मनुष्य और लोकजीवन के कभी न अंत होने की कविताएँ

शहंशाह आलम

 

मेरा मानना है कि कविता की आँखें होती हैं, तभी तो जिस तरह कवि की पुतली अपने समय को देखने के लिए हर तरफ़ घूमती-घामती है, वैसे ही कविता की भी पुतली चहुँओर घूमती रहती है। कवि और कविता के लिए यह ज़रूरी भी है कि दोनों की पुतलियाँ घूमती हुई हों, ताकि मनुष्य का जीवन ठीक-ठाक दिखाया जा सके। इस तरह कवि और कविता, दोनों में गहराई आती है, दोनों में विस्तार आता है। संभवत: इस तरह कवि के भीतर सिंह की दहाड़ भी आती है, अपने कठिन समय से लोहा लेने के लिए। कवि का काम ही है सिंह की दहाड़ को अपनी दहाड़ बनाना। वह ऐसा नहीं करेगा तो फिर कवि का पुरुषार्थ बचा कहाँ रहेगा, कवि तक को धूल-धूसरित न कर देंगी सत्ता की चालाकियाँ! यहाँ सत्ता की बात स्वत: नहीं आ गई है बल्कि यहाँ जिस कवि, जिस कविता-परंपरा, जिस लोकमत की चर्चा की जानी है, इसमें सत्ता का दखल रहा है। बुद्ध के बारे में साहित्य के भंडार से हम जो कुछ पढ़ने-जानने के लिए निकालते हैं, सब में यही दर्शाया गया मिलता है कि बुद्ध जब मात्र सिद्धार्थ थे, मृत्यु की गहराई को जानकार, भिक्षु बनने निकल पड़े थे। मेरा इसमें मतभेद है। बुद्ध अंतत: मृत्यु की सच्चाइयों को जानकर भिक्षु बनने नहीं निकल पड़े थे, बुद्ध सत्ता की सच्चाइयों को भी जानकार भिक्षु-जीवन जीने को निकल पड़े थे। इसलिए कि कोई मनुष्य ख़ुद की मौत मरता है, तो मरना तो सबको ही है। परंतु सत्ता का सताया हुआ जब मरता है तो उसकी मृत्यु दुखद होती है। और सिद्धार्थ रहे बुद्ध, जिस सत्ता में जी रहे थे, उस सत्ता द्वारा सताए हुओं की मृत्यु भी तो देखा करते थे। मेरे विचार से, जो बुद्ध के जीवन के गंभीर अध्येता रहे हैं, उन्हें उस समय की सत्ता के सच को लेकर भी शोध करना चाहिए कि बुद्ध ‘मृत्यु’ से अधिक उस समय की ‘सत्ता’ के खेल-तमाशे से भी आहत होकर तो भिक्षु-जीवन जीने के लिए नहीं सत्ता-सुख छोड़ गए थे! उल्लेखनीय है कि समकालीन हिंदी कविता के हस्ताक्षर राजकिशोर राजन का बोधि प्रकाशन से बुद्ध की जीवन-यात्रा पर आधारित कविताओं का संग्रह ‘कुशीनारा से गुज़रते’ छपकर आया है। इस संग्रह की सारी कविताएँ बौद्ध दर्शन की कविताएँ हैं। राजकिशोर राजन जिस तरह अपनी दूसरी कविताओं में वयस्क और समझदार दिखाई देते हैं, उसी तरह बुद्ध के जीवन को देखते हुए उतने ही वयस्क और समझदार दिखाई देते हैं

बुद्ध के विरुद्ध
एक राजकुमार का सम्यक् संकल्प
जब लौटे होगे तुम
सदा के लिए
अपनी पीठ से उतार कर
तुम्हारे ही शत्रु
गिरे होंगे अवश्य(‘कंतक’/पृ.14-15)।

कंतक उस घोड़े का नाम था, जिससे बुद्ध सिद्धार्थ के रूप में प्यार करते थे और जिस पर बैठ कर वे कपिलवस्तु की सीमा से बाहर निकले थे। मेरी दृष्टि और मेरे विचार से राजकिशोर राजन अपनी इन कविताओं के माध्यम से बुद्ध के जीवन को पूरी व्यापकता, पूरी गहराई, पूरे समर्पण से दिखा पाने में सफल हुए हैं। ये कविताएँ समकालीन होते हुए जिस काल के राजनितिक-सामाजिक परिदृश्य को पृष्ठ-दर-पृष्ठ अंकित हुई हैं, वे हमें विस्मित-चकित करती हैं। मेरे विचार से राजकिशोर राजन के कवि का चर्मोत्कर्ष भी ये कविताएँ हैं। ‘कुशीनारा से गुज़रते’ से पहले ‘बस क्षण भर के लिए’, ‘नूरानी बाग़’, ‘ढील हेरती लड़की’ कविता-संग्रहों की कविताएँ कविता की जिस यात्रा पर हमें लिए चलती हैं, उस यात्रा से इस संग्रह की कविताएँ जिस काव्य-यात्रा पर हमें लिए चलती हैं, इस यात्रा का जीवन अलग है, स्वर अलग है, लयकारी अलग है। इन कविताओं की कैफ़ियत भी अलग है। इस जीवन, इस स्वर, इस लयकारी और इस कैफ़ियत से दोचार होना हमें एक नया शिल्प, एक नया तत्व, एक नया उत्साह, एक नया उत्तेजन, एक नया उत्सव देता है :

