मनोज शर्मा की 2 कविताएं

मनोज शर्मा

एक

मेरा स्थिर समर्पण
साध लो तुम
अब नयी सुबह
नया आगमन
कारवां लिए
बढ़ चले
अब तुम बूंद नहीं
वरन
सतत् सत्य हो
अनल से दहकते
कर्मपथ पर
बढ़ चलो तुम
हर कदम
राह से जोड़ता है
तुम अस्थिर हो
असहज हो
रुको न!
दूर कहीं क्षितिज
नहीं
प्रथम रण है
जहां
विजय है तेरी
निःसन्देह
मेरा समर्पण
व्यर्थ नहीं
प्रेम है स्नेह हैं
तुम बढ़ चलो
कर्म अभी शेष है

दो

रोज भीत को देखता हूं
जिज्ञासावश
विवश हो जाता हूं
देखकर
उतरती भीत की परते
सालती दीवार
कमतर कर देती  हैं
मौन हूं
भयभीत हो
फिर एकटक बंध जाता हूं
उसी भीत में
सदियों से खड़ी भीत
कभी रोकती
कभी ठहरती
जर्जर हो चली
मैले कुचैले
ठिठकते बिचार
सलवटे झांककर
रोज उभर जाती है
सिहर उठती है
स्वयं में
पुराने स्वप्नों से
रोज व्यक्त नहीं होते
कालांतर से
भयभीत
पुर्ववत तुम
वहीं पहले से
स्तब्ध

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