जो पढ़ रहे हैं, वही कहानियों को बचा रहे हैं : शंकर

कहानी के विभिन्न पहलुओं पर वरिष्ठ कथाकार और परिकथा के संपादक शंकर से ख़ास बातचीत। बातचीत की है वरिष्ठ कथाकार हरियश राय और सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव ने

सत्येंद्र : शंकर जी, आप वरिष्ठ कथाकार भी हैं और संपादक भी। तो शुरुआत इसी सवाल से करते हैं कि आखिर कहानी है क्या?

शंकर :  लेखक अपने परिवेश  में जो जीवन जीता है, समाज के भीतर रहकर  जो अनुभव  हासिल करता है, उस अनुभव की संवेदनात्मक अभिव्यक्ति है कहानी । इसमें प्रसंग भी होंगे, स्थितियां भी होंगी, पात्र भी होंगे, घटनाएं भी होंगी। उनके बीच से उसकी जो संवेदना निकलेगी, वह कहानी बनेगी।

सत्येंद्र : कहानीकार को अपनी बात प्रभावी ढंग से कहने के लिए क्या करना चाहिए?

शंकर :  लेखक अपने आसपास की चीज़ों से जितनी गहराई के साथ जुड़ेगा, उतनी ही गहरी उसकी संवेदना होगी और जब उसकी संवेदना गहरी होगी तो कहानी भी उतनी ही गहरे रूप में संवेदनात्मक होगी। तब पाठक भी कहानी के साथ उतनी ही गहराई से जुड़ जाएगा। अगर लेखक गहराई से नहीं जुड़ेगा तो यह जुड़ाव कहानी में भी नहीं आएगा। इसलिए संवेदना की  तीव्रता, उसका घनत्व कहानी के सफल होने के लिए सबसे बड़ी शर्त है ।

हरियश राय : शंकर जी, ये बताइए, एक आम पाठक के लिए कहानी की संवेदना से क्या आशय है? कहानी में संवेदना के बारे में अलग-अलग बातें की गई हैं। भावनात्मक  रूप में चीज़ें किस रूप में रहती हैं और संवेदनात्मक स्तर पर चीजें किस रूप में चली जाती हैं?

शंकर :  इसका बहुत अच्छा विश्लेषण राजेंद्र कुमार जी ने अपनी किताब में किया है। मुझे लगता है कि हिन्दी में सबसे अच्छी व्याख्या वहीं उपलब्ध है। उन्होंने कहा है कि जब भावना और विचार इंटरैक्ट करते हैं, जब दोनों की अंतरक्रिया होती है, जो चीज़ पैदा होती है, वह संवेदना है। न यह सिर्फ़ विचार है, न ही सिर्फ़ भावना। दोनों का एक संयुक्त प्रभाव  है।

सत्येंद्र : तो आप जिस अंतरक्रिया की बात कह रहे हैं, क्या वहां शिल्प की भूमिका भी महत्वपूर्ण होती है?

शंकर :  नहीं, शिल्प की यहां कोई भूमिका नहीं है। अनुभव से कोई कहानी लेखक की सोच में आकार लेती है।  जब वह उसको व्यक्त करने की प्रक्रिया में आता है तो शिल्प की बात वहां उठती है। उसके मानस में जब कहानी बनती है तो वहां सिर्फ़ संवेदना की ज़रूरत है। संवेदना में लेखक का विचार भी शामिल है। लेखक जब  कहानी को व्यक्त करने चलेगा, तब यह सवाल उठेगा कि वह उसे किस तरह से व्यक्त करता है। शिल्प यहां पर मायने रखता है। दूसरे स्टेज पर शिल्प की बात आती है।

सत्येंद्र : कहानी में कथ्य, शिल्प और भाषा—ये तीन चीजें होती हैं। कथ्य और शिल्प को लेकर विवाद भी चलते रहते हैं। कुछ कथ्य पर जोर देते हैं तो कुछ का कहना है कि कहानी में शिल्प बहुत जरूरी है। इस बारे में आप क्या सोचते हैं?

शंकर :  कथ्य की जगह हम कथानक कहें। कहानी का ढांचा बना प्रसंगों, स्थितियों और घटनाओं से । पात्र भी उसमें होंगे। कथानक के निर्माण में लेखक के दिमाग में यह जरूर उठता है कि आखिर जब वह लिखेगा तो कहेगा क्या? यह कथ्य हुआ। कथ्य को वह जिस तरीके से कहेगा, वहां भाषा की ज़रूरत होगी और अभिव्यक्ति का जो रूपाकार गढ़ेगा, वहां शिल्प की ज़रूरत पड़ेगी। तो ये बाद के स्टेज की  चीजें हैं लेकिन इसके लिए अलग से कुछ करने की ज़रूरत नहीं पड़ती। कोई न तो सोच कर भाषा बनाएगा, न ही शिल्प तय करेगा। कथानक जिस तरह का होगा, स्वाभाविक तौर पर उसके मन में शिल्प आ जाएगा। वह तय कर लेगा कि उसे किस तरह इसे कहना है। अगर कथाकार कलात्मक रूप से बहुत सजग है और सपाट तरीके से अपनी बात नहीं कहना चाहता है तो वह पहले से ही एक शिल्प की  तैयारी करेगा कि उसे एक ख़ास तरीके से अपनी बात कहनी है। रही बात भाषा की, तो भाषा बनाई नहीं जा सकती। लेखक का जो व्यक्तित्व होता है, जिस तरह से वह सोचता-विचारता है, जो उसका अंतरमन होता है, भाषा उसी से रूप ग्रहण कर लेती है। वह अलग से बनाने से नहीं बनेगी।

सत्येंद्र : मतलब एक कथाकार के पास इस बात की गुंजाइश हमेशा है कि वह भविष्य में खुद को शिल्प के  मामले में समृद्ध कर सके?

शंकर :  केवल शिल्प के बेहतर हो जाने से कोई बड़ा कथाकार नहीं हो सकता। हिन्दी में यह बहुत पुरानी बहस है। कहानी अंतर्वस्तु और शिल्प की अन्विति है, दोनों की मौजूदगी वहां होगी। अगर अंतर्वस्तु नहीं हो तो शिल्प बेमानी हो जाएगा। अंतर्वस्तु के संप्रेषण के लिए ही शिल्प की ज़रूरत होती है। सिर्फ़ अंतर्वस्तु काम कर सकता है। हालांकि मैं ये नहीं मानता लेकिन बहुत लोग कहते हैं कि ‘प्रेमचंद ने शिल्प पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। वो अपनी अंतर्वस्तु के लिए जाने जाते हैं। उन्होंने जो कहा, वह बहुत कम लेखक कह पाए उस दौर में भी और आज भी। तो उनकी विशिष्टता कथ्य में है, अन्तर्वस्तु में है।’ लेकिन यह भी एक भ्रम  ही है कि प्रेमचन्द ने शिल्प पर ध्यान नहीं दिया या उनकी कहानी में शिल्प नहीं है क्योंकि घटनाओं, स्थितियों, प्रसंगों की जो अन्विति ,संगति और लय होती है , वह एक बहुत बड़ा शिल्प है। इससे बड़ा शिल्प कुछ नहीं है। ये बुनियादी शिल्प है। अगर आप घटनाओं, प्रसंगों, स्थितियों की संगति और लय को बेहतर तरीके से रख सकते हैं तो वह खुद एक शिल्प है। उसके बाद आप भाषा विन्यास, शिल्प की अलग से कोशिश करें। अगर आप उसे रूपकों के सहारे कहें, प्रतीकों के सहारे कहें। जैसे उदयप्रकाश जी ने हाल के दिनों में छोटी-छोटी बातों को भी एक बड़े प्रसंगों तक फैला कर कहने की कोशिश की। ये अतिरिक्त कोशिशें हो सकती हैं  लेकिन अगर अंतर्वस्तु नहीं हो तो सिर्फ़ शिल्प से कहानी नहीं बन सकती। बाद के दौर में नई पीढ़ी के बहुत सारे लेखकों ने उदयप्रकाश का अनुकरण करने की कोशिश की लेकिन उनमें उदयप्रकाश जैसा सामर्थ्य नहीं था। उन्होंने बातों को बड़े दायरे में फैला कर कहने के शिल्प पक्ष को तो लिया लेकिन उनके पास अंतर्वस्तु की वह समझ नहीं है जो उदयप्रकाश के पास है।  उदयप्रकाश जितने मज़बूत अंतर्वस्तु के स्तर पर हैं, वो उतने मज़बूत नहीं हैं। वो ये समझते हैं कि शिल्प से ही कोई बड़ा हो जाएगा। इसलिए यह फांक आज के बहुत कहानीकारों में दिखाई पड़ती है। लेकिन अंतर्वस्तु बड़ी चीज़ है। उसमें शिल्प हो तो प्रभाव दुगुना हो जाएगा। अगर अंतर्वस्तु नहीं हो और लेखक सिर्फ शिल्प पर जोर देगा तो कुछ नहीं बनेगा।

