मनोज कुमार झा की कविता ‘घर नहीं है’

जिसका कोई घर नहीं

उसका भी होता है एक घर

 

लाखों बरस पहले

इंसान ने बनाया घर

गुफाओं, कंदराओं में

और चित्रांकित कर दिया

 

इस इक्कीसवीं सदी में

जब न जाने कैसे-कैसे हैं घर

इंडिया में

‘एंटीलिया’…

 

धर्मराज युधिष्ठिर से लेकर शाहजहां, रंगीलेशाह

और अब आधुनिक शासकों की दिल्ली में

 

लाखों इंसानों ने

न जाने

कहां-कहां

बना रखे हैं घर

आसमां तले

सड़क किनारे

गंदे नालों के आस-पास

वीरान मैदानों में

जमुना किनारे

 

चीथड़े लपेटे

फटी-पुरानी कंबलों में

माटी तन ढांपे

बर्फ़ीली रातें गुज़ार

सवेरा होने सो पहले

उठ कर खड़े हो जाते हैं लाखों इंसान

जीते-जागते

 

इलेक्ट्रॉनिक मीडिया दिखाता है ये सब ‘लाइव’

पर बिकता नहीं

बिकता है ‘बिग बॉस’

बिकते हैं सलमान खान – ‘दबंग’

‘हीरोइन’

‘रेडी’ और ‘तैयार’ रहती है

‘मिसकॉल’ पर फंसने के लिए

‘तंदूरी मुर्गी’ बनी कहती है-

‘चबा लो मुझे…’

 

और एक गैंगरेप से

देश में कोहराम मच जाता है…

 

पक्षी घोसला बनाते हैं

बंदर पेड़ों पर उछल-कूद करते रह जाते हैं

सियारों, भेड़ियों के घर नहीं होते

 

आदमी ने बनाया घर

और आदमी ने ही आदमी से

छीना उसका घर

 

फ़िर भी आदमी

जहां रहता है

वहीं बन जाता है उसका घर –

जंगल, सड़क, फुटपाथ,

ईंट-भट्ठों पर

कच्ची ईंटों से बना….

वह भी तो एक घर ही है

 

वहां भी एक लड़की ने

पिछली दिवाली पे

रंगोली बनाई थी

सपने संजोए थे

कैलेंडर टांगा था –

लक्ष्मी-गणेश का

दीये भी जलाए थे

पर वह घर

अब घर नहीं है

 

मुंह-अंधेरे नीम-तारीकी में

ख़ून रिस कर बह गया

मिट्टी पर काला-सा धब्बा है

इक चीख भी दबी-घुटी

और जो घर था

अब घर नहीं है

 

कहां है घर

ग़ालिब ने कहा है-

‘बे-दरो-दीवार का इक घर बनाया चाहिए

हमसफ़र कोई न हो और पासबां कोई न हो।’

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2 Responses

  1. Ranjana prakash says:

    ,,,,,. .,.,, ,,.nishabd.

  2. satyadeo jangid says:

    बधाई, बहुत खूब…

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