मनोज कुमार झा की पांच कविताएं

एक

सिर्फ़ ध्वनि की
स्मृतियों में
एकाकी
है तेरी तलाश
अनन्त अबूझ
प्रेम।
दो

जब खाना नहीं मिलेगा
नून तेल भात रोटी तो छोड़ो
माटी को कोड़ोगे तो मूस भी नहीं मिलेगा

केकड़ा बेंग भर-भर जाँघ पानी में
डोड़वाँ साँप भी नहीं मिलेगा

खेत में जब कुछ जन्मेगा ही नहीं
करोगे क्या खाओगे क्या
पेड़ पर पात नहीं रहेगा
घास भी नहीं कि जानवर की तरह चबा
पेट का दोजख़ भर लो

अब उसी समय को देखो
उसी की चिंता करो
पहले तो महुआ से ही पेट भर जाता था
और नोनी साग से
अब महुए के पेड़ तो रहे नहीं
अब आम की गुठलियाँ कहाँ हैं जमा
किस भँडार में जो उन्हें फोड़ कर
उसे पीस कर आटा बना उसकी रोटी खाते थे
नोनिया साग से

अब माटी कोड़ने पर मूस नहीं निकलेगा
कि आग में पका के झटपट खा लोगे

माटी में साल्फिट घुल गया जहर माहुर
अब अकाल में विलायती दूध आना बंद हो गया
अमरिकवा से; अब यहाँ से रस्ता नापो
बाल-बच्चे सहित जाओ कहीं और वहाँ
माटी कोड़ो पत्थर फोड़ो

तीन

रात में भी पेड़ जागता ही रहता है

वह अकेला अँधेरे और
आसमान से बातें करता है

कई बार जब नींद नहीं आती
मैं रातों में पेड़ के क़रीब चला जाता हूँ
उसे जागता हुआ पाता हूँ

पेड़ नहीं बदला
वैसा का वैसा ही है मेरे बचपन का साथी
वह भी यहाँ अकेला हो गया है

पर उसकी गंध तो वैसी की वैसी ही है
उसमें रची-बसी तुम्हारी ही ख़ुशबू है
तुम्हारी यादों की
मेरे भविष्य का आधार है

बहुत कोमल स्वर में पेड़ करता है
मुझसे बातचीत
मेरा हाल तुम्हारा पता पूछता है !

चार

उन्हें किसी का प्रेम नहीं मिला था
वो छली गई स्त्रियाँ थीं

उनका जीवन यूँ ही बीतता चला जा रहा था
अब और उन्हें कोई उम्मीद भी नहीं थी

उनके पास घरबार था
और बेघर भी थीं वो
परिवार था और वैसे तो कुछ भी नहीं था
कहने को था बहुत कुछ
असलियत में क्या था

रीता हुआ रीतता जीवन था
एक धोखा था जो उन पर हावी था
और निविड़ शून्य था
कोई प्रमाद नहीं था

पांच

जल गई
गल गई

किस बियाबान में
खो गई

छोड़ गई शरीर
जो तुम्हारे पास है
तुम्हारी ज़रूरतों के लिए

एक शरीर !

You may also like...

Leave a Reply