कृष्ण सुकुमार की सात कविताएं

(1)
उन दिनों जब हम बच्चे ही थे,
तुम कहीं नहीं थे !
न तुम्हारी कोई कल्पना थी,
न धारणा, न उपस्थिति
न आकार ही कोई !

किंतु एक उत्कट बेचैन अभिलाषा
तुम्हें छू लेने की…
तुम्हारा साथ पाने की…
क्या था वह सब !

हम साथ साथ खेलते
साथ स्कूल जाते
साथ ही होमवर्क किया करते
और अक्सर साथ साथ खाते भी
एक दूसरे के घर !

एक दूसरे से पूर्णत: अपरिचित,
हम एक दूसरे के घनिष्ट थे…
सघन और गुँथे हुए !

और हम निर्मल थे
निश्छल
निर्द्वंद भी !

लेकिन धीरे धीरे
हम एक दिन
बड़े हो जाने के लिए
अभिशप्त हैं !

(2)
लौट रहा हूँ वहीं
जहाँ छोड़ आया था
तुम्हारी प्रतीक्षाओं के चिह्न ! जिन्हें
तुम्हारे शरमाते हुए पल
थामे खड़े हों अभी भी
शायद वहीं !

लौट रहा हूँ वापस
उस प्रस्थान बिंदु की ओर
जहाँ छूटे रह गये
तुम्हें तकते हुए
मेरे अवशेष
नर्तन की मुद्रा में !

लौट रहा हूँ पीछे
उस मायावी आमंत्रण की तरफ़
जहाँ अटक कर रह जाते थे
तुम से विदा लेते हुए
मेरे बिंधे हुए मासूम प्राण !

लौट रहा हूँ
उस बहती हुई नदी की तरफ़
जिसमें शामिल है
तुम्हारे अलौकिक मन के कोमल बहाव !

वैसे भी मुश्किल है
आगे बढ़ पाना
ज़िंदगी की खड़ी चढ़ाई पर
अकेले !

(3)
तुमने मुझे देखा
ढलते दिन की तरह !

और
मैंने तुम्हें चाहा
जिस तरह दिन भर का थकाहारा
कोई चाहता है लौट आना घर !

तुमने मुझे सोचा
गुज़र चुका पल !

और
मैंने तुम्हे चाहा जैसे दूर निकल चुके को
पुकारे कोई
तो आगे बढ़ते क़दम
डगमगा कर
ठिठके रह जायें वहीं के वहीं !

तुमने मुझे चाहा ही कहाँ !
मुझे सिर्फ़ देखा या सोचा भर !

मैंने तुम्हे चाहते हुए देखा नहीं
मैंने तुम्हे चाहते हुए सोचा भी नहीं
मैंने तुम्हे देख और सोच कर नहीं
मैंने तुम्हें सिर्फ़ चाहते हुए सिर्फ़ चाहा

(4)
भूल आया अपनी आँखें
उन सपनों में
जिन्हें देखते देखते
निकल आया हूँ इतनी दूर
कि बूढ़ी हो झुक गयी हैं आवाज़ें
शहनाइयों की !

भूल आया अपने स्पर्श
उन सार्थक पलों में कहीं
जिनमें तुम्हे महसूस करते करते
पड़ चुका हूँ इतना अकेला
कि ढलता जा रहा हूँ अनवरत
निरर्थक ख़ामोशियों में !

भूल आया अपना होना
तुम्हारे होने में
जिसे याद करते करते
मिटते जा रहे हैं वे तमाम जादू
जिनके सहारे दिन
कट जाते थे पलों में !

इधर
भूतबंगले की तरह
डरावना और चींखों की तरह
विषैला
मैं !

उधर
ख़ैर… तुम तो रहने ही दो !

(5)
इबादत की है रोज़
तेरे सपने की !

वरद हस्त की मुद्रा में
प्रकट होती है एक नींद
वर माँग !

भीतर गहनतम में मेरे
कहीं कुछ मर रहा है !

कुछ सुलगता हुआ सा
बुझ गया है!

कुछ है साँसों में शेष
घुटता हुआ सा !

कुछ अटका है कहीं ख़याल में
अभी भी जीवित !

तथास्तु !

मूसलाधार बारिशों और
कड़कड़ाती बिजलियों के बीच
कँपकँपाता हुआ भीगे स्पर्श वाला तेरा सपना
मेरे सपने में !