हरियश राय : इधर कहानियों में अंतर्वस्तु के बहुत सारे नए नए प्रयोग हो रहे हैं। अधिकांश कथाकारों ने शिल्प को छोड़ दिया है। उनका मुख्य मकसद है अपनी बात को कहना, ज़्यादा प्रामाणिक तरीके से कहना, ज़्यादा असरदार तरीके से कहना। शिल्प के दबाव का आग्रह उतना नहीं है, जितना निर्मल वर्मा या बाद के कुछ कहानीकारों में हुआ करता था।

शंकर :  यह एक अच्छी प्रवृत्ति है कि लेखक अंतर्वस्तु पर केंद्रित हो और उसमें प्रयोग करे, बजाय कि शिल्प के क्षेत्र में प्रयोग करे। शिल्प पर ज़्यादा ध्यान वही देते हैं, जिनके पास मज़बूत अंतर्वस्तु नहीं होती। अगर मज़बूत अंतर्वस्तु हो तो आपको शिल्प की ज़रूरत नहीं है। कहानी अगर आप बहुत सीधे सपाट तरीके से रख दें  और घटनाओं, प्रसंगों, स्थितियों में अन्विति और लय हो तो उससे बड़ा शिल्प कुछ नहीं है। कहानी पाठक के दिल को सीधे छूएगी। आप शिल्प की क़वायद करके पाठक के दिल तक बात नहीं पहुंचा पाएंगे।

हरियश राय : बहुत से कथाकारों ने, जिनमें कुछ कवि भी हैं, कविता की नक़ल करते हुए कहानी में प्रयोग किया। कहानी की भाषा को कवितामय बनाने की कोशिश की। शायद इनके पीछे शिल्प का ही दबाव था?

शंकर :  शुरू के छायावादी दौर में, जब बहुत सारे कवि कहानियां भी लिखते थे, तो ये बहुत स्वाभाविक तौर पर होता था। जयशंकर प्रसाद कविता भी लिखते थे, कहानी भी लिखते थे। वो कोशिश नहीं करते थे लेकिन कहानियां लिखते थे तो उसमें कविता आती थी। जो रचनाकार कवि रहा है,  वो जब कहानियां लिखेगा तो उसमें कविता का थोड़ा सा असर रहेगा ही लेकिन अगर किसी कहानीकार ने कविताएं नहीं लिखी हों  और अगर वह भाषा  में कविता लाने की कोशिश कर रहा है तो वह बहुत सफल नहीं होगा, फांक दिखाई पड़ेगी।

हरियश राय : अब जैसे कुमार अम्बुज, उनकी कविता पढ़ें या कहानी, मुझे बहुत ज़्यादा फ़र्क नहीं लगता। पूरी तरह लगता है कि कथा में कविता की बात कह रहे हैं। उसमें कोई छोटी-मोटी घटना डाल देते हैं, जिससे कि कहानी लगे, कहानी  की प्रतीती हो लेकिन मैं इस तरह की कहानियों को कहानी नहीं मानता। वहां शिल्प का बहुत ज़्यादा दबाव रहता है।

शंकर : उदयप्रकाश ने भी शुरू में ऐसी कहानियां ही लिखी थी। टेपचू, तिरिछ तक आते-आते उनको यह एहसास हो गया कि अंतर्वस्तु का पक्ष शायद छूट रहा है और पहली बार वो ‘छप्पन तोले की करधन’ में अंतर्वस्तु को बहुत मज़बूती से लाते हुए दिखाई पड़े। यह कहानी ‘पहल’ में छपी थी। इस कहानी में उन्होंने  शिल्प और अन्तर्वस्तु की अद्भुत अन्विति दिखाई है। उनकी बहुत सारी कहानियों की चर्चा होती है, लेकिन मुझे अब भी उनकी यह बहुत अच्छी कहानी लगती है।

सत्येंद्र : यानि हम कह सकते हैं कि शिल्प साधन है, साध्य नहीं। इसे लेकर नए रचनाकारों को भयभीत होने की ज़रूरत नहीं?

शंकर :  बिल्कुल नहीं। शिल्प का आतंक अभी के दौर में फैला है क्योंकि यह बाज़ार का भी दौर है। चीज़ों को चमक-दमक के साथ पेश करने की संस्कृति है। बाज़ार-संस्कृति चीज़ों को चमक दमक के साथ नए पैक में पेश करती है। ख़राब चीज़ें नए पैक में लाई जाती है।  बाज़ार की संस्कृति में दिखने की भी कोशिश होती है, चकाचौंध होती है। लेखक बाज़ार से प्रेरणा नहीं लेता है लेकिन बाज़ार जो संस्कृति बनाती है, उसका कुछ लेखकों पर प्रत्यक्ष  या अप्रत्यक्ष दबाव पड़ता है और ये रचना में भी दिखाई पड़ता है। शिल्प पर ज़्यादा चर्चा इसीका नतीजा है। कई लोग तो यह भी कह रहे हैं कि कहानी में अंतर्वस्तु की ज़रूरत ही नहीं।

हरियश राय : बड़ी घातक प्रवृत्ति है यह तो। कहानी का मूल संबंध ही यथार्थ से है।

शंकर :  घातक नहीं, ये कहानी विरोधी प्रवृत्ति है। कहानी ख़त्म कर आप किसी भी चीज़ को कहानी कहना चाहते हैं। कहानी है ही नहीं और आप उसको कहानी बनाकर कहना चाहते हैं। कहानी मूल रूप से वाचिक परंपरा में आई है। दादी और नानी कहानियां कहती थीं और लोग सुनते थे। उस समय मुद्रण का आविष्कार नहीं हुआ था। बाद  में मुद्रण का आविष्कार हुआ, चीज़ें छपने लगी। तब कहानी पढ़ने की चीज़ बनी। शुरू से ही कहानी में हमेशा ही कंटेंट रहा है। दादी-नानी कहानियां कहती थीं कि राजकुमार छोटे रास्ते से गया तो राक्षस मिल गया। ये संदेश था कि शॉर्ट कट में खतरा है। इससे बेहतर है लंबा रास्ता पकड़ा जाय। तो वाचिक परंपरा की कहानियों की अंतर्वस्तु बहुत समृद्ध हुआ करतीं थीं। इसलिए कहानी की जो मूल प्रकृति है, उसीमें परिष्कार हो तो ज़्यादा बेहतर है। उसे हटा कर, कहानी पर ऊपर से नई-नई चीज़ आरोपित करेंगे तो वो कहानी नहीं बनेगी। कहानी ख़त्म करके  कुछ और बनाना चाहते हैं तो बना दीजिए लेकिन कहानी नहीं बना पाइएगा। कहानी बनाने के लिए आपको अंतर्वस्तु रखनी होगी, कथ्य होगा, कथानक होगा। उसके बाद आपको जो करना है करते रहिए।

सत्येंद्र : आप ‘परिकथाके संपादक हैं। आप बहुत सारी कहानियों से गुजरते हैं। आज जो कहानियां लिखी जा रही हैं, उससे आप संतुष्ट हैं?

