‘सड़क पर ज़िंदगी’: मनुष्य-जीवन के संघर्ष-काल को कमाल का शब्द देती कविताएं

पुस्तक-समीक्षा

शहंशाह आलम

यह सच है कि आदमी के जीवन का संघर्ष रहस्यों से भरा रहता है। ये संघर्ष-रहस्य आदमी के जीवन में चुपचाप चले नहीं आए हैं। मेरे ख़्याल से पूरी चालाकी से दुनिया भर के पूँजीवादियों ने और दुनिया भर की अमीर, क्रूर, दंभी सरकारों ने आदमी के जीवन में अभाव, बेरोज़गारी, बेक़रारी, दुर्भाग्य आदि सबकुछ चालाकी से भर दिए हैं ताकि यह जो आम आदमी है, वह अपनी निजी ज़िंदगी में आम ही बना रहे, ख़ास बने भी तो उनका अपना जोखिम से भरा जीवन बने, जिससे हर पूँजीवादी और अमीर सरकारें उनका मुँह चिढ़ा सकें। हम आम आदमी के जीवन की यही विडंबना है, यही उधेड़बुन है, यही आवाजाही है कि हम अपने हिस्से का जितना बढ़िया-बढ़िया इकट्ठा करें, सहेजें, संभाल कर रखें, फिर अंतत: उन्हीं अमीर लोगों, उन्हीं क्रूर सरकारों को वापस लौटा दें, जो अमीर लोग और अमीर सरकारें एक-दूसरे के सहोदर हैं सदियों-सदियों से। यही सच है कि आम आदमी का जीवन ऊहापोह, दुविधा, उलझन, असमंजस, चिंता की स्तिथि में पीसता आया है और आगे भी पीसता रहेगा। ऐसे ही आम आदमी के इस आजीवन संघर्ष की गाथा रही हैं समकालीन कविता के वरिष्ठ कवि मानिक बच्छावत की कविताएँ। इनके सद्य प्रकाशित कविता-संग्रह ‘सड़क पर ज़िंदगी’ की कविताएँ भी उन्हीं पीसते-घिसते आदमी की कविताएँ हैं :

प्यारे मियाँ के पास

दो घोड़ा गाड़ियाँ थीं

जिन्हें वे हावड़ा स्टेशन पर रखते

मुसाफ़िर इनमें बैठ जाते

घोड़ा गाड़ियाँ बंद खिड़कियों वाली होती थीं

कलकत्ता के रईसों की गाड़ी

जिन्हें दो टट्टूनुमा घोड़े खींचते

स्टेशन से हरिसन रोड, ताराचंद दत्त स्ट्रीट

कॉलेज स्ट्रीट, गिरीश पार्क, श्याम बाज़ार तक

लोग इनमें चले जाते

पर जब से टैक्सियाँ और ऑटो चलने लगे

लोगों ने घोड़ा गाड़ियों पर बैठना बंद कर दिया

प्यारे मियाँ को भूखों मरने की नौबत आ गई(‘प्यारे मियाँ की बग्घियाँ’/पृ.13)।

अब कोई साधारण जन रोज़ बदल रहे समय, रोज़ बदल रही तकनीक, रोज़ बदल रही जीवन-शैली में ख़ुद को कहाँ पर एडजस्ट करे, ख़ुद को कहाँ पर रखे, ख़ुद को कहाँ पर बैठाए, यही विवादास्पद है। अब इसे साज़िश कहें या अराजक परिस्थिति कि जो पूँजीहीन हैं, जो मूल्यांकनहीन हैं, जो अनुभवहीन हैं, वे इस रोज़ बदल रही दुनिया को कैसे अपना बनाएँ, कैसे अपनी प्रार्थना में शामिल करें, कैसे अपनी मुक्ति का रास्ता ढूँढ़ें, उनके जीवन का सबसे बड़ा सवाल यही है। इन साधारण जन के जीवन में असाधारण इतना भरा-पूरा मुझे जब-तब दिखाई देता है कि उनका समय तराज़ू पर मेंढकों को तौलने के समान है। तराज़ू पर एक मेंढक को चढ़ाओ तो दूसरा तब तक क़ूदकर भाग निकलना चाहता है। ऐसे जीवन की सँख्या देश में अधिक है, जो अपने निजी जीवन में अकसर विफल है, पराजित है और सिर्फ़ प्रार्थनाओं के भरोसे जीवित है। आप ढोल पीटते रहिए कि आपका देश आगे बढ़ रहा है। मेरा देश तो वैसा का वैसा ही है, अभाव से भरा, ज़ुल्मो-सितम से हरा :

राधिया के पास नहीं हैं

ज़्यादा कपड़े

सिर्फ़ एक जोड़ी बस

एक वह पहनती है

और दूसरे को धोती-निचोड़ती सूखाती है

कार्नवालिस स्ट्रीट की सड़क की रेलिंग पर

जो दो भागों में बाँटती है सड़क को(‘राधिया के कपड़े’/पृ.15)

