हिंदी हैं हम वतन हैं, हिंदुस्तां हमारा

किस्त 16, हर शनिवार

आज आखिरी कोच में बैठे हुए सोच रहा हूं कि हर साल पितृपक्ष में लोग पितरों को याद करते हुए पिंडदान करते हैं। ठीक इसके बरक्स हमारे यहां हिंदी पखवाड़ा शुरू हो जाता है। यह कैसा संयोग है कि दोनों पखवाड़ों में हम अपने अतीत को याद करते हैं। दुखी होते हैं। मगर अब आंसू बहा कर अपनी ऊर्जा नष्ट करने का दौर नहीं रहा। चाहे वह मुद्दा अपनी भाषा का हो या हमें छोड़ कर चले गए पूर्वजों का।

पिछले दिनों मेट्रो में इसी तरह सफर के दौरान फेसबुक अपडेट चेक कर रहा था। तभी एक मित्र प्रोफेसर साहब के उवाच पर नजर पड़ी। उन्होंने लिखा था कि उनका एक छात्र किस तरह हिंदी में पढ़ाई को लेकर दूसरों के सामने शर्मिंदा हो जाता है। हैरत हुई थी पोस्ट पढ़ कर। आज जब हिंदी की ताकत का लोहा विदेशी कंपनियां भी मान रही हैं, ऐसे में एक युवा की हिंदी को लेकर शर्मिंदगी ने मेरे मन में कई सवाल खड़े कर दिए।

अभी सफर करते हुए आनलाइन हूं। आपसे रू-ब-रू हूं। फेसबुक पर मित्रों के ज्यादातर स्टेटस मुझे हिंदी में दिख रहे हैं। जिनके गैजेट हिंदी अनुकूल नहीं हैं, वे भी रोमन लिपि में हिंदी लिख रहे हैं। और खूब लिख रहे हैं दिल की बात, ज्ञान की बात। देश की राजनीति पर चर्चा भी कर रहे हैं।

हिंदी अभी न तो प्रौद्योगिकी की भाषा है और न ही रोजगार की। फिर भी वह अंग्रेजी से आगे क्यों निकल रही है। इस पर कभी आपने सोचा है? उसे यह गति तकनीक ने दी है। पिछले छह दशक में राष्ट्र की अभिव्यक्ति की जो परिभाषा गढ़ी जा रही है, वह अचंभित करती है। हम इस नई हिंदी को समकालीन भाषा कह सकते हैं, जिसे पूरा भारत बोलता और समझता है। यह गर्व का विषय है।

हिंदी मे काम करने वाले किसी भी भारतीय को आज शर्मिंदा होने की जरूरत नहीं। यह हमारी पहचान है। दरअसल, बरसों तक हिंदी की दुर्गति के लिए और कोई नहीं इस भाषा के कट्टरपंथी पैरोकार जिम्मेदार हैं। उन्होंने पाठ्यक्रमों की चहारदिवारी और जरूरत से ज्यादा व्याकरणिक पाबंदियों के बीच हिंदी की रसधारा को सूखने दिया। साहित्य के मठाधीशों ने तो इसे ऐसी विशिष्ट भाषा बना दी कि एक समय में यह उपहास का पात्र बनी रही। यानी यह एक ऐसी स्त्री के रूप में दिखने लगी, जो बेहद दुबली-पतली थी मगर अलंकारों के बोझ से दबी हुई थी।

हिंदी पर साहित्य के इस अनावश्यक अनावरण को सबसे पहले सिनेमा और फिर मीडिया ने उतार फेंका। सकुचाई सी वह स्त्री (भाषा) एकदम तेजतर्रार अंदाज में सामने आई। फेसबुक पर वह थोड़ी अल्हड़ जरूर हो गई है, लेकिन वह यहां भी कमाल की दिख रही है।

हिंदी के इस नए रूप का परंपरावादियों ने यह कर कर विरोध किया कि यह तो बाजार में बैठ गई है। यानी यह बाजार की भाषा है। कोई स्त्री सजने-संवरने लगे, तो क्या उसके चाल-चरित्र पर संदेह करेंगे? परंपरावादियों का आरोप यही भाव लिए हुए था। आज हिंदी का ‘बोल्ड’ होना इन्हीं परंपरावादियों को करारा जवाब है। और यह जवाव आप लोग दे रहे हैं।

आज जब फेसबुक पर नए-पुराने मित्रों को हिंदी में लिखते हुए देखता हूं। उनका लिखा हुआ पढ़ता हूं तो सुखद अनुभूति होती है। हिंदी यहां भी एक नए प्रयोग से गुजर रही हैं।

