आनन्द गुप्ता की छह कविताएं

पहली बार
पहली बार
हमने लुटाए
अँजुरी भर-भर कर तारें
पहली बार
हमने समेटे
बाँह भर कर आकाश
पहली बार
हमने सुनी
पृथ्वी के चलने की आवाज
नदी के दिल की धड़कन
दो देहों के बीच बजने वाला संगीत
पहली बार हमने सुनी
धरती के किसी अँधेरे कोने से
बाहर आने को आतुर
अंकुरित बीज की किलकारी
पहली बार
हमने जाना
फूलों के हँसने का रहस्य
बसंत के आने का आनंद
जमे हुए मौन का अर्थ
पहली बार
समय से तेज भागते हुए
हमने मापी पूरी पृथ्वी
पहली बार हमने सीखा
जी-जी कर मरना
पहली बार हमने सीखा
मर-मर कर जीना।
अपने ही अंदर
सबने कहा
वह आकाश सी है
मैं आकाश के पास गया
वहाँ कुछ नहीं था
सिवाय सूनेपन के
सबने कहा
वह फूल सी है
मैं फूल के पास गया
और सौन्दर्य के भार से
झड़ने लगी उदासी की पंखुड़ियाँ
सबने कहा
वह चाँद सी है
मैं शांत नदी के पास गया
वह आँसुओं से थी तरबतर।
वह कहीं न थी
न आकाश में
न फूल में
न चाँद में
नहीं गया कभी
अपने ही अंदर।
तुम्हारे बिना
खिड़की से अंदर आती है हवा
और कानों में
कुछ बेचैन शब्द
फुसफुसाते हुए चली जाती है
दरवाजे से झाँक कर
चुपचाप लौट जाता है सूरज
आँगन में आती है चिड़िया
और गुमशुम
बिना चहचहाए उड़ जाती हैं
चाँद के चेहरे पर
उभर आई है
उदासी की लकीरें
और इस वक्त
शरद के बादल सा
मैं
पड़ा हूँ घर में
तुम्हारे बिना।
मेरा हृदय
किसी भीषण
सूखे से अक्रांत
बंजर जमीन के सदृश्य
चटखता जा रहा है
मेरा हृदय
काश तुम घटा बन
मेरे जीवन में आती
और शुष्क हृदय में
यह विश्वास पुनः जगा पाती
कि बसंत
आज भी निहित है मुझमे।
प्रेम
वह पहुँचेगा
तुम्हारे पास दबे पाँव
जैसे रात में उतर आती है
दूब पर ओस
और ताजगी से भर उठेगी
तुम्हारी हर सुबह।
वह पहुँचेगा
काँटों पर गुलाब की तरह
तुम्हारे सपनों के रथ पर सवार होकर
और बार-बार चुभेगी तुम्हे
अपनी ही नींद।
वह पहुँचेगा
रात के सन्नाटे के बीच
जब तुम सुन पा रहे होगे
पृथ्वी की धड़कन
वह तुम्हे
चुपके से छूते हुए
कानों में कुछ फुसफुसाएगा
और तुम्हारे अंदर से
आने लगेगी
मोगरे की सुगंध।
वह पहुँचेगा
अपने हाथों में
असंख्य चिट्ठियाँ लेकर
जो वर्षों से
किसी मुकम्मल पते के इंतजार में
भटक रही होगी लगातार।
वह पहुँचेगा
तुम्हारे सबसे हसीन सपने में
और तुम्हे दिखाते हुए
अपने शरीर पर
गहरे जख्मों के निशान
पूछेगा-
क्या तुम उसके लिए
होम कर सकते हो
अपने जीवन का हर बसंत?
प्रेम में पड़ी लड़की
वह सारी रात आकाश बुहारती रही
उसका दुपट्टा तारों से भर गया
टेढ़े चाँद को तो उसने
अपने जूड़े में खोंस लिया
खिलखिलाती हुई वह
रात भर हरसिंगार सी झरी
नदी के पास
वह नदी के साथ बहती रही
इच्छाओं के झरने तले
नहाती रही खूब-खूब
बादलों पर चढ़कर
वह काट आई आकाश के चक्कर
बारिश की बूँदों को तो
सुंदर सपने की तरह
उसने अपनी आँखों में भर लिया
आईने में उसे अपना चेहरा
आज सा सुंदर कभी नहीं लगा
उसके हृदय के सारे बंद पन्ने खुलकर
सेमल के फाहे की तरह
हवा में उड़ने लगे
रोटियाँ सेंकती हुई
कई बार जले उसके हाथ
उसने आज
आग से लड़ना सीख लिया।

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2 Responses

  1. देवाशीष आर्य ( फेसबुक पर आर्य गुड्डू ) . says:

    ताजे पानी सी बहती कविताएँ , शुभकामनाएं आनंद जी .

  2. Bhaskar Choudhury says:

    आनंद भाई को इन सहज सरल सम्प्रेषणीय कविताओं के लिए हार्दिक बधाई ..

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