शंकर :  आज की कहानी और पहले की कहानियों में थोड़ा फ़र्क़ तो है। पिछली शताब्दी, ख़ासकर 90  के पहले या शताब्दी गुजरने तक भी कहिए, जिन लोगों ने कहानियां लिखी और उस दौर में जो कहानीकार उभरे, वे दूसरे मिजाज के थे। उनको यह पता था कि कहानी समय और समाज का ही एक रूप है, समय और समाज ही इसमें दिखता है। इसके अलावा कहानी में कोई दूसरी चीज़ ज़्यादा महत्वपूर्ण नहीं है। लेकिन नई शताब्दी में एक प्रवृत्ति चली है और कुछ लोग इसको इक्कसीवी शताब्दी की कहानी कह रहे हैं। सवाल उठता है कि इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी किस मायने में अलग है। और पहले की कहानी की तुलना में इसमें क्या खूबी और नई चीज़ है? अभी की कहानियों में है कि लेखक दिखने के लिए, लोगों की नज़र में आने के लिए कुछ लिखा जाय। बहुत सारे लेखकों को इसकी समझ ही नहीं है कि लिखना क्या है। बहुत सारे लेखक ऐसे हैं, जिनका कहानी की परंपरा से कोई वास्ता नहीं है। कोई अच्छा कहानीकार तभी बन सकता है, अगर उसे प्रेमचन्द से लेकर शताब्दी गुजरने तक के पूरे कालखंड की कहानियों की समझ होगी। जिसको इसकी समझ होगी, वही इसको विस्तार देगा। वही अच्छी कहानियां लिखेगा। उसकी समझ से कटकर आप नई चीज़ नहीं ला सकते। हाल फिलहाल की कहानियों में यह प्रवृत्ति दिख रही है, हालांकि इस बीच कुछ अच्छी कहानियां भी आ रही हैं। यह बहुत सुखद पहलू है कि इन तमाम चीजों के बावजूद अच्छी कहानियां भी लिखी जा रही हैं।

सत्येंद्र : समाज अभी जिस कठिन दौर से गुजर रहा है, ऐसे में कहानीकार क्या ज़रूरी मुद्दों को प्रभावी ढंग से उठा रहे हैं? जैसा कि आपने थोड़ी देर पहले प्रेमचन्द के बारे में कहा। इस संदर्भ में आज के कथाकार अपनी भूमिका के निर्वहन में कहां तक सफल हैं?

शंकर : इसे समझने के लिए यह जानना ज़रूरी है कि आप क्या सोच कर लिख रहे हैं। प्रेमचन्द यह सोचकर नहीं लिख  रहे थे कि दुनिया एक दिन उनको बड़ा कहानीकार मानेगी। वो तो तकलीफ़ों में लिख रहे थे। ब्रिटिश सम्राज्य था, उसमें नौकरी पर भी खतरा था, पाबंदियां भी लगती थीं। एक लंबे दौर तक बहुत सारे लेखकों के सामने यह प्रश्न ही नहीं था कि लेखक की तरह दिखने के लिए लिखना है। आप गहराई से अपने समय और समाज के बारे में सोच रहे हैं, उससे जुड़ना चाहते हैं, अपनी सामाजिक भूमिका  महसूस कर रहे हैं, तभी तो आप गंभीर कहानियां लिखिएगा। यह बोध नहीं होगा तो आपसे अच्छी कहानी की उम्मीद कैसे की जाएगी। अभी जो लोग लिख रहे हैं, इसमें समय और समाज को अच्छी तरह से समझने वालों की तादाद कम हो गई है। जब बाढ़ आती है तो बहुत तरह की चीज़ें उसमें चली आती है। रचनाकर्म की बाढ़ भी है एक किस्म से, बहुत सारी गैर जरूरी और अवान्तर चीज़ें भी तैर रही हैं पानी पर और उसीमें अच्छी चीज़ें  भी मौजूद हैं।

सत्येंद्र : तो क्या आपको लगता है कि इससे भविष्य में हिन्दी कहानी को नुकसान भी हो सकता है?

शंकर :  देखिए, अगंभीर लेखन हमेशा निन्दनीय है। यह संपादक, आलोचक और सचेत लेखकों का काम है कि ऐसे लेखन को प्रमोट न करें। ऐसी चीज़ों को भरसक हतोत्साहित करें। उस रचनाकार को बताएं कि रचना कर्म क्या है, अच्छी कहानी क्या है। उसकी समझ विकसित करें। किसी भी तरह के लेखन पर रचनाकार की पीठ ठोंकी जाएगी तो ग़लत कहानियां ही सामने आएंगी।

सत्येंद्र : इसी से जुड़ा एक सवाल। आपने कहा कि समय और समाज की समझ होनी चाहिए। क्या इसकी कमी की वजह से ही हिन्दी कहानी में आज कोई आन्दोलन नहीं दिखता?

शंकर :  आन्दोलन नहीं है, यह कहना तो शायद बहुत उचित नहीं होगा। आन्दोलन कभी तो बहुत मुखर रूप में होता है। उसको कुछ लोग चला रहे होते हैं, कोई संगठन, लेखक, पत्रिकाएं मुखर तौर पर उसका उद्घोष कर रही होती हैं या उसका दावा कर रही होती हैं। उस दौर के आलोचक भी उस आन्दोलन को उछाल रहे होते हैं। तो यह एक तरह का आंदोलन होता है। एक दूसरी तरह का आंदोलन तब होता है जब यह सब नहीं हो रहा होता। रचना की भी एक धारा होती है। वह चल रही होती है और वह आन्दोलन से कम नहीं। आज भी इसको इसी तरीके से देखे। अगर सौ कहानीकारों में से दस भी समय और समाज को समझ रहे हैं और अच्छी कहानियां लिख रहे हैं  तो यह भी एक आन्दोलन है। वो नब्बे लोग जो लिख रहे हैं, लिखते रहें। दस लोग जो लिख रहे हैं, वही समाज के काम आएंगे और वह खुद एक आन्दोलन है। भले ही वह उस तरह मुखर न दिख रहा हो, जिस तरह पत्रिकाएं उछाला करती थीं, जिस तरह लेखक संगठन उछाला करते हैं। आन्दोलन इस रूप में भी चलता है। वो आन्दोलन तो चल रहा है।

सत्येंद्र : हिन्दी कहानी की आलोचना की बात करें तो आज उसकी क्या स्थिति है?

