मनी यादव की 4 ग़ज़लें

मनी यादव

 एक
शाम    कोयल   और   हवा   के    साथ   गाई  मैंने
ज़िन्दगी   के   साज़   पर   जो  धुन   बनाई     मैंने

कैसे     लफ़्ज़े-बेवफ़ा    लायें    ग़ज़ल   में  अपनी
बेवफ़ाई      की       शमा      ख़ुद    जलाई     मैंने

छोड़कर  घर  कुछ  कमाने  के  लिये  निकला तब
ज़ीस्त     बच्चे     के     कटोरे    से   कमाई    मैंने

आज    तेरी   ज़ुल्फ़    क़ाबू   में    नहीं     है   तेरे
ये   हवा   के    साथ    साज़िश   से   उड़ाई   मैंने

नफ़रतें दिल  की  पिघल कर आँखों तक जा पहुँची
नफ़रतों    को    क़ैद   से    दे     दी   रिहाई    मैंने

ख़ाक   यादों   की   तेरे  दिल  में  भी  उड़ती  होंगी
बात    फुर्सत    में   अभी    दिल   को   बताई  मैंने

दो
ये   करतब    जादुई   तो   ख़ानदानी  है
समन्दर    मेरे   अश्क़ों   की   कहानी है

जो   बस्ती   लूट   ली  है   तेरी  यादों  ने
ये बस्ती दिल की मुझको फिर बसानी है

मुझे   बस  तीन  लोगों   की  ज़रूरत है
मेरे  इक  ख़्वाब   की  मय्यत  उठानी है

याँ सांसों का  नहीं  साँसों  पे  कोई  ज़ोर
रग़ों   को   ऑक्सीजन   से   निभानी  है

तने  को  चूम  पागल  है  लचीली  शाख़
हवा अब  और  इक  पल  ज़िंदगानी  है

तीन
छोड़ दो आसमाँ के पल्लू में
रह नहीं सकता जाँ के पल्लू में

खेलते खेलते थक कर अब धूप
सो गई आके माँ के पल्लू में

धड़कनें आती जाती रहती हैं
इस दिल-ए-मेहरबाँ के पल्लू में

मेरी आवाज़ बेघर थी आख़िर
घर मिला दास्ताँ के पल्लू में

दुश्मनी दोस्ती दोनों रहतीं 
एक बस इस ज़ुबाँ के पल्लू में

चार
वो गया  है  बेदिली  तो लाज़मी  है
आँसुओं से दोस्ती तो लाज़मी है

धूप सूरज से बग़ावत कर रही है
इश्क़ में आवारगी तो लाज़मी है

उस नज़र में देखा ख़ुद को मुद्दतों बाद
आँख में थोड़ी नमी तो लाज़मी है

याँ अदब की सब चितायें जल चुकी हैं
सल्तनत में तीरगी तो लाज़मी है

 

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1 Response

  1. दिलीप कुमार says:

    मनी जी की गज़लें बहुत नाजुक और नुकीली हैं । बहुत अच्छी लगीं ।

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