नज़्म सुभाष की 3 लघुकथाएं

सौदा

दिन पर दिन रोजी रोटी का जुगाड़ मुश्किल होता जा रहा है। मार्केट जैसे कोई आता ही नहीं ….ऐसे कैसे चलेगा गुजारा ?….कमाई कुछ भी नहीं और खर्चा … सुरसा की तरह हमेशा मुंह बाये रहता…करीब हफ्ते भर से बिटिया रोज कहती है -“पापा मेरा बस्ता फट गया है”
“ठीक है बाबू ….ला दूंगा “-कहने को तो वह वह कह देता है पर लाए कैसे ?
पूरे दिन की कमाई 100-150 रुपए पर सिमट गई है। पितृपक्ष में कोई काम नहीं करना चाहिए पता नहीं किस कम्बखत ने ऐसी अफवाहें उड़ा रखी हैं….. क्या पितृपक्ष में लोग खाना नहीं खाते?
आजकल तो हालात यह हैं कि रोज के खर्चे ही पूरे नहीं होते मगर वो बिटिया को भी कब तक टालता बस्ता पूरी तरह से जर्जर हाल में है । 2 चेन भी खराब हो चुकी हैं।
आज तो बिटिया ने जिद ही पकड़ ली -“आप रोज -रोज कहते हैं ला दूंगा पर लाते नहीं अब मैं स्कूल तभी जाऊंगी जब बस्ता लाएंगे ।….बच्चे चिढ़ाते हैं ….फटा बैग.. फटाबैग”

5 साल की बेटी परिस्थितियां क्या समझे? उसके लिए तो सबसे बड़ी समस्या यही थी कि बच्चे उसे चिढ़ाते हैं  ।
उसकी बात अनसुनी कर के वो ठीहे पर चला आया।  बाजार में वो  पुराने कपड़ों की मरम्मत का काम करता है। किसी तरह धकर -पकर गाड़ी चल जाती है बस….।

आज तो उसे हर हाल में बस्ता ले ही जाना पड़ेगा ।शाम हो आई पर काम-धाम ….ऊंट के मुंह में जीरा।
सुबह आते समय एक बुक शॉप पर उसने बस्ते का रेट पूछा था तो डिस्काउंट के बाद 250 रुपये का था । उसने सोचा था…काश! आज 250 रुपये का ही काम हो जाता ….पर कहां ?ग्राहकों की राह तकते- तकते पूरा दिन गुजर गया पर अब कौन आएगा ….अब तो उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती ।उसने जेब से तुड़े- मुड़े  सारे नोट और सिक्के निकाले। एक भरपूर नजर उन्हें देखा जैसे उन्हे नजरों से तौल रहा हो ।वो गिनने लगा ।
80 …90… 100 …102 …107..108 …113 टोटल 135 …..।बस्ता आज भी नहीं आ पाएगा ।फिर बिटिया पढ़ने कैसे जाएगी ?सवाल तो अनुत्तरित ही रह गया।

उसने दीवार की टेक लगाकर आंखें बंद कर ली ।जैसे आंख बंद कर के सारी समस्याएं खत्म हो जाती हों। और उसके हाथ में था भी क्या….. क्या कर सकता था वो… हर तरफ मंदी ….बाजार  में ग्राहक कम सन्नाटा ज्यादा है। पहले नोटबंदी और उसके बाद जीएसटी ने व्यापारियों की कमर तोड़ दी । छोटे-मोटे कामगार तो भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं ।उसका भी यही हाल है।