शंकर :  कथा आलोचना में हमेशा से मुश्किल रही है। आलोचना को लेकर हमेशा सवाल उठते रहे हैं। डॉ सुरेंद्र चौधरी, एक ऐसे अकेले आलोचक हैं, जिन्होंने आलोचक होते हुए भी इस सवाल को बार बार उठाया। वो दो बातें कहा करते थे, अपने अनुभव से हम उसमें तीसरी बात भी जोड़ सकते हैं। एक बात वो कहते थे कि आलोचकों की दिक्कत ये है कि उन्होंने अपने अपने नायक चुन लिए हैं। उन्होंने तय कर रखा है कि हम किसकी चर्चा करेंगे और किसकी चर्चा नहीं करेंगे। उनके दिमाग में बना हुआ है। हमेशा उसी लेखक की कोई कहानी ढूंढेंगे और सारी अच्छाई उसीमें बता देंगे। उसके समानान्तर कोई दूसरा अच्छा भी लिख रहा हो तो वो उनकी नज़र में  नहीं आएगा। इसको उन्होंने अपने एक लेख में चयनवाद कहा था। दूसरी चीज़ उन्होंने कहा था अनुवर्ती आलोचना। मतलब यह कि कोई  बड़ा आलोचक या बड़ी पत्रिका का संपादक किसी का नाम उछाल दे, किसी कहानी की चर्चा कर दे और बाकी आलोचक उसीको दोहराने लग जायें, बिना विवेकपूर्ण तरीके से यह जांचे कि इस कहानी की चर्चा की जाय या नहीं। ‘सारिका’ के बन्द होने के बाद  हिन्दी में ‘हंस’ का दौर था। ‘हंस’ एक लंबे समय तक हिन्दी की एक महत्वपूर्ण पत्रिका रही है, बहुत सारे कहानीकार आए हैं,  बहुत सारे विमर्श आए हैं, लेकिन ‘सारिका’ के दौर में भी (कह सकते हैं कि उससे पहले ज्यादा नहीं दिखता है) और ‘हंस’ के दौर में कुछ कमज़ोर रचनाकारों को भी उछाला गया। उनकी कमज़ोर कहानियों को भी उछाला गया। आसमान में जब आप कोई पटाखा उछाल देंगे, तो कुछ देर तक उसकी चमक तो दिखाई पड़ेगी ही। ये दो तरह की चीजे डॉ सुरेंद्र चौधरी ने कही है। एक तीसरी चीज़ हमलोगों ने लगातार महसूस किया है। आलोचक भी नहीं पढ़ रहे हैं। कहानी के समूचे परिदृश्य को ध्यान में रखकर रचनाकार और कहानियों का चुनाव हो, तब तो संपूर्ण आलोचना या कह सकते हैं कि अपने समय की आलोचना खड़ी होगी। नहीं पढ़ने की समस्या बहुत सारे आलोचकों के साथ है। थोड़ा सा पढ़ रहे हैं, उसी में सारी चर्चा हो रही है। जो रचनाएं पढ़वाई जा रही हैं, या जो वो पढ़ रहे हैं, उसीकी चर्चा कर रहे हैं। आप जिसको पसन्द करते हैं, उसको पढ़ रहे हैं। जिसको नहीं चाहते हैं, उसको पढ़ ही नहीं रहे हैं। पढ़िएगा  तभी तो पता चलेगा कि अच्छी है कि  बुरी है। पढ़िएगा ही नहीं तो पता कैसे चलेगा। इस प्रक्रिया में हो ये रहा है  कि कुछ चीज़ें तो उछल रही हैं, उसमें कुछ चीजें तो अच्छी हैं लेकिन दूसरा पक्ष ये है कि बहुत सारी अच्छी चीज़ें छूट जा रही हैं। इसकी चर्चा तो हिन्दी में लगातार कई लोग कर रहे हैं। ‘परिकथा’ में तो एक स्तम्भ ही चलता है ‘कथाभूमि’ नाम से। जिस कहानी को अपने समय में बहुत चर्चित होनी चाहिए थी लेकिन नहीं हुई,  उसे हमलोग  दोबारा पेश करते हैं। हिन्दी  में ऐसी बहुत सारी कहानियां हैं, जिन्हें चर्चित होनी चाहिए थी लेकिन नहीं हुईं।

हरियश राय : कथा आलोचना की इस  स्थिति से कई महत्वपूर्ण कथाकार प्रकाश में आने से वंचित रह गए? इसके लिए ज़िम्मेदार क्या सिर्फ़ कथा आलोचक ही हैं  या कोई और भी?

शंकर :  कथा आलोचक पाठकों के लिए एक निदेशक की तरह होता है। वह जिन कहानियों को बताता है, पाठक उन्हें पढ़ते हैं लेकिन उसकी उसकी बताई गई कहानियों को ही पाठक पढ़ेंगे, ऐसा भी नहीं है। पाठक अपने विवेक से भी बहुत कुछ पढ़ता है। ऐसे बहुत उदाहरण हैं कि बहुत लेखकों की कहानियों की चर्चा आलोचकों ने नहीं की लेकिन उनकी कहानियां धीरे धीरे महत्वपूर्ण मानी गईं। उसमें समय लगा लेकिन धीरे धीरे वह  महत्वपूर्ण हुईं। ये कहानियां अगर अपने समय में आलोचकों द्वारा पहचानी गईं होतीं तो तभी स्थापित हो गईं होतीं लेकिन ऐसा नहीं हुआ और एक लंबा समय लगा उनको वापस आने में।

हरियश राय : लेकिन इसका खामिजाया तो कथाकार को भुगतना पड़ा?

शंकर :  ये खामियाजा केवल कथाकार का नहीं है, ये खामियाजा साहित्य का भी है। साहित्य ने भी भुगता, पाठक वर्ग ने भी भुगता और समाज ने भी भुगता। ये अकेले कथाकार का नुकसान नहीं है।

 

हरियश राय : मौजूदा समय में जो कथा आलोचना है, उसको लेकर आपकी क्या राय बनती है? एक बार मेरा कहानी-पाठ हो रहा था तो वहां मौजूद कॉलेज के छात्रों ने अपने प्राध्यापकों  को कठघरे में खड़ा कर दिया कि आज के समय में जो कहानीकार बेहतरीन कहानियां लिख रहे हैं, उनके बारे में क्लास में आपलोग क्यों नहीं बताते। तो क्या इसके लिए प्राध्यापक भी जिम्मेदार हैं?

शंकर :  नहीं, आप प्राध्यापकों से ये उम्मीद नहीं कर सकते.

हरियश राय : लेकिन छात्रों को तो वही दिशा निर्देश करते हैं न कि आप ये कहानी पढ़ो

शंकर :  वो प्राध्यापक पढ़ेंगे तब तो? प्राध्यापक वही पढ़ते हैं, जो क्लास में उन्हें पढ़ाना होता है।

हरियश राय : एमफिल के स्तर पर बात करें तो प्राध्यापकों को भी नहीं पता  कि समकालीन कहानी पर किस नए कहानीकार की कहानी को विषय के रूप में छात्रों को दें? घूमफिरकर वही 10-15 नाम उनके सामने रहते हैं।

शंकर :  इसको इस ढंग से समझने की ज़रूरत है कि कहानी में गहरी रुचि लेने वाले और उसको गहरे तौर पर पढ़ने वाले सारे प्राध्यापक नहीं हो सकते हैं लेकिन कुछ प्राध्यापक होंगे, सारे शोधार्थी नहीं हो सकते लेकिन कुछ शोधार्थी होंगे, सारे छात्र नहीं हो सकते लेकिन कुछ छात्र होंगे। अच्छी कहानियां हमेशा उन लोगों द्वारा पहचानी जाती हैं। स्वीकार की जाती हैं। ये जो प्राध्यापकों, शोधार्थियों और छात्रों के बीच थोड़े से लोग हैं, जो कहानियों की पहचान करते हैं, सच पूछिए तो कहानी की धारा को जिन्दा रखे हुए हैं। अच्छी कहानियों को अंधेरे में भटक कर गुम होने से यही बचाते हैं। लेखकों में भी सारे लोग नहीं पढ़ते हैं। जो पढ़ते हैं, वही कहानियों को बचा रहे हैं। कहानियां पढ़ी नहीं जा रही हैं, कहानियां पढ़ी जाएंगी तभी तो उनकी चर्चा होगी। तो कहानियों का पढ़ा जाना भी एक बहुत बड़ा मुद्दा है। मेरी तो राय है कि जो आलोचक ज़्यादा नहीं पढ़ता उसे आलोचक कहलाने का अधिकार नहीं है और उसको जो सम्मान मिलता है, वो व्यर्थ है। आलोचक से अपेक्षित है कि वह पढ़े।

