मनोज चौहान की तीन कविताएं

ऐ कविता

 

दस्तक देना तुम कभी

ऐ कविता

दिनभर कमर तोड़ चुके

ईंट-भठ्ठे के मजदूरों की

उन बास छोड़ती झुग्गियों में

बीड़ी के धुंएं और

सस्ते देशी ठर्रे के घूंट पीकर

जो चाहते हैं मिटा देना

थकान और चिंताओं को

व भीतर उपजती वेदना को भी

और बुनते हैं सपनों का ताना

बच्चों के उज्ज्वल भविष्य का .

 

महसूस करना तुम

देश की सरहद पर

दुश्मन की गोली खाए

सूरमा के अंतिम क्षणों में

उसकी आँखों में उभर आये दर्द को

जिनमें बन रहा है अक्स

माँ – बाप, बहन, बेटी

और उसकी अर्धांगिनी का ।

 

तुम जाना धीरे से दबे पांव

उन खेतों में

जहाँ टन-टन की आवाज करती

बैलों के गले में बंधी घंटियाँ

और हल के फाल से

जुतते खेतों में

पसीने से भीगा गमछा निचोड़ता किसान

रोप रहा है

उम्मीदों की फसल ।

 

देखना कभी नजदीक जाकर

उस पहाड़ी औरत के हौसले को

जब वो खिंचती है झूले को

निडरता और आत्मविश्वास से

और पार कर जाती है

उफनती नदी को ।

 

सुनना कभी वह करुण पुकार

जो कर दी गई है अनसुनी

रखना तुम मरहम

किसी शोषित के घावों पर

बन जाना तुम

एक भारी – भरकम हथौड़ा

जो तोड़ दे दीवारें

असमानता की ।

 

अपने शब्दों से तुम

पैदा करना तीक्ष्ण स्वर

मंदिर में फूंक भरे

किसी शंख की तरह

या फिर मस्जिद से गूंज रही

अजान सी हो जाना तुम

जो जगा दे आदमियत को

मजहबी मलिनता की नींद से ।

 

तुम हो जाना

वह पखेरू

जो लाँघ दे सरहदों को

सूरज और चाँद जिस तरह

सांझे हैं समस्त जगत के

ठीक वैसे ही तुम भी

सबकी हो जाना

ऐ कविता ।

 

कटघरे में पिता

दूसरी बेटी के

पैदा होने पर

उमड़ आया है सैलाब

औपचारिकतावश

ढाढस और सांत्वनाओं का

 

समाज की रुग्ण सोच

और अजीबोगरीब मनोविज्ञान

हो रहा है प्रतिबिंबित

यकीनन

यह तजुर्बा नया है

दम्पति के लिए

 

सामाजिक रुग्णता के

इस संक्रमण से

अछूती नहीं रह पाई है

निर्दोष प्रसूता पत्नी

 

नम आँखों से

चेहरे पर मुस्कान लाए

प्रश्नसूचक नज़रें गड़ाए

होना चाहती है आश्वस्त

कहीं मलाल तो नहीं आपको

दूसरी बेटी होने का ?

 

कटघरे में घिरा

पाता है वह खुद को

मुस्कुरा देता है धीमे से

यह मुस्कान

बनावट रहित है

और परिपूर्ण भी

मगर पर्याप्त नहीं

शायद

आश्वासन की कसौटी पर

 

उठता है ज्वारभाटा

उसके अंतस में

बहती नदी के

अंतिम छोर तक

 

वह चाहता है

मुक्त कर देना

समाज को

इस बीमार मानसिकता की

परिधि से

 

ताकि दुबारा

सवालों के

कटघरे में

खड़ा न किया जा सके

किसी भी

बेटी के पिता को !

 

कबाड़ उठाती लड़कियाँ    

 पाचं – छः जन के

समूह में

जा रही हैं वे लड़कियाँ

राष्ट्रीय राजमार्ग के एक ओर

रंग बिरंगे, पुराने से

कपड़े पहने

जो कि धुले होंगे

महीनों पहले

उनके किसी त्यौहार पर

 

पावों में अलग – अलग

चप्पल पहने

दिख जाती हैं पैरों की

बिबाइयां सहज ही

उन के हाथों में हैं

राशन वाली किसी दुकान से खाली हुई

सफेद बोरियां

 

राजमार्ग पर चलते हुए

जब दिख जाती है उन्हें

किसी गोलगप्पे

या चाट वाले की रेहड़ी पर

उमड़ी भीड़

तो चल पड़ते हैं उनके कदम

स्वतः ही उस ओर

अपनी जिव्हा का स्वाद

मिटाने नहीं

बल्कि खाली पड़ी किसी

पानी या कोल्ड ड्रिंक की बोतल

या इसी तरह के किसी

दुसरे सामान की

आस में

 

ये लडकियां किशोरियां हैं

सत्रह – अठरह बर्ष के करीब की

सड़क के एक ओर चलते

मिल ही जाती हैं सुनने को

किसी ट्रक ड्राइवर की फब्तियां

या मोटर साइकिल पर जाते

मनचलों के बोल

जिन्हें कर देती हैं वे अनसुना

याद कर

पारिवारिक जरूरतों की

प्राथमिकताओं को ।

 

चहक उठती हैं वे

शैक्षणिक भ्रमण पर निकली

उस बस को देखकर

जिसमें बैठीं हैं

उनकी ही उम्र की छात्राएं

जो हिला देती हैं हाथ

उन्हें देखकर

अभिवादन स्वरुप

 

क्या उन्हें नहीं होगा शौक

बन – संवरकर

अच्छा दिखने का

या किसी महंगे मोबाइल से

सेल्फी खींचने का ?

 

वे कबाड़ उठातीं लडकियां

चिढ़ाती हैं

आज भी

इकीसवीं सदी के विकास को

और साथ ही

प्रति व्यक्ति आय में हुए

इजाफा दर्शाने वाले

अर्थशास्त्रियों के आंकड़ों को

और संविधान के उन

अनुच्छेदों को भी

जिनमें दर्ज हैं

उनको न मिल सके

कई मौलिक अधिकार

 

वे मेहनतकश बेटियाँ हैं

अपने माँ – बाप के आँगन में खिले

सुंदर फूल हैं

जिम्मेदारियां उठाकर

परिवार का भरण – पोषण करते हुए

जो बन गई हैं माताओं की तरह

इस उम्र में ही

और जूझ रही हैं

मूलभूत आवश्यकताओं की

उहापोह में

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मनोज चौहान, एसजेवीएन कॉलोनी दत्तनगर, रामपुरबुशहर, शिमला(हि.प्र.)- 172001, मोबाइल 09418036526,09857616326, ई–मेल: mc.mahadev@gmail.com

 

 

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