कुछ देर बाद उसे महसूस हुआ कोई आ रहा है उसने आंखें खोलीं।
एक बुजुर्ग उसकी तरफ आ रहे थे ।आंखों में चमक उतर आयी।बुजुर्ग पास आकर उसे काम समझाने लगे
“ठीक है सर हो जाएगा …मगर कल मिलेगा ”
“वह तो ठीक है …मगर खर्चा कितना आएगा”
” 140रुपये…”
“बहुत ज्यादा बता रहे हो ”
“सर एकदम सही पैसे बताए हैं”
पेंशनर आदमी हूं… कुछ तो रियायत करो ..”
“सर आप तो पेंशनर हैं …आपको कुछ तो मिल ही जाता है मगर हम तो पूरा दिन बर्बाद करके भी खाली हाथ हैं।” कहते समय उसकी आंखों में नमी उतर आयी थी।
“क्या पेंशन मिलती है…. ”
बुजुर्ग जैसे कहीं खो गये। फिर बुझे स्वर में बोले-
“ठीक है …काम अच्छा करना”
“बिल्कुल सर …शिकायत नहीं मिलेगी”
बुजुर्ग जाने लगे ।
“1 मिनट सर “।उसने आवाज दी ।
बुजुर्ग रुक गये।
“सर ,क्या पैसे मुझे आज दे सकते हैं?”
” पर क्यों …?कपड़े तो कल मिलेगें ”
“हां ,लेकिन यदि पैसे आज देंगे तो 140 के बजाए 115 ही ले लूंगा ।”
“बुजुर्ग कुछ देर सोचते  रहे फिर 115 रूपये निकाल कर दे दिये।
उसने रुपये ले लिये।जैसे मांगी मुराद मिल गयी।उसने उन्हें चूमा फिर आंखों से लगा लिया। 25 रूपये बस्ते में डिस्काउंट की बात हुई थी, वह इधर चले गये लेकिन उसे उम्मीद थी बिटिया कल से स्कूल जरुर जाएगी।

कबाड़
दिवाकर बाबू घर के दोमंजिलें पर बने अपने कमरे में एकदम गुमसुम बैठे थे। चंद्रकला का जब से निधन हुआ है जैसे वह किसी बीहड़ जंगल में भटक रहे हों। जब तक वह जीवित थी कितना ख्याल रखती थी। समय पर दवाई…समय पर खाना…फुरसत के क्षणों में हंसते बतियाते समय कब बीत जाता था पता ही नहीं चलता था।अब तो जैसे वह किसी और जन्म की बात हो… सब कुछ कितना बदल चुका है। अब तो जीने की इच्छा भी मर चुकी है।शायद चित्रगुप्त उनका रजिस्टर देखना ही भूल चुके हैं।
चंद्रकला के अलावा धीरे-धीरे सारी स्मृतियां लोप हो रही हैं।अब कुछ भी याद रहता है तो ये बदरंग दीवारें…बेड पर बिछा मैला सा चद्दर… लट्टू की तरह सिर पर घूमता सीलिंग फैन…. और यत्र तत्र बिखरी पड़ी घर की बेकार हो चुकी चीजें…

वो कभी कुर्सी पर बैठकर पहलू बदलते तो कभी कोई किताब उठा लेते मगर 2-4 पन्ने पढ़ने के बाद मन उचट जाता। कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। पहाड़ जैसे दिन-रात काटे नहीं कटते ।काश! वह आज जीवित होती तो अपने सुख-दुख ही बांटते रहते……। काश..काश…काश….हृदय में अजीब-सी हूक उठती है।

बेटा बैंक मैनेजर है। पता नहीं काम का दबाव है या अब उनका अनुपयोगी हो चुका जीवन…. अब तो उसे देखे हुए हफ्तों बीत जाते हैं।वो ऊपर जल्दी आता ही नहीं…और उनके पैरों में इतनी ताब भी नहीं कि जीने से बिना सहारे के उतर सकें।

बस कभी कभार आठ साल की पौत्री कौमुदी आ जाती है या फिर खाना लेकर बहू…इसके अलावा इन दीवारों में जिंदगी की कोई खुशनुमा तस्वीर नहीं उभरती ।

अचानक छत पर आहट हुई तो जैसे वह नींद से जागे थे। उन्होंने देखा कौमुदी उनकी तरफ से आ रही थी।