हरियश राय : यह भी कहा जाता है कि कथा आलोचना या हिन्दी आलोचना अध्यापकों तक ही सिमट कर रह गई है।

शंकर : ये तो बहुत सही नहीं है लेकिन इसका एक पक्ष सही है कि आलोचना कर्म सामान्यत: प्राध्यापक ही करते हैं लेकिन लेखक भी करते हैं आलोचना। बहुत सारे कहानीकार भी आलोचक बने हैं। बहुत सारे कवि भी आलोचना करते हैं। ये रुचि की बात है। बहुत सारे लेखक हैं, जो लिखकर  मुक्त हो गए। दूसरों का लिखा नहीं पढ़ते। आत्ममुग्ध होते हैं, अपना लिखा, अपना पढ़ा खुश हैं। मैं ऐसे बहुत सारे कथा लेखकों को जानता हूं कि  जो जितना लिखते हैं, उससे ज्यादा पढ़ते हैं। जो लोग कहानियां पढ़ रहे हैं, वही कहानियों को बचा रहे हैं। कहानियां उन्हीं से बची हुई हैं,नहीं तो कहानियां गुम हो जाएंगी।

सत्येंद्र : आखिर पाठक तक पहुंचने के लिए लेखक को आलोचक की ज़रूरत क्यों? लेखक खुद अपना पाठक क्यों नहीं बना पा रहा?

शंकर :  इसमें लेखक का दोष वैसा नहीं है। अगर थोड़ा सा है तो लेखक का दोष यह हो सकता है कि वह समय और समाज की कहानियां नहीं लिख रहा है। समय और समाज की कहानियां लिखेगा तो उसे पाठक ज़रूर मिलेंगे। अगर वह अपनी कहानियों में समय और समाज को दर्ज नहीं करेगा और यह उम्मीद करेगा कि उसको पाठक मिले तो यह तो मुश्किल सी चीज़ है। लेखक अगर समय और समाज के बारे में नहीं लिखता है तो वह पाठकों की उम्मीद ना करे। दूसरा पक्ष यह है कि हाल फिलहाल में ऐसे बहुत सारे कारक आ गए हैं, जो पढ़ने की संस्कृति को प्रभावित कर रहे हैं। सामाजिक जीवन में बहुत सारी चीज़ें ऐसी आ गई हैं जो लोगों को पढ़ने का समय नहीं दे रही हैं। बाज़ार संस्कृति ने लोगों के टेस्ट और टेम्परामेंट में परिवर्तन ला दिया है। लोग दूसरे-दूसरे काम ज़्यादा ज़रूरी समझ रहे हैं। एक दौर था, जब इलेक्ट्रानिक मीडिया नहीं था तो बहुत दूसरी चीज़ें भी नहीं आईं थीं। एक ज़माने में तो क्रिकेट को कस्बों में कोई जानता ही नहीं था। कोई कोई रेडियो पर कमेंट्री वमेंट्री सुनते थे। अब आज अगर क्रिकेट मैच हो तो एक हफ्ता पहले लोग जान जाएंगे और समय पर बैठ जाएंगे टीवी के सामने या कोई फिल्मी पुरस्कार का प्रोग्राम हो। हल्की फुल्की चीज़ें ज़्यादा चलन में आईं हैं।

सत्येंद्र : सोशल मीडिया की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण है.

शंकर : सोशल मीडिया की तो कुछ अच्छी भूमिका भी है, कुछ बुरी भी। पाठक कम हुए हैं, खत्म नहीं हुए हैं।  इसका एक अच्छा पक्ष यह भी है कि कुछ पाठक कम हुए हैं तो नए पाठक जुड़े भी हैं। तो पाठक कम हो रहे हैं, यह बहुत अन्तिम धारणा नहीं है। इसमें परिवर्तन ज़रूर आया है। अगर पाठक  कहानियां नहीं पढ़ रहा है तो इसमें लेखक की भूमिका इतनी है कि वह ऐसी कहानियां लिखकर पाठक को बचाए, जो समय और समाज के बारे में हो। बाकी बाहरी कारण अगर पाठक को हटाते हैं कहानियों से तो उस पर तो लेखक कुछ नहीं कर पाएगा।

सत्येंद्र : आपके लेखन की बात करें। आप ‘परिकथा’ का संपादन कर रहे हैं तो आपके संपादक ने आपके कहानीकार को नुकसान पहुंचाया या समृद्ध किया?

शंकर : नुकसान नहीं पहुंचाया। यह ज़रूर हुआ कि मेरे जीवन के 24 घंटे में से बहुत सारा समय ये लेता है। अगर समय नहीं दिया जाएगा तो यह काम हो नहीं पाएगा। लेखन को तो आप स्थगित कर सकते हैं लेकिन नियमित रूप से पत्रिका निकालनी है तो उसके काम को स्थगित नहीं कर सकते। तो प्राथमिकता में वही है लेकिन यह नुकसान नहीं कहेंगे। इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि यह हमेशा आपको सोच, संवेदना और चेतना के स्तर पर जीवित रखता है, एक्टिव रखता है। अपनी रचना लिखते हैं तो अपने अनुभवों से गुजरते हैं। आप संपादक हैं, दूसरों की रचना पढ़ते हैं तो दूसरों के अनुभवों से गुजरते हैं। बराबर की सहभागिता उसमें होती है। आज जब कोई कहानी पढ़ रहे होते हैं तो लेखक जिन अनुभवों से गुजरा होता है, संपादक को भी उन अनुभवों से गुजरना होता है। नहीं गुजरेगा तो उस रचना की परख नहीं कर पाएगा। तो प्रक्रिया दोनों तरफ है। अपनी रचना हम लिखते हैं, तो अपने अनुभवों से गुजरते हैं। पत्रिका के लिए रचना चुनते हैं तो लेखक के अनुभव से गुजरते हैं। अनुभवों के बीच से गुजरना तो मेरा दोनों हालत में जारी रहता है। फिर यह नुकसान नहीं, मेरी चेतना और संवेदनशीलता को समृद्ध करने का काम करता है। समय थोड़ा सा लेता है तो वह थोड़ा सा नुकसान है लेकिन जब दोनों को जोड़ेंगे तो वह नुकसान नहीं कहा जाएगा।

सत्येंद्र : तो कहानीकार शंकर कहानियां लिख रहे हैं इन दिनों?

शंकर : कहानियां तो हमने लिखीं हैं। मैंने ज़्यादा कभी नहीं लिखा। मैंने कभी साल में दो से ज़्यादा कहानियां नहीं लिखी। इसलिए मेरी कहानियों की संख्या कम है। पत्रिका समय मांगती है तो इसको देने के बाद जो समय बचता है, उसीमें लिखता हूं। लेकिन लिखने और पढ़ने में जब किसी द्वन्द्व की स्थिति आती है तो मैं पढ़ने को चुन लेता हूं। मेरा पढ़ना लगातार जारी रहता है, लिखना उसके बीच बीच में जारी रहता है। कम हो सकता है लेकिन लिखता तो हूं। अभी मैंने दो कहानियां लिखी हैं और तीसरी को जारी रखे हुए हूं।

सत्येंद्र : उपन्यास लिखने की भी कोई योजना है आपकी?

शंकर : नहीं। दो-दो उपन्यास के आइडिया आए थे। एक तो आज भी लिखना चाहता हूं। उस उपन्यास की कथा के दो हिस्से हैं। एक हिस्सा के बारे में तो अच्छा-खासा अनुभव है। दूसरे हिस्से का जो पात्र है, वह दूसरी जगह चला गया। उसके हिस्से का अनुभव मेरे पास नहीं है। अब या तो उसको गढ़े या फिर पूछताछ करके उसका विवरण जुटाएं। वह उपन्यास मेरी सोच को हॉन्ट करता है। एक उपन्यास और मैंने सोचा था लेकिन उसको बाद में मैंने स्थगित कर दिया। मुझे लगा कि वह विषय ठीक नहीं है। उसका ढांचा बन चुका था लेकिन फिर वह मुझे अच्छा नहीं लगा।

सत्येंद्र : उपन्यास की बात आई तो एक और सवाल। आज जो उपन्यास लिखे जा रहे हैं, उसके बारे में आपकी क्या राय है?

