मनीष कुमार ‘मुसाफिर’ की एक ग़ज़ल

हरेक दर्द से अब तो गुजर जाना है
करके खुद से वादा मुकर जाना है ।

जानते है कि जख्म जीने नही देंगे
दर्दे जिगर में थोड़ा उतर जाना है ।

जीने के बहाने कब तक ढूंढते फिरे
मौत आयेगी और हमें मर जाना है ।

क्या जानेगा बेदर्द जमाना कोई दर्द
अपने दर्द से थोड़ा संवर जाना है ।

अपनी मौत हम खुद मरना चाहेंगे
जीकर दो पल फिर ठहर जाना है ।

जिंदगी और मौत तो बस एक खेल
बनके खिलौना हमें बिखर जाना है ।

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