वो शायद जल्दबाजी में थी लिहाजा करीब आते ही उसने तपाक से पूछा-” बाबा आपके कमरे में कोई पुरानी बोतल है क्या?”
” पुरानी बोतल”
दिवाकर बाबू को आश्चर्य हुआ लिहाजा वो बेखयाली में बुदबुदाए-“यहाँ तो हर तरफ कबाड़ ही है बिटिया..देख लो शायद मिल जाए”
कौमुदी ने पूरे कमरे में एक नजर दौड़ाई फिर बेड के नीचे झांककर देखा ।एक बोतल पड़ी थी लिहाजा वो देखते ही  खुश होकर जोर से चिल्लाई -“मिल गई मिल गई।”
“अरे वाह…वैसे इस बोतल का तुम क्या करोगी?”
दिवाकर बाबू ने उसे आश्चर्य से देखते हुए पूछा तो वो बोल पड़ी-” बाबा आपको कुछ पता ही नहीं… अरे हां आपके पास तो मोबाइल ही नहीं तो पता कैसे होगा?”
दिवाकर बाबू उसे हैरानी से देखने लगे और वह बोले जा रही थी-“वो क्या है न..मैंने अभी यूट्यूब पर ‘कबाड़ से जुगाड़’  वाला एक वीडियो देखा था उसमे पुरानी बोतल से ढेर सारी चीजें बनाने का तरीका बताया था।मैं अब वही ट्राई करूंगी ।”
उसकी बात सुनकर वो चहक पड़े-“अरे वाह मेरी रानी बिटिया बड़ी समझदार हो गयी है”
फिर अचानक जैसे उन्हें होश आया तो शब्दों की ऊष्मा जाने कहाँ खो गयी-” शुक्र है अब कबाड़ के दिन भी बहुरेंगे…अच्छा बेटा वो क्या नाम बताया तुमने उसका..?”
“किसका बाबा?”
“वही जिस पर ये सब देखती हो”
“यूट्यूब”
“अरे हां वही….. उसमें कबाड़ हो चुके बूढ़ों के लिए भी कोई वीडियो है क्या?”
” बाबा मैं कुछ समझी नहीं”
उसने समझने का प्रयत्न करते हुए दिमाग पर जोर डाला।
” रहने दो बिटिया तुम नहीं समझोगी… हाँ, तुम इस बोतल को ले जाओ और जो कुछ बनाना एक बार मुझे भी दिखाना…दिखाओगी न ”
कौमुदी ने ‘हाँ” वाले अंदाज में सिर हिलाया और बाहर निकलने लगी। दिवाकर बाबू बड़ी देर तक उसे जाते हुए देखते रहे।

अंतिम बार
अम्मा की जान अटकी थी।वो बार बार कसमसाती। ऐसा लगता अब प्राण निकले मगर न जाने क्यों हर बार दो चार सेकंड के झटकों के बाद वो फिर शिथिल हो जातीं।नाते रिश्तेदार सब घेरे खड़े थे।पारिवारिक पंडित जी सिरहाने बैठे सुंदरकांड का पाठ कर रहे थे। मुंह में गंगाजल भी डाला जा चुका था ताकि उन्हें ज्यादा तकलीफ न हो मगर न जाने क्या था जो उन्हें रोके था।करीब घंटा भर होने को आया लाख प्रयत्नों के बाद भी उनके प्राण अटके ही रहे।
अब तो धैर्य जवाब दे रहा था। धीरे धीरे रिश्तेदार भी मन ही मन बड़बड़ाने लगे थे। कम्बखत बुढ़िया फालतू में लटकी है।मरे तो दाह संस्कार करके छुट्टी पाएं और घर जाकर अपना कामधाम देखें ।मगर इन सबके बीच दोनों बहुओं की नजर अम्मा की संदूकची पर थी, जो हमेशा उनके बिस्तर के सिरहाने ही रहती थी जिस पर जंग लगा एक मोटा ताला हमेशा झूलता रहा।जरूर बुढ़िया ने इसमे गहने गुरिया छुपाए होंगे तभी तो हमेशा छाती पेटे लगाकर रखती है..पता नहीं लादकर ले जाएगी क्या….
धैर्य बहुओं का भी जवाब दे रहा था मगर करें तो क्या…मेहमान इकट्ठा हैं..बस किसी तरह उनके मरने की देर थी…मरते ही ताला तोड़ दिया जाएगा।