शंकर : उपन्यास पर वही राय है। ज़्यादा लिखा जा रहा है, थोड़ा सा काम का है। जो कहानी के साथ है, वही उपन्यास के साथ है। अच्छी कहानियां भी लिखी जा रही हैं, बुरी कहानियां भी लिखी जा रही हैं। अच्छे उपन्यास भी लिखे जा रहे हैं, बुरे उपन्यास भी लिखे जा रहे हैं। अब चुनते समय, मिसकांस्पेशन में कोई बुरा उपन्यास अच्छा समझ कर चुन लिया तो समय की बर्बादी हो गई। कहीं से सूचना पाकर  या स्वंय आपने किसी को अच्छा उपन्यास माना और अगर वह उपन्यास अच्छा निकल गया तो आप प्रसन्न हुए कि मैंने एक अच्छा उपन्यास पढ़ा।

सत्येंद्र : एक संपादक के रूप में इस बात के लिए आपकी ख्याति है कि आप नए लोगों को खूब मौका देते हैं। आमतौर पर जो बाकी स्थापित पत्रिकाएं हैं, वहां नए लोगों को मौका तुलनात्मक ढंग से कम मिलता है। वहां या तो बड़े लेखक छपते हैं या परिचित। तो आपने ऐसा क्यों सोचा कि नए लेखन को मौका दिया जाना चाहिए?

शंकर : जब आप संपादन शुरू करते हैं तो आपके पास संपादन का एक कॉन्सेप्ट होना चाहिए। ऐसा भी हुआ है कि जिनको संपादन का कोई कॉन्सेप्ट नहीं, वो भी संपादन में  कूद गए। एक हुआ कि सोच समझकर संपादन में आए। चूंकि मैं शुरू से लघुपत्रिका आंदोलन से जुड़ा था। मेरा विचारधारात्मक झुकाव था तो मैं लेखन को एक ख़ास नजरिए से देखा करता था। जितना मैं लिखता था, उससे ज़्यादा पढ़ता था। मेरे दौर में लघुपत्रिकाएं बहुत निकलती थीं।आप पीछे भी जाइए तो महावीर प्रसाद द्विवेदी को देखिए या जितने लोगों को देखिए। कोई भी संपादक अपने समय की रचनाशीलता को सामने लाना अपना  प्राथमिक कर्तव्य समझता है। अपने समय की रचनाशीलता को सामने लाने का मतलब क्या? उस दौर में नए लोग भी लिख रहे हैं। अगर आप नयों को नहीं लाते हैं और जमे जमाए परिचित लोगों को ही लाते हैं तो आप तो अपने समय की रचनाशीलता को संपूर्ण रूप में नहीं ला पाए। मेरी अपनी वजह इसलिए भी है कि मैं 1975 के ‘सारिका’ के नवलेखन अंक में छपा था। जब छपा था तो मैं कितना खुश हुआ था, अब यह बताने लायक नहीं है। छोटे से कस्बे सासाराम के हम तीन दोस्त थे। हम तीनों ने कहानी भेजी थी ‘सारिका’ में। ‘सारिका’ का नवलेखन अंक बहुत महत्वपूर्ण हुआ करता था। ’72 से शुरू हुआ था, हमलोगों ने ’75 में भेजी थी। हम तीनों दोस्तों ने कहानी भेजी और कमलेश्वर जी को एक पत्र लिख दिया कि कोई एक भी चुन लेंगे तो हमलोगों का पूरा कस्बा बहुत प्रसन्न होगा। वो मई का महीना था और कमलेश्वर जी का पत्र आया। काले अक्षरों में हाथ से लिखा हुआ कि तीनों कहानियां ‘सारिका’ के नवलेखन अंक के लिए स्वीकृत हैं। हम तीनों दोस्त रिक्शा से उस दिन शहर में कितना घूमे थे। अब लगता है कि वो हास्यास्पद काम था। कितने लोगों को हमलोगों ने वह पत्र दिखाया और बताया कि हमलोगों की कहानी आ रही है। और ऐसे बहुत लोग होंगे जो हमलोगों को बेवकूफ भी समझते होंगे। अब लगता है कि बेवकूफी भी थी लेकिन उस समय हम लोगों ने यह किया।  नए रचनाकार को जब कहीं जगह मिलती है तो उसकी प्रसन्नता का ठिकाना नहीं रहता। वो प्रसन्नता हमलोगों को मिली थी। तो नए लेखकों के प्रति मैं भीतर से संवेदनशील रहता हूं। हमें महत्व मिला था तो समझ रहे थे कि जो लिखते हैं, उनको महत्व मिलना चाहिए। दूसरी एक और बात, नामवर जी ने एक बार कहा था। मैंने नामवर विशेषांक के संपादकीय में इसको दर्ज किया है। एक प्रसंग आया था कि केदारनाथ सिंह से ‘परिकथा’ जब कविताएं मांग रही थी तो वो नहीं दे रहे थे। कारण नहीं मालूम कि क्यों नहीं दे रहे थे। मैंन नामवर जी से कहा कि आप केदारनाथ जी से मांगकर कविताएं दिलवा दें तो ‘परिकथा’ में छप जाएगी। उन्होंने कहा कि तुम चाहोगे तो दिलवा देंगे लेकिन मेरी बात सुनो। उन्होंने कहा कि अपने समय की सबसे बड़ी पत्रिका वह होती है, जो जमे हुए नामों का सहारा लेकर खड़ा नहीं होती है। कमजोर पत्रिकाएँ अपने समय के स्थापित लेखकों पर टिकती हैं और मज़बूत पत्रिका वो होती है, जो नए लोगों को उछाल कर अपनी ताकत बढ़ाती है। ऐसी पत्रिकाएं समाज को, साहित्यकारों की दुनिया को ताक़त देती है और खुद भी ताक़त पाती है। तुम जहां तक हो सके युवा लेखकों को महत्व दो। युवा लेखन अंक निकालो। उसके बाद हमने नवलेखन अंक नौ निकाले हैं और हर बार नए लेखकों के लिए ‘युवा यात्रा’ का एक खंड रखता हूं । हमने ‘युवा यात्रा’ नाम से कहानी के अंक निकाले हैं। तो नए लेखकों को हमने खूब सामने किया है और आज बहुत सारे लेखक, जो लिख रहे हैं, उनमें काफी लोगों की रचनाएं पहली बार मेरे यहां छपी है। तो यह एक दायित्व है। इसे जो संपादक समझेगा, वो करेगा। जो नहीं समझेगा, उसका क्या किया जाय। वही नामवर जी वाली बात होगी। जमे हुए नामों पर टिकने की कोशिश करेगा और जमे हुए नामों पर टिकना मुझे अच्छा नहीं लगता। मुझको तो जमे हुए लोगों की रचनाओं में भी बहुत खामियां दिखाई देती है। मेरी मुश्किल दूसरी भी है। मै बड़े व्यक्तित्व के असर पर उसकी रचना को बड़ा नहीं मान लेता। मुझे रचना परखने की बीमारी भी है। रचना परखने में बड़े लोगों से बहुत आक्रान्त हो जायं, ये मेरे मिजाज में नहीं है। कोई नया लेखक मुझे ज़्यादा प्रभावित कर देता है। बहुत सीधी सी बात है।

सत्येंद्र : आप तो लघु पत्रिका आंदोलन से जुड़े रहे हैं। आज भी पत्रिका निकाल रहे हैं। आज पत्रिका निकालना कितनी बड़ी चुनौती है?

