लकी निमेष की दो ग़ज़लें

एक

पसीना वो बहाकर देख बच्चों को खिलाता है
जला के खून सारा दूध वो उनको पिलाता है
अदाकारी गरीबों में गरीबी ला ही देती है
जिसे ग़म हजारो हैं वही हँसकर दिखाता है
अमीरों सीख लो हुनर तुम भी गरीबों का
कि आँसू आँख में होते हुए कैसे छिपाता है
बडा अफ़सोस होता है ख़ुदा की रहमतों पे अब
उसी सर पे नहीं छप्पर हवेली जो सजाता है
करू ना क्यूँ ‘लकी’ मै फ़ख्र उन बेबस गरीबों पर
निवाला छोड देता है मगर बच्चे पढ़ाता है

 दो

दौड़ती सी जिन्दगी को थाम लूँ जरा
छोटी छोटी खुशियों का नाम लूँ जरा
इन अधेंरी गलियों में खो न जाऊ मैं
इंसान हूँ तो होश से भी काम लूँ जरा
भागते ही भागते अब थक गया हूँ मैं
चैन-ओ-सुकूं आज कोई जाम लूँ जरा
ख्वाहिशों की धूप में जलता हूँ मैं ‘लकी’
राहत के आफ़ताब से इक शाम लूँ जरा

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‘लकी’निमेष
पता-रौजा-जलालपुर ग्रेटर नौएडा गौतम बुद्ध मगर यूपी
व्यवसाय-अध्यापक सि०बाद बु०शहर यूपी

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