तथागत!
मैंने नहीं देखा विस्तृत नभ को
देखा पृथ्वी को
और हो गया पृथ्वी ही
देखा जल की ओर
और हो गया जल ही

गुरुवर!
देखा अग्नि को प्रज्ज्वलित
और हो गया अग्नि ही
देखा मंद-मंद बहते वायु को
और हो गया वायु ही(‘सारिपुत्त की स्वीकारोक्ति’/पृ.17)।

बुद्ध जिस जल, जिस अग्नि, जिस वायु, जिस पृथ्वी, जिस आकाश से मुहब्बत करने की चाह-चाहत लिए भिक्षु बने थे। उसी जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश की ये कविताएँ सिद्ध होती हैं। जीवन से जो राग छूट गया, रह गया, सब ये कविताएँ लौटाती है, एकदम दिलचस्प :

पृथ्वी से ऊपर नहीं
पृथ्वी पर ही
है संभावना
मुक्ति आनंद की
प्रेय और श्रेय की

दंगश्री पर्वत की ओर
उँगली उठा
बुद्ध ने कहा था
आकाश को
और सदा से
आकाश की ओर टकटकी लगाए
मनुष्य को कहा
लौटने को पृथ्वी पर(‘दंगश्री’/पृ.23)।

‘कुशीनारा से गुज़रते’ की सारी ही कविताएँ पढ़े जाते वक़्त अपनी एक अलग तासीर छोड़ती हैं। आज जब कविता के अवसान की चर्चा जब-तब सुनाई देती है, तो कविता के प्रति इस षड्यंत्र से मन भारी भी होता है। कविता के वे तानाशाह कविता के अवसान का सपना देखते-देखते हिंदी आलोचना से ख़ुद का ही अवसान करा बैठे हैं जबकि कविता अपने विकास-पथ पर छाती ताने चलती ही चली जा रही है। कविता के विकास में राजकिशोर राजन का और इन्हीं जैसे कई-कई कवियों के योगदान को हिंदी आलोचना के तानाशाह आलोचक स्वीकारने-मानने से इनकार भी करते रहे हैं, मुँह भी चुराते रहे हैं। मेरे लिए सुखद यही है कि राजकिशोर राजन और इन्हीं जैसे वे कवि, जिनका साबक़ा हिंदी आलोचना के उन चालाक आलोचकों से अकसर पड़ता रहा है, अपनी शानदार कविताओं से वैसे आलोचकों की छाती पर मूँग दलते रहे हैं :

नहीं मिला इतना आकाश
कि ठहर कर विचारता
जिसके पास जो
वही तो बाँटता संसार में

क्यों नहीं लौटा दिया उसे
जिससे लिया
बैर से स्वयं को भरता रहा

मैं चाहता था फूल देना
बाँटना सुगंध
अब कैसे दूँ कैसे बांटूँ
बैर में फूल कबका सूखा
कबसे सुगंध मरता गया(‘बैर’/पृ.51)।

बुद्ध को हम महान मानते हैं। उनके जीवन को प्रखर। ‘कुशीनारा से गुज़रते’ कविता-संग्रह में प्रकाशित साठ से अधिक कविताओं में पूरे मनोयोग से राजकिशोर राजन ने बुद्ध के आरंभ को उकेरा है और बुद्ध के अंत को सँवारा है। बुद्ध का ज्ञान इन कविताओं में बोधिवृक्ष-सा बिलकुल हरा-भरा दिखाई देता है। ऊर्जासंपन्न कवि राजकिशोर राजन ने जिस गुपचुप तरीक़े से बुद्ध के जीवन को जिया और अपनी कविता को वैसा ही जीवन जीने दिया, हमें अचंभित करता है। दरअसल कवि और कविता का जीवन भी तो बुद्ध का ही जीवन होता है। संभवत: ऐसा ही जीवन कवि और कविता को ऊँचे मकाम तक पहुँचाता है, बुद्ध का ही विद्रोही चेहरा लिए। बुद्ध के बहाने इन कविताओं में मनुष्य का ही वर्तमान किसी दूब की तरह फैलता-बिछता हुआ दिखाई दे रहा है, जो दूब हमारी आँखों को ठंडक भी देती है, सुकून भी।

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‘कुशीनारा से गुज़रते'(बुद्ध की जीवन-यात्रा पर आधारित कविताएँ
कवि : राजकिशोर राजन
प्रकाशक : बोधि प्रकाशन, एफ़-77, सेक्टर-9, रोड नं. 11, करतारपुरा इंडस्ट्रियल एरिया, बाईपास गोदाम, जयपुर-302006
आवरण : कुँवर रवीन्द्र
मूल्य : 80₹

 

 

 

 

 

 

 

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