शंकर : बहुत बड़ा और मुश्किल काम है। ये कबीर की तरह घर फूंक के आगे बढ़ने की बात है। जो पत्रिका निकालना शुरू करते हैं, उनके लिए दिक़्क़त की बात ये है कि वो इसे बन्द भी नहीं कर पाते। बहुत सारे लोग जुड़ जाते हैं तो सबकी भावनाएं दिमाग में आने लगती हैं। आप पत्रिका शुरू करके छोड़ नहीं सकते। फिर साधन जुटाने के लिए बहुत माथापच्ची और उपाय करने पड़ते हैं। चन्दे मांगे जाते हैं, सहयोग के लिए लोग जुटाए जाते हैं, बहुत बार अपनी तरफ से भी कुछ लगाना होता है। ‘अब’ पत्रिका में तो हमारे ऐसे कई अनुभव हैं। ये अलग बात है कि ‘परिकथा’ में वो कठिनाइयां नहीं आईं क्योंकि मुझे दो दोस्त बहुत महत्वपूर्ण मिले। मैंने रिटायरमेंट के पैसे से एक छोटा सा इमरजेंसी फंड बनाया हुआ है। चूंकि मेरे परिवार की ज़रूरतें उस तरह से नहीं थी तो रिटायरमेंट के बाद मुझे जो पैसा मिला, उसके एक हिस्से से मैंने एक फंड बना दिया। कुछ समय पहले तक मेरे एक मित्र अभय जी, जो अब नहीं रहे, वो भी कुछ साधन जुटाते थे। विज्ञापन भी हमको ज्यादा मिलते थे। पिछले 5-6 सालों से विज्ञापन कम मिलने लगे हैं क्योंकि विज्ञापन कुछ ख़ास पत्रिकाओं को दिया जा रहा है। मैं दौड़धूप भी उस तरह से नहीं कर पाता। पहले चिट्ठी लिखते थे, तो विज्ञापन आ जाता था। अब वैसा नहीं होता। नतीजा ये हुआ कि जो इमरजेंसी फंड था, वो मेरा रेगुलर फंड हो गया। जितने लोग भी साहित्यिक पत्रिका निकाल रहे हैं, उनमें कोई भी व्यावसायिक रूप से सफल होगा, इसमें मुझे संदेह है।  जो भी सफल पत्रिकाएं हैं ‘नया ज्ञानोदय’, ‘वागर्थ’  सबके पीछे संस्थाएं हैं। ‘हंस’ ने भी प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बनाया है। ‘कथादेश’ का भी सहयात्रा प्रकाशन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी है। इन लोगों ने अपने हिसाब से पूंजी का जुगाड़ किया होगा। लेकिन ‘पहल’, ‘परिकथा’ जैसी पत्रिकाएं वैयक्तिक प्रयासों से निकलती हैं। कठिनाइयां हैं लेकिन कठिनाइयों से कोई चीज़ छोड़ दें तो फिर कौन सी बड़ी बात हुई! कठिनाइयों के भीतर घुस कर आप हल निकालते रहें तब तो कोई बात हुई।

सत्येंद्र : नए कथाकारों से क्या कहना चाहेंगे आप?

शंकर : नए कथाकारों के बारे में तो बात बहुत साफ़ है। कुछ भी ऊलजलूल लिखने और छपने के लिए मन में आग्रह नहीं होना चाहिए। बहुत सारे लेखक हैं जो छपने को बहुत प्राथमिकता  देते हैं। जब कुछ लिखा जाय तो उसे जांचा जाय। जब लगे कि जरूरी है तब उसे छपने के लिए देना चाहिए। लिखना भी वही चाहिए जो ज़रूरी लगे, छपने के लिए भी जब अच्छी रचना हो तभी देना चाहिए। कई ऐसे लेखकों के उदाहरण हैं, उसमें मेरा भी उदाहरण है, लिखने के बाद कोई कहानी अच्छी नहीं लगी तो उसे छोड़ दिया गया। ज्ञान जी ने भी एक बार कहा था मुझे। मैंने कई कहानियां जो अच्छी नहीं लगी, उनको फाड़ दिया। मोह नहीं रखा। भेजते तो छप जाती कहानी क्योंकि उस समय तक मेरा नाम हो गया था। लेखक का जब नाम होता है तो उसका कूड़ा कचरा भी छपता है। बहुत सारे उदाहरण मेरे दिमाग में है लेकिन उन नामों को लेना उचित नहीं है। लेखक का नाम हो जाय  तो कचरा भी छप जाएगा और लेखक खुश भी हो जाएगा। अगर वह नहीं जांचता है अपनी रचना को तो खुश हो ले। उसको कौन रोक सकता है खुश होने से। लेकिन अगर रचना की समझ है तो रचना को जांचना चाहिए। नए लेखक को ज्यादा लिखने के लिए बेचैन नहीं होना चाहिए। जो सार्थक लगे, ज़रूरी लगे, वही लिखना चाहिए। यह सोचते हुए, जितना लिखा जा सके लिखना चाहिए। ज़्यादा लिखा जाय तो बहुत अच्छा, ज़्यादा नहीं लिखा जा सके तो बहुत चिन्ता नहीं करनी चाहिए। अगर कम लिख रहे हैं और आपको लग रहा है कि सार्थक लिख रहे हैं, आपने ज़रूरी लिखा है तो वह भी संतोष के लिए काफी है।

हरियश राय : हम नई रचनाशीलता की बात कर रहे हैं। ज्यादातर नए रचनकार घर परिवार की कहानियां, बुजुर्गों की कहानियां, महिलाओं की दयनीय स्थिति की कहानियां—इसी में  रह जाते हैं। इनके पीछे विचारधारा को कोई आग्रह नहीं दिखता।

