डॉ मंजुला श्रीवास्तव के दो गीत

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1 Response

  1. Rishabh Jain says:

    आज के परिवेश में जो नारी जाति के साथ हो रहा है, इन सब की पीड़ा मेरे अंतर्मन को झकजोरती है |
    नारी को ही हमेशा से सब कुछ सहना पड़ता है, यधपि मैं जानता हूँ की नारी का दुःख इन सब से बहुत बड़ा है फिर भी मैंने मेरी पीड़ा को कहने की कोशिश की है |

    कभी श्रापित अहिल्या सी पत्थर बन जाती है
    कभी हरण होकर सीता सी बियोग पाती है
    कभी भरी सभा में अपमानित की जाती है
    कभी बेआबरू कर अस्मत लूटी जाती है

    कभी बाबुल की पगड़ी के मान के खातिर
    अपने सारे अरमानो की अर्थी सजाती है
    कभी सावित्री सी पति के प्राण के खातिर
    बिना समझे बिना बुझे यम से लड़ जाती है

    कभी कर्त्तव्यविमूढ पन्ना धाय बन जाती है
    कैसी भी हो बिपदा कैसा भी संकट हो
    अपने परिवार की ढाल बन जाती है
    ये नारी शक्ति है जो इतना कुछ सह जाती है

    ऋषभ जैन “आदि”

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