दोहराता कि वह ममता को अपनाना चाहता है। लेकिन वह भला किस प्रकार सम्भव था? एक खंडित प्रतिमा की पूजा अगर कोई करना भी चाहे तो वह स्वीकार नहीं की जाती! उसका फल नहीं मिलता है न!

‘‘तब से कितने मौसम आये और चले गये। कितने कैलेंडर – तारीखों के पन्ने दीवारों पर चढ़े उतरे। रमेन्द्र बाबू बिल्कुल अकेले रहे। विवाह के लिए बहुत तरफ से दबाव डाला गया उनपर लेकिन वे अटल, अविचल रहे। पता नहीं यह अकेलापन उनका प्रायश्चित है अथवा एक खंडित तथा विरूप प्रतिमा की उपासना में जीवन का अर्पण! अब तो जो है वह आपके सामने है दीना बाबू। आगे की कौन जानता है। बड़ी देर हुई, अब आज्ञा दीजिए।‘‘

‘‘लेकिन ईश्वरी बाबू, पुरुषोत्तम का क्या हुआ?‘‘

‘‘उससे मिले कई बरस बीत गये। सुना है, उसके दो प्यारे बच्चे हैं। रहता वह कुनबा अब भी वहीं है।‘’

‘‘और वह? क्या नाम बताया…ममता?‘‘

‘‘सब कर्मभोग है दीनाबाबू, क्या कहें! अभी जीती है!‘‘

‘‘लेकिन…‘‘

‘‘अब जाने भी दीजिए.‘‘

ईश्वरी बाबू की यही बात बुरी लगती है। कहाँ तो किस्सा सुनाने चले थे और कहाँ यह खटराग अलाप कर चलते बने। उनसे पूछो तो कहेंगे, ‘‘अरे भाई, अब आपको कैसे बताएं कि यह किस्सा नहीं है।‘ हो सकता है। सच भी हो सकता है यह सब। कौन जानता है!


शिवदयाल

कथाकार, उपन्यासकार, कवि, निबंधकार, संपादक।

हिन्दी के समकालीन सृजनात्मक एवम् वैचारिक लेखन के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर। दो उपन्यास( छिनते पल छिन, एक और दुनिया होती) कहानी संग्रह( मुन्ना बैंडवाले उस्ताद), बिहार पर केंद्रित दो पुस्तकें(बिहार की विरासत’; ‘बिहार में आंदोलन, राजनीति और विकास’), लोकतंत्र एवम् राजनीति पर पुस्तक समेत दर्जनों वैचारिक लेख-निबंध, कविताएं, कहानियां, समीक्षाएं आदि प्रकाशित। उपन्यास ‘ एक और दुनिया होती ‘ के मराठी अनुवाद सहित कई रचनाओं का मराठी, उर्दू, अंग्रेजी आदि भाषाओं में अनुवाद। रचनाएं अनेक पुस्तकों में संकलित।

संवेद के रमेशचंद्र शाह अंक का संपादन। दूरदर्शन के लिए बाबू जगजीवन राम पर बनी फिल्म का लेखन। ‘ विकास सहयात्री ‘, ‘ बाल किलकारी ‘ सहित अनेक पत्रिकाओं का संपादन। निबंध संग्रह ‘ भारतीय राष्ट्रवाद की भूमिका’ शीघ्र प्रकाश्य।

संपर्क : ए 1/201, आर के विला
महेश नगर ( बोरिंग रोड पानी टंकी)
पटना – 800024.
मो : 9835263930
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