शंकर : लेखक का सामाजिक जीवन अगर बहुत व्यापक नहीं है।  मध्यवर्ग का लेखक है, यदि वह सीमित दायरे में रहता है, बस नौकरी करता है और घर जाता है। किसी संगठन या आंदोलन से नहीं जुड़ा है। अगर उसका जीवन संकुचित है तो बहुत स्वाभाविक है कि उसकी कहानियां घर परिवार से ही निकलेंगी। अगर लेखक का जीवन खुला हुआ है, वह संस्थाओं में आता जाता है, आंदोलनों में रुचि  रखता है, समारोहों में रुचि रखता है तो उसका अनुभव संसार थोड़ा बड़ा होगा। कहानी की एक बडी शर्त है कि कहानी चाहे निजी जीवन की हो या पारिवारिक जीवन की, अगर वह किसी न किसी तरीके से बाहर समय और समाज के परिदृश्य से जुड़ी हुई है तो सफल है। बाहर का परिदृश्य कहानी में झांके या इसके भीतर से कोई रास्ता फूटे और यह बाहर के परिदृश्य से जुड़े। अब एक छोटी सी कहानी आपको बताते हैं, बहुत सारी कहानियां हैं मेरे दिमाग में लेकिन एक छोटी सी कहानी बताता हूं। उस लेखक का नाम भी याद नहीं है। एक पात्र घर लौटता है। उदास मन से लौटा है। पत्नी उसको चाय देती है, उसकी रुचि नहीं होती है। किसी काम में उसका मन नहीं लगता। उसका मन नहीं लग रहा है घर में। रात को खाने के बाद वो लोग जब बेड पर जाते हैं। नई उम्र में वो एक साहचर्य का जीवन जीते थे। पत्नी देख रही है कि वह उसमें भी इंटरेस्ट नहीं ले रहा है। सुबह वह कहती है कि मैं देख रही हूं कुछ घंटों से कि तुम्हारी पूरी  सोच में, तुम्हारी पूरी पर्सनालिटी में सब कुछ बदला हुआ है। अब देखिए, जो अन्त आ रहा है, अगर ये नहीं हो तो कहानी पूरी थर्ड क्लास कहानी हो जाएगी। सुबह वह चाय वाय पी रहा है। कोई तैयारी नहीं कर रहा है। पत्नी कह रही है कि तुम तैयारी नहीं कर रहे हो। तब वो बताता है कि मेरी नौकरी तो कल छूट गई है। ये एक पंक्ति पूरी कहानी को एक नया संदर्भ दे देती है। इस एक पंक्ति को हटा दीजिए तो कहानी क्या होगी और यह एक पंक्ति है तो कहानी क्या है। एक पंक्ति से ही कहानी बहुत बड़े सामाजिक परिदृश्य से जुड़ जाती है। कहानी वैयक्तिक जीवन की हो या पारिवारिक जीवन की लेकिन वो कहीं न कहीं तो  सामाजिक परिदृश्य का एक हिस्सा तो है। वो उसमें किसी तरह झांके। अब छोटी सी बात। बात आ गई है तो कहनी चाहिए। सामने बैठे हैं तो कहना बहुत लाजिमी है। मैं फेवर नहीं दे रहा हूं सत्येंद्र जी को। ये मेरे विवेक का तकाजा है कि मैं इसकी चर्चा करूं। अब ‘प्रीमियम’ कहानी है। ‘प्रीमियम’ कहानी तो पूरी तरह एक परिवार के भीतर है। एक पात्र की कहानी है, जो परेशान है लेकिन बाहर जिस सिस्टम में वो रह रहा है,  जिस व्यवस्था में रह रहा है, उसमें जीने के लिए उसने लोन ले रखे हैं, ईएमआई चुका रहा है, उस ईएमआई के चलते वो बहुत सारी ज़रूरतों की प्राथमिकताओं में उलटफेर कर दे रहा है। अन्त में जो निर्णय लेता, इलाज की जगह वो पॉलिसी की प्रीमियम देना प्रेफर करता है ताकि अगर उसको कुछ हो जाय तो उसके परिवार को लाभ मिले। मतलब वह जीवन चाह रहा है मृत्यु के माध्यम से। मतलब वह अपनी मृत्यु के माध्यम से अपने आश्रितों को जीवन दे रहा है। तो यह अद्भुत कहानी है। यह बहुत बड़ी विडंबना है कि किसी सभ्यता में ऐसा दौर आ जाय कि आदमी प्राथमिकताएँ इस तरह चुने कि अपने से बचाने से ज़्यादा वह प्रीमियम देकर सोचे कि मेरा परिवार बच जाय तो यह तो अमानवता का उच्चतम शिखर है ये। वह पात्र जो है अपने बारे में नहीं सोचकर परिवार के बारे में सोचता है। यह कहानी एक नितान्त निजी कहानी होते हुए भी पूरे इकोनॉमिक सिस्टम की भी कहानी बनती है। वहां से नहीं जोड़िएगा तो इस कहानी को कैसे समझिएगा। इस कहानी में क्या है फिर?

हरियश राय : कहानियां तभी बनती हैं, जब वह सामाजिक आर्थिक संदर्भ से जुड़ती हैं।

शंकर : जब तक सामाजिक परिवेश सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं जुड़ेगी कुछ नहीं समझ में आएगा। सिनीवाली की कहानी में क्या है  एक पात्र की कहानी है। एक डरी हुई स्त्री है, जो अपनी बच्ची को लेकर डरी हुई है। बाहर से अतिथि आया है और वह डरी हुई है कि कहीं बच्चियों के साथ दुष्कर्म न हो जाय। पूरी कहानी डर में गुजर रही है। कहानी में पूरी रात डर में गुजर रही है। ये डर कहां से आया। क्यों स्त्रियां इतनी डरने लगीं अपनी बच्चियों को लेकर? समय ने ऐसा डर पैदा किया है। एक ज़माना था कि मांएं अपनी बच्चियों को कहीं भी छोड़कर निश्चिंत घर में खाना बनाती थीं। बच्ची गई स्कूल तो सब कोई निश्चिंत। बच्ची गई मिठाई लाने तो भी कोई बात नहीं। अब हर जगह डरिए। घर में एक अतिथि आया हुआ है तो डरिए।  कहानी वैयक्तिक जीवन की है या पारिवारिक जीवन की, उसे आप सामाजिक परिवेश से जोड़ पाते हैं कि नहीं या सामाजिक परिवेश की ओर जाने का कोई रास्ता उस कहानी में है कि नहीं—यह बात महत्वपूर्ण है। यही बात एक बार मैंने महेश दर्पण की कहानी ‘धुन’ के बारे में कही थी। उसमें कहानी जब बाज़ार में जाती है, वहीं तो उस कहानी में जान है। वरना तो वह नितान्त वैयक्तिक जीवन की कहानी है। कोई व्यक्ति कोई परिवार समाज का हिस्सा ही तो है, उसका विस्तार ही तो है। ऐसा थोड़े ही है कि सामाजिक परिवेश अलग है, हम अलग हैं।

सत्येंद्र : विचारधारा की जो बात हम लोग कर रहे थे, तो क्या मौजूदा दौर विचारधारा के संकट से नहीं गुजर रहा? कोई विचारधारा है ही नहीं। युवा पीढ़ी एक तरह से विभ्रम की स्थिति में है।

शंकर : इसमें दो चीजें हैं। एक तो निराशा है और दूसरी संतोष की बात। निराशा यह है कि यह बात सही है कि अस्सी के दौर में बिना विचारधारा की समझ के कोई लेखक होता नहीं था। ऐसा महौल बना हुआ था साहित्य में कि विचारधारा को एकदम सर्वोच्चता प्राप्त थी। सही बात है कि बिना विचारधारा के आप यथार्थ, सामाजिक जीवन को ठीक से समझ नहीं पाइएगा। आज भी नहीं समझ पाइएगा। उस समय भी नहीं समझ पाते। बिना विचारधारात्मक बोध के समाज को समाजिक यथार्थ को, सामाजिक जीवन को समझा नहीं जा सकता। लेकिन अभी एक दूसरी स्थिति दिखाई पड़ रही है। अभी विचारधारा के लिए प्रतिबद्धता का आग्रह कमज़ोर पड़ता दिखाई दे रहा है, लेखक संगठनों की सक्रियता भी थोड़ी सी कम है। संपादक भी वैसे ज्यादा दिख रहे हैं, जिनका कोई विचारधारात्मक आग्रह नहीं है। तो हो ये रहा है कि माहौल में वैसी रचनाएं छाई हुई हैं, जिनमें विचारधारात्मक आग्रह की मौजूदगी नहीं है। आज जो लिखा जा रहा है, उसमें विचारधारात्मक  प्रतिबद्धता कहीं कहीं ही  दिख रही है लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है। जिन लोगों को विचारधारा की समझ नहीं है और जिनके पास विचारधारात्मक बोध नहीं है वो लोग भी कभी  कभी ऐसी कहानियां लिख रहे हैं, जैसा कि विचारधारात्मक बोध रख कर ही लिखा जा सकता है। यह एक नई चीज़ है। विचारधारात्मक बोध सचेत रूप से उस लेखक के पास नहीं है लेकिन वह जुड़ रहा है, अपने समय, समाज से और ऐसा लिख रहा है जैसा कि विचारधारात्मक बोध वाला आदमी ही लिख सकता है।  मतलब कि आप अपने समय को विचारधारात्मक बोध से भी समझ सकते हैं। अगर ईमानदारी और समय को समझने की जिद हो तो भी आप समय को समझ सकते हैं। अगर ऐसा होता है तो आप विचारधारात्मक बोध के आसपास ही पहुंच जाएंगे।

सत्येंद्र : लिटरेचर प्वाइंट से बात करने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया 

इस इंटरव्यू को आप नीचे के लिंक पर देख भी सकते हैं

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