मान बहादुर सिंह की कविता ‘बैल-व्यथा’

 

तुम मुझे हरी चुमकार से घेरकर

अपनी व्यवस्था की नाद में

जिस भाषा के भूसे की सानी डाल गए हो

एक खूंटे से बंधा हुआ

अपनी नाथ को चाटता हुआ

लम्बी पूंछ से पीठ पर

तुम्हारे पैने की चोट झाड़ता हुआ

खा रहा हूं।

 

देखो हलधर,

मुझे इस बात की चिंता नहीं कि

तुम मुझे अपने खेत जोतने को

नांधते हो

कभी बायें कभी दायें से मुझे हांकते हो

बरहहाल बड़ा मरकहा सवाल है

क्योंकि मुझे पता है

मेरा बल हर हालत में

तुम्हारी बदनियती मेें जुता है

 

तुम्हारे पास ज़मीन है

हल है पैना है और मुझे

तुम्हारे ईंधन के लिए हगना है

पांव के जूते के लिए मरना है

खेत में खाद के लिए

मेरी हड्डियों को पिसना है

 

मैं कोई फसाद नहीं कर रहा हूं

हलधर भैया

सिर्फ़ अपनी जमात की बात कर रहा हूं जिनको

विधाता ने सींग भी दिया है

और कन्धे में धरती चीथ डालने की क़ूवत

मगर अब इतना तो साफ़ कहो

तुम मेरी बिरादरी के ख़िलाफ़ हो

 

मेरी गूंगी मेहनत से तुमने

एक भाषा उगाई है

खरी खोटी मोट पातर बोलियां मैंने सुनीं

कविता तुमने खाई है

इस नाद में तुम्हारे समय का स्वाद

खा रहा हूं

जिसकी बांहें पगुराता हुआ

अपनी तकलीफों से जबान लड़ा रहा हूं

 

मुझे खेद है

जब मेरी मां के थन का दूध

तुम्हारी किशोर कमोरियों में

फेनाया हुआ तुम्हारे बच्चों की

हंसी में बह रहा था

अपने दूधमुंहे दांत के नीचे

सूखा तृण दाबे

क्या मैं कुछ कह रहा था?

मेरी इच्छाओँ को बद्धी कर

मेरे हर अंगुल शरीर को

अपनी मुट्ठियों में नाप कर

मेरे हर विरोध को नाथ दिया था।

कितना कमजोर पड़ जाता है

सच का पशुबल भी

फ़रेब से भांजी हुई पगही में

मेरी सींग को फुलरे पहिना

अपनी गाड़ी खिंचवाना

एक ऐसी राजनीति है

जिसे मेरे कन्धे समझते हैं।

 

मुझे ख़बर है तुम्हारी भाषा का

जो तुम्हारी ख़बरें ढोती हैं–

उस रात अपनी सरिया के अंधेरे में

नीचे पड़े ओछरे को सूंघता

मेरी नाक को छू गया

किसी रंगीन पत्रिका का फटा पन्ना

जिस पर छपा था

बाटा के जूतों का इश्तहार

जिसकी कविता पहनकर तुम्हारा बेटा

रोज़ जाता है बाज़ार।

मैं किन-किन दुकानों में बिका हूं

उससे ख़बरदार होकर भी तो

मैं सरकार नहीं हूं कि

अपने चमड़े का सिक्का चला दूं।

 

मैंने बहुत सोचा है

तुम्हारे सूतने के वक्त

खेत के बीच मूतता हुआ

मुंह लगे खोंचा को कि अब

मैं सिर्फ़ स्मृतियां पगुरा सकता हूं

नया कुछ नहीं खा सकता

धरती से उगा हर हरा अक्षर

भैंस बराबर लगता है

जहां मेरी गैया

मेरे सूखे अंडकोष को निहारती है

अपनी पूंछ के नीचे चाट हुंकारती है

जब मेरा श्रम चुकने के बाद

मेरा बुढ़ापा तुम्हारा जुआ

उठाने के लिए उठ नहीं सकता है

तब कसाई के गंडास के नीचे के

अलावा वह और कहीं

मर नहीं सकता है।

 

कैसे समझाऊं अपनी बात

मेरी भाषा तुम समझते नहीं

तुम अपनी भाषा मुझे खिलाते हो

तुम आदमी हो इंसान हो

मनुष्य हो मैं जानवर हूं

इसलिए मज़बूर हूं कि

तुम्हारा मज़दूर हूं

तुम अक्लमंद हो

हाकिम हुक्काम हो

मैं गर्ज़मन्द हूं, नौकर चाकर हूं

बेशऊर हूं

तुम्हारे पास बहुत सारे

आध्यात्मिक दर्द हैं

जो तुम्हारी निरंकार कविताओं के

पेट में पचते हैं

मेरे पास तो बस एक पेट का दर्द है

जिसके लिए ताउम्र मेरे कंधे खटते हैं।


बोधि प्रकाशन, जयपुर द्वारा प्रकाशित ‘मानबहादुर सिंह रचना-संचयन’ से साभार

 

 

 

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