मनी यादव की दो ग़ज़लें

एक

अहले-दिल में कुछ छुपे आज़ार निकले
हर शहर में इश्क़ के बीमार निकले

कुछ सही पर रोशनी देता तो है जब
जुगनुओं का काफिला हर बार निकले

यूँ तो क़ातिल मर गया खंजर से उसके
गिनने में उतने ही फिर हर बार निकले

दास्ताँ सबकी कही तुमने मनी पर
आप बीती कहने में लाचार निकले

दो
सांसोंं को फिर जी उठने का अरमान मत देना
शम्मा बुझी को जलने का इमकान मत देना

ख़त की खबर सुनकर गली में दौड़ जाती है
ऐ डाकिये माँ को गलत फरमान मत देना

देना अगर रोटी उसे तो पेट भर वरना
अल्लाह जीते जी उसे श्मशान मत देना

हमदम मेरा जब तक मुझे आगोश में ना ले
तब तक जहाँ को इश्क़ का वरदान मत देना

अहबाब मेरे ही तक़ल्लुफ़ से मिले मुझसे
ऐसी मनी को तुम कभी पहचान मत देना

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