ललित शर्मा की दो कविताएं

 बिजूका
जानते नहीं ,
क्या होता,
बिजूका?
एक टाँग ,
पर खड़ा हुआ,
बाँहें पसारे,
मटकी का सिर लटकाये,
सदा मुस्कराये,
पराली का शरीर,
चीथड़े लगा कोट,
खेत जैसे इसका हो।
कौआ भगाने को,
लगाया इसको,
चिड़िया तक नहीं ,
भागती,
चूहे भी,
कुतर जाते टाँग ,
इसी की,
कभी गिरा जाता,
बैल इसी को,
फिर झाड़ पोंछ,
खड़ा किया जाता
अगले दिन,
फ़सल कटने तक,
रहेगा यूँ ही,
नक़ली रखवाली?
कभी करेगा ,
कभी गिरेगा,
लगता कभी कभी,
हमको,!कहीं
हम अपने अपने,
घरों के बिजूका
तो नहीं?
झूठ

जा रहा हूँ
कब लौटूँगा ?
कह नहीं सकता !!
छोड़े जा रहा हूँ ,
खूँटी झूठ की,
टंगे हैं कुछ
रंग बिरंगे
कपड़े
ओढ़ लेना
जब जी चाहे,
मौक़े के अनुसार,
अच्छे लगेंगे
दूसरी और देखना
पुलिंदे रखे हैं;
झूठ के
जितना चाहे,
ले लेना
शेष बाँट देना !
दिल खोल कर,
रखना बाक़ी पुलिंदे
संभाल कर;
काम आयेंगें।
यदा कदा;
तालों में रखी हैं
कुछ परतें झूठ की,
मत खोलना उन्हें,
न उधेड़ना उन्हें,
उधड़ गईं,
सच बाहर ,
आ जायेगा
नंगे हो जायेंगे
हम सब।
ज़रूरत हो तो,
चढ़ा लेना,
इस पर
सच का मुल्लमा*
सच टंगा है !!
सलीब पर,
हो सके तो
उतार लेना,
रख लेना संदूक में,
संभाल कर,
देखना,
दाग न लगे कहीं।

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1 Response

  1. deepesh sharma says:

    ललित शर्मा की अद्भुत कविताएँ”बिजूका” एवं”झूठ” मन को छू गईं।मैं फेस बुक पर पढ़ता रहता हूं।———दीपेश

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