कुमार वीरेंद्र की पांच कविताएं

भोट
मुझे याद है
वह दिन, जब बाबा
ने कहा था

तू पहली बार
भोट देने जा रहा, तो बेटा
किसी नेता को देखकर नहीं, अपने
जंग लग रहे हल को देखकर, भोट देना
कि बेटा, जब तक नेताओं को, सिर्फ़
नेताओं को देखकर, भोट
दिए जाते रहेंगे

हत्यारे
कबूतर उड़ाते
रहेंगे!

परजा
अपने बच्चों
को, जब भी लोककथाएं
सुनाता हूं, नानी की बहुत, बहुत
याद आती है

नानी, जो गाकर
सुनाती थी हर कथा, और सुनाते
सुनाते, उसकी आंखों से, ढरकने लगता था, पानी
ऐसे में उससे लिपट, यही सोचता-राजा के राज
में परजा दुखी, इसीलिए, इसीलिए
रो रही नानी…

अपने बच्चों जितना
ही था, इतना छोटा कि तब सोचकर
भी कहां सोच पाता, नानी की आंखों से कथा में
दुखी, परजा के कारण ही नहीं ढरक रहा पानी
बल्कि बग़ैर किसी कथा के, नानी
भी तो खुद एक

परजा ही है।

वह एक

उसे जब
लगता, वह अपने प्रतिद्वन्द्वी
से हार जाएगा, उसकी हत्या करवा देता
और जब लगता, जीत जाएगा, तब भी
उसकी हत्या, करवा देता
वह एक

ऐसा राजा था
जिसे अपने हारने की आशंका
राक्षस बना देती थी, लेकिन, अजीब
कि उसे अपने जीतने की
सम्भावना भी

मनुष्य
नहीं बनाती थी !

संगी

कहते थे बाबा
जब भी सफ़र, अकेला लगे
सिर्फ़ अपने आसपास ही नहीं, दूर, बहुत दूर
देखते, चलते रहना, बेटा, चलते रहना कि
राह में, भले ही कोई मानुष
न सही

पर, मिल तो
जाएगा ही, कोई न कोई वृक्ष
मिल सकती है
कोई

नदी भी, बेटा !

क़रीब

कहते थे बाबा
“जिस वृक्ष की जड़ें, ज़मीन में
जितनी गहरी होती हैं, उसका आसमान
उतना ही, उतना ही
उसके

क़रीब
होता है !”

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1 Response

  1. Rajesh Sharma says:

    बेहतरीन कविताएँ ।सटीक टिप्पणी।

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