क्षेत्रीय भाषाओं के अलावा देसज शब्दों और मुहावरों से समृद्ध हुई हमारी हिंदी कोई एक दिन में नहीं बनी है। भाषा के बनने की एक सतत प्रक्रिया होती है। वह समय और स्थान के हिसाब से बनती-बिगड़ती रहती है। पिछले दो दशक में मीडिया और बाजार ने भी एक नई हिंदी बनाई है। यहां ठंडा मतलब कोकाकोला हो जाता है। यह कुछ को भली लगती है, तो कुछ को अखरती भी है। फेसबुक पर भी हिंदी एक नया मुहावरा गढ़ रही है। क्या आप गौर कर रहे हैं इस पर?

ये तो आप भी मानेंगे कि मोबाइल फोन पर एसएमएस और वाट्सऐप पर रोमन में संदेश भेज रही नई पीढ़ी पहले हिंदी में ही सोचती है। उनकी चैटिंग यानी संवादों में अंग्रेजी के शब्द ‘नमक में आटे के बराबर’ ही होते हैं। यह हिंदी की ही ताकत है कि तमाम बड़ी कंपनियां अपने मोबाइल फोन को हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में समर्थ बना रही हैं। वे जानती हैं कि नई पीढ़ी अपनी भाषा में संवाद करना ज्यादा पसंद करती है। फिर क्षेत्रीय भाषाओं का अपना एक विशाल वर्ग भी है, जिसकी उपेक्षा कर बाजार में नहीं टिका जा सकता।

इस यात्रा में सोच रहा हूं कि राज्यों की विविध बोलियों ने हिंदी को एक तरह से राष्ट्रीय सूत्र में बांधा है। अनेकता में एकता का भाव हमें यहां भी दिखता है। आप देश में कहीं भी चले जाइए, इस भाषा को बोलने वाले मिल ही जाएंगे। इसके बिना आपका काम नहीं चल सकता। यही वजह है कि गैर हिंदीभाषी राज्यों में भी हिंदी के चैनल और अखबार पहुंचे हैं और वहां के लोगों की आवाज बन रहे हैं। पाठकों के सरोकार के साथ उनकी बोलियों के शब्दों को भी बखूबी स्वीकार किया है। सोशल मीडिया पर भारतीय भाषाएं भी जब अपनी जड़ें जमा लेंगी, उस दिन पूरा भारत भावनात्मक रूप से एक सूत्र में बंधा दिखेगा। हिंदी ने यह पहल कर दी है।

पिछले एक दशक में हमारी हिंदी खूब परिमार्जित हुई है। वह जरूरत से ज्यादा चमकी है। यह ‘रिन की चमकार’ की तरह है। मीडिया का प्रभु वर्ग इसे युवा भारत की भाषा बनाना चाहता है। इसका समर्थन भी है और विरोध भी, लेकिन इस पर छाती कूटने वाले यह नहीं बताते कि हिंग्रेजी बनती हिंदी अपने सामान्य रूप में कैसे बरकरार रहे। कैसे वह नई तकनीक से जुड़े शब्दों को अंगीकार करे और इससे जुड़े नए शब्द तैयार कर उन्हें प्रचलित किया जाए।

मगर मैं यह भी मानता हूं कि बाजार की भाषा बनती हिंदी को ‘कूल’ बनाने वाले बाजारवादियों से न केवल हिंदी बल्कि इस भाषा के लेखकों और पत्रकारों को भी सजग रहने की जरूरत है। जिस तरह भारत में व्यापार करने आए अंग्रेजों ने बाजार की आड़ में सत्ता की डोर पकड़ कर इस देश को गुलाम और फिर कंगाल बनाया, ये नवबाजारवादी और उनके पैरोकार भी अपनी जेबें भर कर कहीं हिंदी को कंगाल न बना दें। इस पर नजर रखना हम सब का दायित्व है। आप इसे निभाएंगे न?

आप के साथ हिंदी पर चिंतन करते हुए मेरा स्टेशन आ गया है। उद्घोषणा हो रही है- अगला स्टेशन राजीव चौक………। हिंदी में रोटी कमाने निकला हूं। मोहम्मद इकबाल का लिखा यह गीत दिल गुनगुना रहा है-

हिंदी हैं हम वतन हैं, हिंदुस्तां हमारा-हमारा, 
सारे जहां से अच्छा हिंदुस्तां हमारा………।

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1 Response

  1. rakesh dhar dwivedi says:

    bahut sundar

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