मनु स्वामी की दस कविताएं

पहाड़
गोमुख तक जा पहुँचा है शहर
दरकने लगे हैं घबराकर पहाड़।
* * * * *
बसन्त भी लौट रहा है
क्या पहाड़ भेजेंगे ठंडी हवा?
वे तो खुद तप रहे हैं
नंगे होकर।
* * * * *
नमकीन लगा इस बार
गंगा का स्वाद
रो तो नहीं रहे हैं पहाड़?

सृजन
फिर धमाका
फिर खिली धूप
फिर दिखी
चोच में तिनका दबाए
चिड़िया।

बदलाव
लहू में गरमाहट
मुट्ठी में कसावट
हरदम रहे
मौसम
जरूर बदलेगा।

एक शाम
आकाश की देह पर
उलट गया है
कलरपाॅट।

दावत
लगन की दावत के व्यंजन
आँखों से चख रहे हैं
नुक्कड़ पर खड़े बच्चे।

मेजबान की आँखों में
रड़क रहे हैं बच्चे।

गालियों के साथ
काॅलर पकड़कर
फेंक दिया जाता है
कनात के पीछे से
खाने की मेज तक
जा पहुँचा बच्चा।

आखिरी लमहों में
आँख चुराकर दो बच्चे
पहुँच जाते हैं
सलाद की मेज तक
मुट्ठी में दबाकर
मूली के चंदे
दौड़ पड़ते हैं
ओलम्पियन की तरह।

चमकती आँखों के साथ
नुक्कड़ पर मिल-बाँटकर
खा रहे हैं बच्चे
मूली के चंदे।

मंत्रोच्चार के साथ
टीका होते ही
ढोल पर थिरक रहे हैं
आँखों से संवाद करते
लड़के-लड़कियाँ
और नुक्कड़ पर झूम रहे हैं
देवी और देवता।

शैतान
जिनके ठेंगे पर है
संयुक्त राष्ट्र संघ
वे रौंदते हैं सभ्यताएँ।

न्यायाधीशी मुद्रा में
निकलते हैं उनके गिरोह
एक हाथ में तेजाब
दूसरे हाथ में मरहम लेकर।

ठंडा चूल्हा
कोहरे की बुक्कल मारे हुए
सूरज का मखौल उड़ाता
बर्फीले नाले में खड़ा बच्चा
‘झूम बराबर झूम’ गुनगुनाता
तलाश रहा है कचरा।

कहीं भी, कैसी भी गंदगी हो
सितारवादक-सी सधी उँगलियों से ये
तलाश लेते हैं अपनी जरूरत।

दिन ढले
बीस-तीस रुपये लिये
घर लौटने पर इन्हें
न जाने कैसी नजर से देखती है माँ
और गरमाहट से भरने लगता है
ठंडा चूल्हा।

प्रेमपत्र
चाँद को भी
उपनिवेश बनाने की
फिराक में हैं वे
मैं जुटा रहा हूँ साहस
लिखने को तुम्हें प्रेमपत्र।

जिनके होठों पर शास्त्र
और हाथों में हैं शस्त्र
वे कर रहे हैं धरती को बदरंग
मैं सहेज रहा हूँ पैन और कागज
लिखने को तुम्हें प्रेमपत्र।
और मारक हाथियारों के अनुसंधान में
व्यस्त है दुनिया
मैं तलाश रहा हूँ शब्द
लिखने को तुम्हें प्रेमपत्र।

कोशिशों के बाद भी मैं
लिख न सका तुम्हें प्रेमपत्र
शायद प्रेम व्यक्त करने में
निरीह हैं शब्द।

चलो हाथों में लेकर तुम्हारा हाथ
पढ़ूँगा तुम्हारा मौन
फिर लिखूँगा तुम्हें प्रेमपत्र।

सुबह
सद्यस्नाता तुमने
बालों को झटकाया
तुम्हारे चेहरे पर ठहरने को
मचलने लगे जलबिन्दु।

हिनहिनाने लगा
सूरज का सातवाँ घोड़ा
और सुबह हो गयी।

शब्द
झील में चाँद मुस्कराया है
बहुत दिनों के बाद
झिलमिलाती चूनर ओढ़ी है
आकाश ने
लाल गुलाब खिले हैं
मनस् में
मादक गंध कर रही है
बेसुध
नहीं रखना है हमें
आज समय का हिसाब
गति बदलती होगी
आज तुझे ऐ चाँद
सदियों से बीते दिनों के बाद
फिर मेरे साथ हैं
आज मेरे शब्द।

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46-अहाता औलिया, मुजफ्फरनगर-251002 (उ0प्र0)