डॉ मंजुला श्रीवास्तव के दो गीत

नारी की पीड़ा

पुरुष भला कैसे कह सकते
लुटी   अस्मिता   की   पीड़ा
पुरुष भला कैसे सह सकते
सही   निर्भया  ने जो  पीड़ा

नारी तो है शक्ति स्वरूपा
श्रम से कभी न घबराती
असह्य वेदना सहे प्रसव की
शिकन न चेहरे पे आती

ममता प्यार का  शक्तिस्रोत
अविरल निर्झर  है बहता
मृदुल-हास  मुखमंडल  पे
दिन रैन कार्य जैसे  क्रीड़ा

जब  बलात् एनारी  का तन
वस्तु   समझ  लूटा  जाता
रोती कलपती तड़पे आत्मा
घाव  कभी  ना  भर  पाता

बिच्छू से शतगुना विषभरा
दंश   सदा  डसता   रहता
ताउम्र रहे तन जिंदा लाश
मन को कुतरे वहशी कीड़ा

जिस दिन पुरुष समझ जाएगा
दुष्कृत्य   नहीं    कर    पाएगा
मानव रूप  त्यागकर  उसको
पशु     रूप      ना     भाएगा

तन  है  मंदिर  आत्मा  ईश्वर
नारी    ही   है    जग    सृष्टा
जन्मदात्री   सा   मान   करो
यही   है  हर  नारी की  पीड़ा

प्रिय मैं तुमको प्यार करूँ

प्रियतम तुम  मेरा संचित धन तुमसे आँखें चार करूँ
रंग-रंग के रंग लगा के   होली  का त्योहार करूँ

तुम बसंत बनके प्रिय मेरे  उर आँगन में छा जाओ
मैं पलाश की रक्तिम कलिका बनके तुमको प्यार करूँ

तुम  मेरे  मन के  मधुबन में  भँवरा बनके आ जाओ
मैं  फूलों  की  बगिया  बनकर  सजना  इंतज़ार  करूँ

तुम पुरवैया पवन से प्रिय मेरे तन मन को दुलराओ
मैं  सरसों  की  पीली  चूनर बन इज़हार करूँ

प्राण प्रिये तुम मेरा  विस्तृत नीला नभ बनकर दमको
मैं धरती बनकर बहार सी नख शिख तक श्रृंगार करूँ

तुम पर्वत बनके सजनाजी  जीवन का आधार बनो
मैं गोरी अल्हड़ नदिया बन चपला चंचल धार करूँ

वसुन्धरा के गगन चूमते  तुम  हरियाले  वृक्ष बनो
मैं कोमल नाजुक लतिका सी तुमको अंगीकार करूँ

कान्हा बनके प्रिय तुम  मेरे अंग अग को रंग दो ना

बरसाने की राधा बन मैं आकंठ डूब अभिसार करूँ

 


डॉ मंजुला श्रीवास्तव
जन्म__जबलपुर
शिक्षा__ एम ए  (व्यावहारिक मनोविग्यान) ,हिन्दी,  इतिहास पीएच डी  नैदानिक मनोविग्यान
रचना संसार__  कविताएँ ,गीत,कहानी ,नाटक
प्रकाशन__ सप्तक  चार एवं सात ,पत्र पत्रिकाओं ,आकाशवांणी
सम्मान_ विभिन्न साहित्यिक,सांस्कृतिक संस्थाओं से सम्मान

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1 Response

  1. Rishabh Jain says:

    आज के परिवेश में जो नारी जाति के साथ हो रहा है, इन सब की पीड़ा मेरे अंतर्मन को झकजोरती है |
    नारी को ही हमेशा से सब कुछ सहना पड़ता है, यधपि मैं जानता हूँ की नारी का दुःख इन सब से बहुत बड़ा है फिर भी मैंने मेरी पीड़ा को कहने की कोशिश की है |

    कभी श्रापित अहिल्या सी पत्थर बन जाती है
    कभी हरण होकर सीता सी बियोग पाती है
    कभी भरी सभा में अपमानित की जाती है
    कभी बेआबरू कर अस्मत लूटी जाती है

    कभी बाबुल की पगड़ी के मान के खातिर
    अपने सारे अरमानो की अर्थी सजाती है
    कभी सावित्री सी पति के प्राण के खातिर
    बिना समझे बिना बुझे यम से लड़ जाती है

    कभी कर्त्तव्यविमूढ पन्ना धाय बन जाती है
    कैसी भी हो बिपदा कैसा भी संकट हो
    अपने परिवार की ढाल बन जाती है
    ये नारी शक्ति है जो इतना कुछ सह जाती है

    ऋषभ जैन “आदि”

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