मनी यादव की दो ग़ज़लें

 

मनी यादव

एक

मौत को अपना आशना रक्खें
ज़िन्दगी से भी वास्ता रक्खें
चाँद आ तो गया मेरे घर में
चाँदनी इसकी हम कहाँ रक्खें
शाइरी सुनना कोई खेल नहीं
शेर पर ही मुलाहिज़ा रक्खें
प्यास दरिया बुझा नही सकता
इसलिए पास में कुआँ रक्खें
पेड़ तहज़ीब का पड़ा जख़्मी
पूर्वजों इसपे कुछ दुआ रक्खें
तू बुलंदी दिखा रहा मुझको
ज़ेब में हम तो आसमाँ रक्खें

दो
सब अँधेरों के गुज़र का वक़्त है
मुर्गा बोला ये सहर का वक़्त है
अक़्स अब क़द के बराबर है मेरा
ये यकीनन दोपहर का वक़्त है
ओढ़ ली सूरज ने चादर नींद की
आँसुओं के अब सफ़र का वक़्त है
कौन कहता है कहानी लंबी अब
दास्तान-ए-मुख़्तसर का वक़्त है
नब्ज़ धीमी है ग़ज़ल की, है अचेत
शाइरी तेरे हुनर का वक़्त है

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