कृष्णधर शर्मा की चार कविताएं

नदी और औरत

किसी झरने का नदी बन जाना

ठीक वैसे ही तो

जैसे किसी लड़की का औरत बन जाना

जैसे एकवचन से बहुवचन हो जाना

जैसे अपने लिए जीना छोड़कर

दुनिया के लिए जीना

जैसे दूसरों को अमृत पिला

खुद जहर पीना

अद्भुत सी समानताएं हैं

नदी और औरत में

दोनों ही से मिलकर

धुल जाते हैं कलुष

तन और मन के

तृप्त हो जाती है आत्मा भी

मिलती है अद्भुत सी शांति

रेतीले, पथरीले, जंगल, पहाड़ से

गुजरती है नदी कितनी ही चोटें खाकर

खुशहाली पहुंचाती है मगर

नगर-नगर हर गाँव-घर जाकर

भले ही मिलता हो उसे बदले में

इंसानी गन्दगी का दलदल

पिता हो, पति हो, या पुत्र

औरत भी तो ले लेती है

सबकी थकान और चिंताएं अपने ही सर

फिर भी कोई गिला नहीं उनको

खुशियाँ बांटती जा मिलती हैं

दोनों ही अपने-अपने समंदर को

बूढा होता आदमी

अबोध बच्चे जैसा ही तो हो जाता है बुढ़ापा

अबोध बच्चे से तो फिर भी रहती हैं कई उम्मीदें

घरवालों को भी बाहरवालों को भी

मगर एक बूढ़े से भला क्या कर सकते हैं कोई उम्मीद!

हम सब सोचते हैं इसी तरह से एक बूढ़े होते आदमी के बारे में

कि जितना ही बढ़ता है वह बुढ़ापे की तरफ

उतनी ही कम होती जाती हैं उम्मीदें उससे

और कम होती जाती है उसकी देखभाल भी

अबोध बच्चा जब बढ़ता है तो

बढती जाती हैं उसके जीवन में खुशियाँ भी

और बढ़ते जाते हैं उसके चाहनेवाले भी

मगर बूढ़े होते आदमी के साथ

होता है इसके विपरीत हमेशा से ही

जितना ही होता है वह बूढा

उतना ही पड़ता जाता है अकेला

और उतना ही होता जाता है बेमानी

वह अपने घरवालों के लिए

बूढ़े के पास कुछ भी नहीं है ऐसा भी नहीं है

समेटे हुए है वह अपने भीतर

बहुत सारा अनुभव और बहुत सारा ज्ञान

कसमसाता भी रहता है वह अक्सर

कि कोई तो पूछे उससे भी कुछ सवाल

और वह खोलकर रख दे अपने ज्ञान का खजाना

चकित, विस्मित से रह जायें सारे लोग!

कि देखो तो कितना ज्ञानी है यह बूढा भी!

मगर बूढ़े का ज्ञान तो हो चुका है पुराना

हम आधुनिक! लोगों की निगाह में

कैसे नष्ट कर सकते हैं अपना कीमती! समय

किसी बूढ़े के पास फालतू ही बैठकर

इतने समय में तो हम कंप्यूटर पर बैठकर

कर सकते हैं गपशप किसी ऑनलाईन दोस्त से

पूछ सकते हैं कि अभी-अभी तुम ने

कुछ ऐसा तो शेयर नहीं किया है जो मुझसे छूट गया हो!

बहुत ही जरूरी है आज के आधुनिक! समय में

हर स्टेटस, हर पोस्ट से अपडेट रहना

घर में बीमार पड़ा हुआ बूढा तो

वैसे भी अक्सर बीमार ही रहता है

अगले दिन या अगले हफ्ते भी तो

लेकर जाया जा सकता है उसे डाक्टर के पास!.

 

अकिंचन का आतिथ्य

घर के सबसे अच्छे बरतन

सबसे सुथरी चादर

सबसे बढ़िया बिस्तर

और अपना निर्मल हृदय

परोस देता है अकिंचन

अतिथि के आतिथ्य में

नास्ते में नमकीन,बिस्कुट,चाय

और खाने में पूड़ी,सब्जी,सेवई

या जो भी बन सके सबसे अच्छा

वह सब खिलाता है

अपने अतिथि को अकिंचन

परवाह नहीं करता अकिंचन जरा भी

कि कितनी उधारी हो गई है

पड़ोसियों के यहाँ

या फिर नुक्कड़ की दुकान पर

वह तो बस चाहता है कि

खुश होकर, तृप्त होकर

अपने घर वापस जाये उसका अतिथि

भले ही इसके एवज में

रह जाए वह सदा ही अकिंचन!

 

आम आदमी खास आदमी 

 

आम आदमी देखता है आम सपने

खास आदमी देखता है खास सपने.

कभी-कभी तो इन सपनों का

अंतर होता है इतना ज्यादा

कि जैसे जमीन और आसमान का

जैसे नदी और समुद्र का अंतर

कुछ सपने समान भी होते हैं इनके

जैसे अपनों की खुशहाली के सपने

आम आदमी देखता है सपने

कल और परसों के

ख़ास आदमी देखता है सपने

महीनों और बरसों के

आम आदमी करता है चिंता

अपने पडोसी की भी

कहीं कुछ परेशानी या

विपदा में तो नहीं है उसका पडोसी!

खास आदमी पडोसी की चिंता को

घुसने ही नहीं देता है घर में अपने

खिड़की, दरवाजों सहित

हर उस जगह पर बिठा देता है पहरे

कमरों को भी करवा देता है साउंडप्रूफ

ताकि न आ सकें किसी गरीब की

परेशान आहें या कराहें घर में उसके

मगर इस चक्कर में बंद कर लेता है वह

सकारात्मक भावनाओं और संभावनाओं का

आना जाना भी अपने घर में

फंसकर रह जाता है वह अपने ही बुने

कांक्रीट और सुविधाओं के जाल में

जबकि आम आदमी की झोपडी में

नहीं है कोई रोक-टोक

न पडोसी की चिंताओं के लिए

न चिड़िया के लिए न कुत्ते-बिल्ली के लिए

न ही किसी भूखे भिखारी के लिए

आम आदमी को क्या जरूरत

एयरकंडीशन कमरों की

वह तो गज़ब का सुख पाता है

भरी दोपहरी में भी

वटवृक्ष के नीचे बैठकर

जहाँ बैठकर कोई बुद्ध हुआ

तो कोई महावीर हो गया….


कृष्ण धर शर्मा S/o श्री राजबहोर शर्मा

जन्म तिथि- 21-04-1981

लेखन- कवितायें, लघुकथाएं, कहानियां एवं सम-सामयिक विषयों पर लेख

सम्प्रति- जीवनयापन हेतु निजी कंपनी में व्यवस्थापक के पद पर कार्यरत

 

 

पत्र व्यवहार का पता :-

कृष्ण धर शर्मा

C/o कुंथुनाथ जैन मंदिर

गली नं. 4, फाफाडीह

रायपुर, छत्तीसगढ़ 492001

 

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