स्त्री कथाकारों का ईमानदार मूल्यांकन

पत्रिका: लमही

हमारा कथा समय विशेषांक, खंड एक

प्रधान: संपादक विजय राय

मूल्य: 50 रुपए

पता: 3/343, विवेक खंड, गोमतीनगर, लखनऊ-226010

मोबाइल: 9454501011

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

प्रतिष्ठित साहित्यिक पत्रिका लमही का नया अंक (अप्रैल-सितम्बर संयुक्तांक) हर उस पाठक के लिए एक दुर्लभ उपहार की तरह है, जिसकी दिलचस्पी कहानियों में है। दुर्लभ इसलिए कि हिन्दी कहानी के विकास और बदलाव के दस्तावेजीकरण की जो श्रमसाध्य कोशिश ‘लमही’ और उसके संपादक विजय राय ने की है, वह सबके वश की बात नहीं है। साठोत्तर पीढ़ी से अब तक के महत्वपूर्ण कथाकारों की कहानियों के सम्यक मूल्यांकन की कोशिश में वो पिछले 2 सालों से जुटे हुए हैं। कम संसाधन में इतना बड़ा काम करने के लिए वाकई वे बधाई के पात्र हैं।

हिन्दी कहानी की नब्ज़ पकड़ने की इस कोशिश का सटीक नाम पत्रिका ने दिया है—हमारा कथा समय। यह पहला खंड है। कुल 3 खंडों की योजना है। पहला खंड महिला कलाकारों पर केंद्रित है। ममता कालिया, सूर्यबाला, मृदुला गर्ग, सुधा अरोड़ा, नासिरा शर्मा, मैत्रेयी पुष्पा, नमिता सिंह, उषा किरण ख़ान, मधु कांकरिया, सुषमा मुनीन्द्र, गीताश्री, अलका सरावगी, लवलीन, मनीषा कुलश्रेष्ठ, जया जादवानी, प्रत्यक्षा,  आकांक्षा पारे काशिव, प्रज्ञा पांडेय, प्रज्ञा, सोनी पांडेय समेत कुल 46 महिला कथाकारों की रचनाओं की पड़ताल इस अंक में किया गया है।

दरअसल यह 46 महिला कथाकारों के बहाने साठोत्तर पीढ़ी से अब तक के स्त्री कथा लेखन की व्यापक और गहन पड़ताल है। मैं यह मानता हूं कि पुरुष कथाकारों की तुलना में महिला कथाकारों के सामने चुनौतियां ज़्यादा कठिन रही हैं और इसलिए विषय कि विविधता से लेकर लेखन के अंदाज़ तक उनके सामने संभावनाएं भी उतनी ही व्यापक रही हैं। महिला कथाकारों ने इस संभावना को गंवाया नहीं। यही वजह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी स्त्री कथा लेखन लगातार बोल्ड और मज़बूत होता गया। विषमता चाहें परिवार में हो या समाज में—महिलाओं ने बड़ी ही मुखरता के प्रतिरोध की आवाज़ अपनी कहानियों में उठाया है।

पंकज पराशर ने अपने आलेख स्त्री-कथा और अनुभवजन्य आख्यान में लवलीन के एक बयान का हवाला दिया है। लवलीन ने कहा था, ‘स्त्री परिवार में, समाज में, कार्यक्षेत्र में कितने रिश्ते निभाती है—सास-ससुर, देवर-जेठ,  बहू-बेटी, ननद, बुआ आदि क्योंकि उसका दिल दरिया है। वह हरेक के साथ व्यक्तित्व की  पूर्णता के साथ जुड़ती है—विचित्र तौर पर हीन—कुंठित और संकुचित होता है। इसलिए स्त्री अनेक मैत्रियां निभा सकती है।’  महिला कथाकारों के लेखन को समझने के लिए लवलीन का यह बयान महत्वपूर्ण है। औरत जो तमाम रिश्ते पूर्णता के साथ निभाती है—वही उसे इतना अनुभवसंपन्न और संवेदनशील बनाता है कि कहानी में भी पूर्णता के साथ ही उसका व्यक्तित्व उभर कर आता है। उसके पास विषयों की जो विविधता है, वह इन रिश्तों की बारीक पकड़ होने की वजह से ही है। पुरुष कथाकार शायद यहीं चूक जाय। इसलिए महिलाओं के बारे में जिस प्रामाणिकता के साथ स्त्री कथाकार लिख  सकती है, उसकी उम्मीद किसी और से नहीं की जा सकती। यह बात भी उल्लेखनीय है कि इस अंक में प्रवासी महिला कथाकारों के लेखन को भी रेखांकित किया गया है।

इसमें कोई शक नहीं कि यह अंक संग्रहणीय है लेकिन दुख की बात है कि इतनी अच्छी पत्रिका भी अब संसाधन के अभाव में बंद होने के कगार पर पहुंच गए। हम हिन्दी वाले क्या सिर्फ़ लंबी लंबी बातें ही करते रहेंगे या हर महीने कुछ पत्रिकाएं खरीद कर पाठकों तक अच्छा  साहित्य पहुंचाने की कोशिश कर रही पत्रिकाओं को बचाएंगे। विजय राय ने अपने संपादकीय में लिखा है, “हम लगातार भारी घाटे में चल रहे हैं। स्थितियां बेहतर करने के लिए हम निरंतर संघर्ष और प्रयत्न कर रहे हैं लेकिन यदि कामबाय नहीं हुए तो अक्टूबर-दिसंबर 19 अंक से लमही का प्रिंट वर्जन मजबूरन बंद करके हम इसे सिर्फ ऑनलाइन ही जारी रख पाएंगे।” यह सचमुच बहुत दुखद स्थिति है। किसी पत्रिका का डिजीटल संस्करण आना बहुत अच्छी बात है। यह बड़ा मंच है और पत्रिका की पहुंच पूरी दुनिया तक होती है। पाठकों तक पहुंचने के लिए हर नई तकनीक का इस्तेमाल करना जरूरी है लेकिन आर्थिक संकट के कारण पत्रिका का प्रिंट संस्करण बंद करना पड़ रहा है तो जाहिर तौर पर यह दुखद है। इसके हम पाठक ही दोषी हैं और अगर ऐसा हुआ तो हमें खुद को माफ़ नहीं करना चाहिए।

अभी भी वक्त है। हमें पत्रिकाएं खरीदनी शुरू कर देनी चाहिए। लमही का यह अंक भी उपलब्ध है। आपको तत्काल ऑर्डर करना चाहिए।

 

Leave a Reply

Your email address will not be published.