कोई दम तोड़ता पल
व्यक्त हो उठा तत्क्षण !

एक महक की मद्धिम लौ में
निकल आया कोई अटका हुआ ख़याल !

हवाओं में काँपती हुई साँसें
मचल उठी हैँ निर्विघ्न !

उसने मेरा हाथ पकड़ा
और हम बारिशों में लोप हो गये !

(6)
तुम्हारा साथ
मतलब अब तक निरस्त पड़े
सपनों के बीजों का एकाएक
व्यक्त हो उठना !

तुम्हारी याद
जैसे तेज़ हवाओं में तितर बितर
बिखर कर उड़े हुए,
शब्दों का पकड़ में आ जाना !

तुम्हारा प्रस्थान
माने रेत पर लिख कर रखे गए
स्वर्णिम पलों का
एक ही झोंके में
उड़ जाना !

नहीं समा सकता
मैं अकेला
अपने वजूद में समूचा
कितनी जगह
बची रह जाती है
ख़ाली !

(7)

अपने एकांत में
अकेला नहीं हूँ अभी भी मैं !

तेरे आने की आहटों से
बुन रखा है मैंने एक संगीत
बादलों से टूटते पानियों से
बहती लय के साथ !

तेरे आते आते
आने के बीच के शून्य में
चुन ली है मैंने एक जगह
तेज़ हवाओं में कहीं
जहाँ रख रखी हैं तेरी खामोशियाँ
सँभाल कर मैंने !

तेरे मुखर स्पर्श
रखे हैं मेरी पवित्र बेचैनियों के
बंद खोल में
सुरक्षित !

मैं नहीं होउँगा
तब भी रहूँगा उपस्थित
अपनी ख़ामोश लय में

तेरे स्पर्श के साथ
——–

नाम- कृष्ण सुकुमार

जन्म-15,10.1954

प्रकाशित पुस्तकें-

  1. इतिसिद्धम्…………………………(उपन्यास) 1988 में वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित।
  2. पानी की पगडण्डी………………..(ग़ज़ल-संग्रह) 1997 में अयन प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित।
  3. हम दोपाये हैं……………………….(उपन्यास) 1998 में दिशा प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित।
  4. सूखे तालाब की मछलियां……..(कहानी-संग्रह) 1998 में पी0 एन0 प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित।
  5. आकाश मेरा भी…………………….(उपन्यास) 2002 में मनु प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित।
  6. उजले रंग मैले रंग………………….(कहानी-संग्रह) 2005 में साक्षी प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित।
  7. सराबों में सफ़र करते हुए…….(ग़ज़ल-संग्रह) 2015 में अयन प्रकाशन, नई दिल्ली से प्रकाशित।

संकलन- देश के विभिन्न प्रदेशों से प्रकाशित लगभग दो दर्जन संकलनों में कहानियां, कविताएं एवं ग़ज़लें संकलित।

प्रकाशन- हिन्दी की शताधिक पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां एवं व्यंग्य तथा ग़ज़लें और कविताएं प्रकाशित।

पुरस्कार/सम्मान-

  1. उपन्यास “इतिसिद्धम्” की पांडुलिपि पर वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली द्वारा ”प्रेम चन्द महेश“ सम्मान- 1987 तथा

वाणी प्रकाशन द्वारा प्रकाशित

  1. उत्तर प्रदेश अमन कमेटी, हरिद्वार द्वारा “सृजन सम्मान”-1994.
  2. साहित्यिक संस्था ”समन्वय,“ सहारनपुर द्वारा “सृजन सम्मान”-1994.
  3. मध्य प्रदेश पत्र लेखक मंच, “बैतूल द्वारा काव्य कर्ण सम्मान”-2000.
  4. साहित्यिक संस्था ”समन्वय,“ सहारनपुर द्वारा “सृजन सम्मान”-2006

सम्पर्क-  ए0 एच0 ई0 सी0,

भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की

रुड़की-247667(उत्तराखण्ड)

संप्रति –  स्वतंत्र लेखन (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान, रुड़की से  (अक्टूबर 2014)  अवकाशप्राप्त)

ई मेल – kktyagi.1954 @gmail.com

मोबाइल नं०  9917888819

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