डॉ किरण मिश्रा की पांच कविताएं

एक
उदास मौसम और गुलाम इच्छाओं की
सारी कविताएं
भेज दी गईंं प्रश्नों के साथ
जबकि जरुरत थी
कापते हांथोंं लड़खड़ाते पैरोंं को
उनकी

कोहालाल में
वो कहानियां भी नहीं ठहरीं
जिनमे बचा था
सच कहना

घाटियों ,दर्रों ,पहाड़ियों में
घूमती गज़लों ने
धूएं की महक सूंघने से किया इंकार
नतीजा
मरी पाई गईंं

लोकतंत्र

आजाद लेकिन उदास दिनों को
ढल कर हमने
सूख के शब्दकोष बनाये
कागजोंं के नीचे छिपा दी
सारी निराश वर्णमाला
आनंद की कविताएं रची
और इतनी रची की
लोकतंत्र ख़त्म कर
तानाशाही आ गई।

डिक्टेटरशिप

एक खौफजदा दौर में
तुम खड़े थे
तुम्हारे आस पास
विचारोंं से पस्त
डरे सहमे लोगोंं का हुजूम था
तब तुम ग्रेट डिक्टेटर बन
आ खड़े होते हो
उनके बीच
और ललकारते हो
दुनिया के सबसे बड़े तानाशाह को
मुर्दा खामोशी को हटा कर
बिखेर देते हो हंसी
वो हंसी जहाँ से हर हंसी
हँसती चली आ रही है
काश वो हंसी चली आती हमारे पास
जहाँ हम हँसते हँसते
घर के हिटलर को
तुम्हारी तरह सबक सिखा सकते
और अंत कर सकते
उसकी डिक्टेटरशिप का
( चार्ली चैप्लिन की याद में )

सत्य

सत्य के प्रयोगों को
खुद ही अपनी कसौटी पर कसता
वो बूढ़ा आज फिर खड़ा है
मेरी कविता में
उसके शब्द कविता में समाहित नहीं होते
वो ब्रह्म हो बिखर गये है
कन-कन में
हालांकि उसके शब्दों को
लोगों ने पहले तोड़ा-मरोड़ा
घायल किया और अंत में मार दिया
पर वो आज भी जी रहा है
हर घटना के अंत में
शांति बन के।

न्याय की आस्था
उसकी पीठ पर बैजनी फूल बंधे थे
और हाथ में सपने
अभी अभी उगे पंख
उसने करीने से सजा रखे थे
कुछ जुगनू उसके होठों पर चिपके थे
कुछ हँसी बन आसमान में
वो एक सर्द रात थी
जब हम नक्षत्रों के नीचे चल रहे थे
और चाँद मेरे साथ
हिम खंड के पिघलने तक
मैं उसका साथ चाहता था
उसे भी इंतजार था सुनहरी धूप का
मैं भरना चाहता था
वो समेटना
इसलिए हमने एकांत का
इंतजार किया
उसकी हँसी एकांत को भर रही थी
मैं डूब रहा था
तभी एकांत के अधेरों में छिपे भेड़ियों ने
उसकी हँसी को भेदना शुरू कर दिया
मैं अकेला ,उनके साथ उनकी हैवानियत
हैवानियत से मेरी नीयत हार गई
और हँसी भी
क्षत विक्षित हँसी अब झाड़ियों में पड़ी थी
और मैं न्याय में
न्याय उलझा था किसी नियम से
मैं आज भी अंंधेरी रात के डर को
मुट्टी भर राख और चुल्लू भर आंसू में मिला कर न्याय की आस्थाएं ढूंढ़ रहा हूं
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डॉ किरण मिश्रा
नई दिल्ली

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1 Response

  1. vijay kumar says:

    किरण मिश्रा जी की कविताये गहरे अर्थबोध की रचनाये है….उन्हें शुभकामनाएँ

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