मनोज शर्मा की चार कविताएं

वो बात

शाम बीती
युग बीत चला
कहीं पीछे कुछ छूट चला
क्या बात  थी
रह रह के सताती रही
मैं टूटता रहा
हर पल यूहीं
क्षीण किया
मेरी पहचान को
मैं टूटा तारा सा
एक नभ गगन
की टोह में
क्रंदन करता रहा

हम तुम

हम साथ रहे
जीवन के
पथ पर
एक किनारा बना
महीन सी
इच्छाएं
दमन कर
नापती रही
बीनती रही
ढूंढती रही
स्वयं
कोहरे में सिमट
एक प्रतिबिम्ब
आगे बढ़ता गया
जीवन के अदभुत मोड़ पर
गूंज गयी
तेरी आहत
मेरे संग यूंही
गूंजती रही
एक मुहाने पर
मैली कुचैली मिट्टी
संग
वो अनमोल क्षण
यूंही बीत चले
और स्थिर रहे
हम तुम

वो स्मृति

वो स्मृति
अब स्थिर हुई
एक करूणा थी
उस बोली में
तुम्हारी
जब तुमने पुकारा था कभी
पहले पहल
एक घने मेघ से
घुमड़ घुमड़
चले आते थे
नित बिन बरसे
मुस्कान भर
ह्रदय में उतर जाते थे
और स्मरण करो
प्रिये
करपाश किये थे
उस रोज जब
स्वयं को
खो दिया था
तुझमें,मुझमें
नहीं रहा था
अन्तर
सब
एक सा हो
चला था
और दो नहीं
बस एक ही हो गये थे
क्षितिज से
हम तुम
एक सिहरन संग
आज
हम संग नही
बस आधार बना
उसी
करूण स्मृति में
जीते हैं।
रेखाएं
आज सुबह सुबह
मेरी कलम ने
एक मैले कुचैले
काग़ज़ पर
कुछ उलटी सीधी रेखाएं
खींच डाली
अर्थहीन और
विषयरहित सा
कुछ रच गया
इस काग़ज़ पर
किंतु!
ये क्या
आड़ी तिरछी
अस्पष्ट रेखाएं
गहन सा अर्थ लिए
ह्रदयों में उतर गयी
पुनः !
असहज सा रहा
अपने कर्म पर
जो निरर्थक रेखाएं
थी कभी
बिना किसी आश्य
सर्वजन में निखर गयी
कालांतर से
मैं ही मूढ़ रहा
और अनभिज्ञ भी
यहां तो हर रेखा
बहुत कुछ
बोलती है
यहां कुछ ग़लत नहीं
बेअर्थ जुबान भी रंग
घोलती है
ज्ञान अज्ञान से
परे यहां
सब एकसमान है
बेअसर कोई नहीं
यहां तो सभी
विद्वान है।
———
मनोज शर्मा
एम.ए.हिन्दी,
उर्दू (अध्ययन)
किरोड़ीमल काॅलेज
दिल्ली विश्वविद्यालय
सी-73,बादली एक्स.
दिल्ली-110042
9868310402
mannufeb22@gmail.com

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3 Responses

  1. Neelam says:

    हमेशा की तरह बेमिसाल लिखा मनोज जी भावों के गहन समंदर में डुबती उतरती कविता

  2. VANDANA SHARMA says:

    WOW ,Manoj Ji, Nice poem ,Bhut achha likhte ho aap

    • Manoj sharma says:

      शुक्रिया, मेरी कुछ और कविताएं और कहानी एवम् लेख लिटर्चर प्वाइंट पर है।

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