मनोज शर्मा की छह कविताएं

मोम

ज़िन्दगी मोम सी
जलती रही
पिघलती रही
हर पल
इक नया रूप लिए
बनती रही
बिखरती रही
नयी अनुभूति सी
हर एक क्षण
हर दिशा में
एक जीजिविषा लिए
जिन्दगी बदलती रही
निखरती  रही
एक आकार बना लिया
जिन्दगी ने अब
मोम की तरह
क्षय होकर
स्वयं को नया रूप दिया
और यों ही जलती रही
ढलती रही
मोम बह गया अब
जिन्दगी भी थम गयी

चेहरा

दरवाजे के पीछे
खड़ा ठिठुर रहा था
वही सलवटों भरा चेहरा
जो अक्सर मेरे अन्दर रहता था
कभी देखा था
मैंने उसे
सिरहाने बिस्तर के मेरे
संग था वो
एक साये की तरह
टूटा विचार
अधरों में बसा था
एक चुप्पी लिए
स्वयं में रच बस
ह्रदय में मर्म
एवम्
रफ्त लिए
एक होकर
छिप गया
उसी दरवाजों के पीछे
जहां मैं अब
पूर्णतयाः
भंग हो गया
स्थिर
नपुंसक सा
यूहीं ठिठुर रहा
सदियों से

रंगमंच

एक मंच
कुछ कलाकार
आकृति,रंगीन
पर्दे,दीवारें,लाइट्स
ध्वनि
एवम् मूक कला
सामने कुर्सियों से
आज रूबरू हुई
अधर में अटका
शब्द
रह रह के निकलता
अन्तर्मन से
बीच बीच में
कुछ अभिनय,
मनःस्थिति
हवा में लहराते हाथ
बोलती आंखें
ताकती नज़रें
नेपथ्य
शान्ति हर ओर
मध्यांतर
पुनः
कुछ बातें
पाॅपकाॅर्न
कुर्सी की अदला बदली
गहन अंधकार
से गुजरता
एक गहरा
अट्टहास
चीखता बिलखता
अभिनय
एक लोकगीत
और खंजड़ी बजाते
पात्र
मधुर मुस्कान
ह्रदयों में उतर गये
क्या यही
रंगमंच है
हां शायद यही
रंगमंच है।

छलछद्म

मैं नेत्रहीन नहीं
आंखे मूंदे बैठा हूं
मैं भी अवगत था
सत्य से
पर विवश रहा
सदा
अन्तर्मन  मेरा
क्या मिलेगा व्यर्थ में
लड़ने से
समस्त भारत के लिए
कुछ  करने से
विदित था सब मुझे
मृत्यु तो मेरी ही होगी
अंत भी ही मेरा होगा
और शेष सभी विजयी होंगे
यहां
यों ही मरने से तो
रक्त ही बहेगा
पीड़ा ही मिलेगी
नहीं नहीं नहीं
मैं मूढ़ नहीं
इस धर्मक्षेत्र में
या कर्मक्षेत्र में
मैं मर ही नहीं सकता
निस्वार्थ
क्यों मैं कुछ करू
मैं भयभीत हूं
और रहूंगा अब यों ही सदा
निसंदेह
मैं जीवित तो रहूंगा
सदा  ,हमेशा आह!
वीरों में न सही
कायरो में ही सही
स्मरण तो मेरा भी होगा
आजाद भारत में

कायर

दरवाजे पर आहट हुई
अधखुला दरवाजा खुला
परिचित सामने खड़ा
आस्तिन चढ़ाए
पैर पटकता लौट गया
बोलकर कुछ
अनसुने,अनकहे शब्द
एक चुप्पी
और गहरा
अट्टहास
स्मरण था मुझे सब
कि  सत्य
अकस्मात् ही लौटेगा
कटु  सत्य लिए
एक दिन
मैं हारा सिपाही सा
भागा था बिन
समर किये
उस दिन
जब वीरों ने
ललकारा था
और हम दास थे
गुलाम भारत के

परछाई

रोशनी को चीर
वही आकृति
सहसा निकल गयी
दरवाजों के मध्य और
कहीं पीछे भी
एक परछाई सी
फिर खिल उठी
कुछ धुंधली चांदनी सी
एक घना कोहरा
स्वयं को असहज दर्शाता
शून्य
वहां घर कर गया
हर ओर टटोलते हुए
कुछ अनकहे टूटे
शब्द
एक और लम्बी खामोशी
यहां ठहरी
कभी रही थी संग मेरे
मेरे अन्तर्मन में
डूब कर
टूट कर
एक हो चले थे
दो से हम
जब
मैं और मेरी परछाई ।

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