कृष्ण सुकुमार की सात कविताएं

(1)
बचा हुआ हूँ शेष
जितना नम आँखों में विदा गीत !

बची हुई है जिजीविषा
जितनी किसी की प्रतीक्षा में
पदचापों की झूठी आहट !

बची हुई है मुस्कान
जितना मुर्झाने से पूर्व फूल !

बचा हुआ है सपना
जितना किसी मरणासन्न के मुँह में
डाला गंगाजल !

बचा हुआ है रास्ता
जितना अंतिम यात्रा में श्मशान !

और तुम ! बचे हुए हो
इन्हीं अटकलों के बीच कहीं !
गुनगुनायी जाती धुन की तरह…

(2)
आह्वान करने लगता हूँ
एकत्रित सन्नाटे की खंडित आवाज़ों का
जब सोना चाहता हूँ निर्द्वंद !

इकट्ठा कर लेता हूँ
अपने चारों तरफ़ हताश लोगों की भीड़
जब चाहता हूँ निर्भ्रांत अकेलापन !

अनियंत्रित साँसों को बुहारता रहता हूँ
जब सताती हैं छूटे हुए लम्हों की प्रेतबाधाएं !

लोग कहते हुए निकल जाते हैं
पागल साला !

महीन सी मुस्कान अंकुराने लगती है
और तब मैं चुका पाता हूँ
सहेज कर रखी वर्जित उदासियों का ॠण !

(3)
कितना पास था
उस का चेहरा  कि मैं अपनी साँसों में भर लूँ
वहाँ पसरी हुई मद्धिम रौशनी को
जिसमें उग रही थी एक अगम्य चंचलता !

लेकिन कितना दूर था मैं
निज स्व से आक्रांत,
थिरकते हुए धुँए पर
निज साँसों की थाप देते हुए  !

फिर यह हुआ
हम वहीँ खड़े रह गये दोनों
और रास्ते निकल गए बहुत आगे कहीं दूर !

(4 )
तुम ही जगा दो आकर
मैं तो सोया पड़ा हूँ,
युगों युगों से  देखते हुए तुम्हारे अमूर्त दृश्य !

तुम ही खोल दो
तमाम बंद खिड़कियाँ,
आ सकें ढेर सारी चिड़ियाएँ और
चहचाहट से भर जाऊँ मैं पूरी तरह !

तुम ही पुकारो
कहीं बहुत पीछे से  मेरा नाम,
लौट पाउँगा
किसी अनाम अनन्त लम्बे रस्ते से !

तुम ही दो मुझे अपना स्पर्श !
समय ने जिस वायवीय टुकड़े के बीच
रख रखा है मुझे,
शायद हो तुम्हारी ही गोद!

मैं तो बंद हूँ यहाँ
यहीं कहीं
पता नहीं कहाँ !

एक बार खटखटा कर देख लो
शायद खुल जाऊँ !

(5)
एक दिन
उतर जाते हैं तमाम रंग
शेष रह जाता है कालापन !

नहीं ढूँढ पातीं कुछ भी
उजाले की अभ्यस्त हमारी आँखें
गुम गये रंगों का वुजूद!
न ही रंगों के गुम होने की वजह !

टूट जाने वाली जगह
अक्सर अँधेरे में रहती है
करते हुए किसी स्पर्श का इंतज़ार !

बहुत साहस चाहिए
घुप्प अँधेरे में प्रवेश करने का !

भय, भूत नहीं
अपने रूबरू होना है !

(6)
हालांकि मैं कहीं नहीं था
और तुम भी शामिल नहीं थीं मेरे होने में!

हाँ मैं ही था उस रोज़ का स्नोफाल!
बर्फ़ की दूर तक बिछी चादर
का पारदर्शी श्वेत सत्य
मैं ही था!

तुम्हें पसंद है न बर्फ़ ही बर्फ़!
बर्फ़ की फिसलन और
फिसलना बर्फ़ पर दौड़ते हुए!
बर्फ़ के गोले फेंक कर मारने
का खेल खेलना!

हाँ मैं ही शामिल था उस फिसलन में
दौड़ में
बर्फ़ के गोले में
खेल में!

फिर तुम्हारी उंगलियां ठंडी होने लगी थीं
थकान भी घेर रही थी
तुमने कस कर शाल लपेट ली!
तुम्हें तलब हुई चाय की
लौट कर तुमने गरमागरम चाय
घूँट घूँट सिप की!

हाँ मैं ही तो शामिल था तुम्हारी उंगलियाें की ठंड में
थकान में
चाय की तलब में
हर सिप में !

फिर तुम ने डिनर किया
और रजाई में पूरी तरह लिपट कर
टीवी आन किया
और न जाने कब
चली गई नींद की आगोश में!

हाँ डिनर करते शामिल रहा मैं
तुम्हारी भूख में, स्वाद में, तृप्ति में और
टीवी देखते हुए देखने में भी!
कुछ पल रहा नींद में भी
तुम्हारे साथ!

बस, बस फिर लौट आना पड़ा,
लौटना ही था अपने होशोहवास में मुझे
अपने वुजूद में समूचा वापस
निष्पाप
निर्द्वंद!

क्यों कि मैं करता था
बेइंतिहा महब्बत तुम से !

(7)
मैं हूँ…
मेरा होना पानी में प्यास
आँखों में शब्द
अनुपस्थिति में स्पर्श
मौन में भाषा
मैं ही हूँ!

तभी तो संभव है
पानी में शब्द घोल पाना
आँखों में प्यास उतार देना
मौन में स्पर्श जगा डालना
और अनुपस्थिति में भी भाषा का स्पर्श!

यह मेरा होना ही तो है
मेरे होने से अर्थ हैं, शब्द हों न हों.
प्यास है, तो है पानी का अस्तित्व.
मै न होऊँ तो सब कुछ हो जाए
उलटपुलट.

—————————-

कृष्ण सुकुमार
ए०  एच०  ई०  सी०,
आई. आई. टी. रूड़की
रूड़की-247667 (उत्तराखण्ड)

मोबाइल नं० 9917888819
ईमेल kktyagi.1954@gmail.com

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