मल्लिका मुखर्जी की तीन कविताएं

सामंजस्य

कितना सामंजस्य है
सपनों और वृक्षों में !
दोनों
पंक्तियों में सजना पसंद करते हैं ।
कितना भी काटो-छाँटों
उनकी टहनियाँ,
तोड़ लो सारे फल चाहे
नोंच लो सारी पत्तियाँ,
मसल दो फूल और कलियाँ;
फिर भी पनपते रहते हैं
असीम जिजीविषा के साथ
जब तक उन्हें
जड़ से न उखाड़ दिया जाए ।

बचा हो जहन में बीज तो
अवसर मिलते ही
फिर बेताब हो उठते हैं
अपनी-अपनी जमीं पर
अंकुरित होने के लिए !

खूँटी

काल की खूँटी पर टँगा
मानव जीवन
छटपटाता रहता है
हर पल
काल-चक्र का घेरा तोड़
उस मुक़ाम तक
पहुँचने के लिए
जहाँ है
प्रेम का छलक़ता मौसम ।
कितनी लड़ाइयाँ
लड़ लेता है मानव
इस अंतिम लक्ष्य को
हासिल करने के लिए !

सकारात्मक सोच

मुद्दत के बाद,
आज अचानक
चलते-चलते
नज़र पड़ी
धरती का सीना चीरकर
निकलने वाली
उन हरी-हरी कोपलों पर !

सोच रही हूँ,
यह प्रकृति की उदारता है,
मेह का स्नेह है
या
बीज का साहस
जो धरती की गोद में छिपकर
राह तक रहा था
सही समय का ?

 

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