अथवा,

ठेका मज़दूरिन है

किसी को ज़रूरत होती है

बुला लेता है

बदले में खाना मिल जाता है

चौधरीबाड़ी के बरामदे के नीचे

पसरकर पड़ी रहती है

वह अकेली नहीं है

उसके साथ उससे भी कमउम्र की

बहुत सारी औरतें हैं

घर के काम से जातीं

बहुरानियों की मालिश-चंपी से लेकर

कई छोटे-मोटे काम करतीं

इधर से उधर संदेशे ले जातीं(वही/पृ.15-16)।

ग़ौरतलब यही है कि बहुत सारे संदेशवाहक की ज़िंदगी में बहुत-बहुत दिनों तक कोई अच्छी ख़बर कहाँ आती है। ग़ौरतलब यह भी है कि मानिक बच्छावत की वाजित चिंता यही है कि ऐसा कौन-सा जुगत भिड़ाया-किया जाए, जो प्यारे मियाँ और राधिया के घर भी अच्छे दिन सचमुच पहुँचें। इसलिए कि सरकारें तो हमेशा से भिखारी ही होती हैं या यूँ कहिए कि लुटेरी ही होती हैं। इसलिए कि सरकारें दस बहाने करके और हज़ार रास्ते निकाल करके हमारी जेबी से पैसे मार लेती हैं। सरकारों का लूटने का यह सिलसिला अंतहीन है :

दो बीघा ज़मीन है

हराधन चासी के पास

बांग्ला नस्ल के दो छोटे-छोटे बैल भी हैं

चास हल चलाता है

धान उपजाता है

उसका संसार ऐसे ही चलता है

दो जून पेट भरने लायक़

धान हो जाता है

खेत महाजन के यहाँ गिरवी है

उसको चार सयानी लड़कियाँ हैं

हराधन को उनकी चिंता है

क्या करे

किस कुएँ में डाल दे

बाक़ी सबकी हालत भी ऐसी ही है(‘हराधन चासी का दुःख’/पृ.27)।

दरअसल मानिक बच्छावत की ये कविताएँ मनुष्य के दुःख की उस अंतहीन कविता-यात्रा की गूँज है, जिसमें मनुष्यता छटपटाती, कराहती, बिलखती दिखाई देती है। कवि का यह विराट अनुभव है। इसीलिए मानिक बच्छावत की ये कविताएँ मनुष्य की विवशता, विफलता, वीभत्सता की भी कविताएँ हैं। लेकिन इसे मानिक बच्छावत का कमाल कहिए कि इन्हीं विवशता, विफलता, वीभत्सता से मनुष्य की मुक्ति का रास्ता भी निकाल लाते दिखाई देते हैं। ये कविताएँ व्यवस्था के विरोध में पूरी मज़बूती से खड़ी भी दिखाई देती हैं। और सिर्फ़ दुःख नहीं गढ़तीं। यह जो पूँजीवादी संस्कृति का राक्षस रोज़ आम आदमी का लहू माँगता है, इस राक्षस के गहरे भीतर जाकर मानिक बच्छावत वार भी करते दिखाई देते हैं जोकि हर कवि का दायित्व है। संग्रह की ‘फेलू दा और कॉफ़ी हाउस’, ‘सपना राय’, ‘शुभ्रा दास सड़क पर’, ‘लक्खी की रेज़गारी’, ‘बाउल गायक निमाई’, ‘बहूबाज़ार की रसूलन’, ‘ननीगोपाल कालीघाट का’, ‘पेशेवालियाँ’, ‘मोची’, ‘कविता लिखने का मौक़ा’, ‘पारोमिता की कथा’, ‘रोटी बेचती औरत’, ‘बंदर नाच’, ‘सैयदशाली लेन पर स्कूल’, ‘मरे हुए आदमी की माँ’, ‘भीड़ में रहना’, ‘रामधनी का ठेला’, ‘फुटबॉल’, ‘सड़क पर ज़िंदगी’ आदि कविताएँ मानिक बच्छावत के जीवन को देखने-परखने के अनूठे अनुभव को प्रकट करती हैं। मानिक बच्छावत की जो बड़ी ख़ासियत है, यह है कि वे घर से जब बाहर निकलते हैं तो आपसे बातचीत करते हुए भी उनकी नज़रें उन आदमियों पर रहती हैं, जो लगातार जीवन-संघर्ष करते हुए सरकार के अच्छे दिनों का नक़ाब उतारने में लगे होते हैं। ये वे जनता-जनार्दन हैं, जो अपने श्रम से, अपने श्रमिक जीवन से सबको लाभांवित तो करते हैं, लेकिन ख़ुद अभाव की खाई तरफ़ हर पल बढ़ रहे होते हैं। मानिक बच्छावत ऐसे श्रमिकों को एक नई आवाज़, एक नई मशाल, एक नई सच्चाई, एक नई जद्दोजहद, एक नई डगर देना चाहते हैं, जो उनके नए सफ़र में काम आएँ। इसलिए कि मानिक बच्छावत की कविताएँ पराजित और हारे हुए आदमी की कविताएँ होने के साथ-साथ उन आदमियों की भी कविताएँ हैं, जो अपनी पराजय और हार को जीत में बदलते दिखाई देते हैं। इसलिए कि मानिक बच्छावत का मानना यही है कि जो सपनों को मरते देखते हैं, वे ही अपने मरे हुए सपनों को जीवित करने का हुनर भी रखते हैं :

भोर होते ही खड़ा होता है निमाई

नहा-धोकर अपनी मिरजई पहन

चंदन के टीकों से लेपता है कपाल

गले पर नाक पर बाँहों पर लगाता है टीके

निकल पड़ता है अपना एकतारा ले(‘बाउल गायक निमाई’/पृ.38)।

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सड़क पर ज़िंदगी(कविता-संग्रह)/ कवि : मानिक बच्छावत/ प्रकाशक : समकालीन सृजन, 20, बालमुकुंद मक्कर रोड, कोलकाता-700 007/  मूल्य : ₹150

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