अम्मा बार बार कुछ बोलने का प्रयत्न कर रही थीं मगर आवाज ही बाहर न आ रही थी।वहां पर खड़े सभी लोगों ने उनकी आवाज़ सुनने की तमाम कोशिशें कीं पर कामयाब न हो सके।लोग उनकी बात समझने के लिए तरह-तरह की तरकीबें बता रहे थे मगर अंत में सहमति इस पर बनी कि अम्मा को पेन पकड़ा दिया जाए शायद वो कुछ लिख सकें।लिहाजा दौड़कर एक पेन और कॉपी का इंतजाम किया गया।बड़ी मुश्किल से सहारा देकर उन्हें पेन पकड़ाया गया।
उन्होंने कांपते हाथों से बड़ी मशक्कत के बाद अस्पष्ट सा कुछ लिखा।
जिसे उनके बड़े बेटे कुशाग्र ने पढ़ा -” पान”
उन्हे हैरानी हुई ।क्या अम्मा पान खाना चाहती हैं? मगर उन्होंने अपने पूरे जीवन में अम्मा को कभी पान खाते न देखा ..यहाँ तक कि कोई घर में पान खाकर आ जाए तो अम्मा बड़बड़ाने लगती थीं फिर आज पान की ख्वाहिश… कहीं अम्मा कुछ और तो नहीं लिखना चाहती थीं।
उसने अपने छोटे भाई की तरफ कॉपी बढ़ा दी-” प्रकाश देखो जरा ..अम्मा ने क्या लिखा है?”
प्रकाश ने भी पढ़ा तो उसे भी पान ही समझ आया। अब शक की कोई गुंजाइश न थी।लिहाजा एक आदमी को भेजकर पान मंगाया गया और अम्मा के मुंह को हल्के से दबाकर बाएं गाल की ओर सरका दिया गया। अम्मा के चेहरे पर अब संतुष्टि थी।उन्होंने आहिस्ता आहिस्ता दो तीन बार मुंह चलाया ही था कि एक जोर की हिचकी के साथ उल्टी हुई और अम्मा के प्राण पखेरू उड़ गये।
और इसके साथ ही घंटे आध घंटे का रोना गाना शुरू हुआ…फिर दाह संस्कार की तैयारियां शुरू हो गयीं।

करीब दो घंटे बाद उनकी शव यात्रा जैसे ही निकलकर आंखों से ओझल हुई दोनों बहुओं ने संदूक उठा ली और मेहमानों से नजर बचाकर एक कमरे में घुस गयीं। हथौड़े के कई जोरदार प्रहार के बाद अंततः जंग लगा ताला टूट गया।उनकी आंखों में चमक उतर आयी।जल्दी से कुंडी खोलकर उसका ढक्कन ऊपर उठाया।एक सुहाग का जोड़ा सामने था।जरा और खोदा तो एक पानदान दिखा।लगता है बुढ़िया ने इसी में गहने छुपाए होंगे यही सोचकर उसका ढक्कन खोला तो एक पीला पड़ चुका तह लगा पुर्जा हाथ लगा।बड़ी बहू उसे खोलकर पढ़ने लगी -” मेरे जीवन की अमूल्य निधि ! तुम्हें बड़े अरमानों के साथ घर से लेकर आयी थी मगर आज तुम्हारे लिए न जाने कितने जूते और लात घूसे खाए हैं जबकि इस चौखट पर आए मात्र तीन दिन हुए हैं।स्वागत अच्छा ही रहा।डबडबाई आंखों को पोछते हुए अम्मा ने चलते समय कहा था “बिटिया अब तुम्हारा घर वही है हमारी लाज रखना”।लिहाजा निभाऊंगी अम्मा…आपकी परवरिश पर उंगली न उठने दूंगी। मगर सारे सपने सारी उम्मीदें धराशाई हो चुकी हैं।पिताजी ने तो कभी चपत तक न लगायी थी……

खैर”इनको” मेरा पान खाना पसंद नहीं जबकि खुद शराब पीकर आते हैं।ठीक है….मेरी नियति यही सही।अंतिम बार तुम्हें चूम रही हूं।आज के बाद तुम्हें कभी हाथ न लगाऊंगी मगर हाँ ये वादा करती हूं तुम हमेशा मेरी यादों में जिंदा रहोगे”
23 जून 1951

पुर्जा पढ़ने के बाद दोनों बहुओं ने हैरत से पानदान को देखा

पपड़ी बनकर टुकड़ों में छितराया हुआ कत्था- चूना …सड़कर बदरंग हो चुकी कटी सुपारियां…और एक सूती कपड़े में लिपटा हुआ ज़र्द पान का पत्ता …

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नज़्म सुभाष
शिक्षा बीए, एलएलबी
जन्म तिथि -1/7 /1986
प्रकाशित रचनाएं– हंस, कथाक्रम,  कथाबिम्ब, पाखी समेत कई पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं गीत-ग़ज़ल कहानियां प्रकाशित
प्रकाशित पुस्तकें : ग़ज़ल संग्रह ‘चीखना बेकार है’, कहानी संग्रह ‘संगतराश’, लघुकथा संग्रह ‘मंटो कहां है’  कहानी संग्रह ‘फ़िरदौस ख़ानम; प्रकाशनाधीन
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