मार्टिन जॉन की पांच कविताएं

 बची रहे चिड़िया   

चख रही है चिड़िया

खिला रही है बच्चों को पेड़ के पके –अधपके फल

तृप्ति का मधुर गीत गाते हुए

अपनी हरी –भरी बाहों से संभाले फलों की टोकरी

गुनगुना रहा है पेड़  क़ुर्बानी वाली कविता

मौन रहकर

सबकुछ लुटा देने का ज़ज्बा दिखाते हुए |

 

पेड़ के फल न खाए जाने का मेरा दुःख

कितना छोटा हो गया है

जैसे बालू का कण

चिड़ियों को खिलाये जाने का सुख

कितना बड़ा हो गया है

जैसे पर्वत हिमालय |

 

हम रहें न रहें

बचा रहे पेड़ और बची रहे चिड़िया !

 

दर्द   

पेड़ जब कटता है

रोता है ज़रूर

दर्द होता है उसे

पर नियति जानता है वह अपनी

बांहों और सीने में

बस चुकी दुनिया परिंदों की

उजड़ जाने के दर्द के आगे

भूल जाता है अपना दर्द

सोचो तो ज़रा

हमारा दर्द कितना बौना है

कितना खुदगर्ज़ है

 

दुःख सुख 

उसने मेरी अंगुली पकड़ी

कहा , ‘ अब तुम्हे मेरे साथ चलना होगा |’

भारी मन लिए अनमने सा

हो लिया उसके साथ |

 

कहीं किसी रोज़

उसने अंगुली छोड़ी और

दूसरी की पकड़ ली

साथ छूटते ही यही लगा

वो बेरहम मेरा

बहुत कुछ ले भागा |

वापस आया जब

उसका दिया हुआ बहुत कुछ

इंतज़ार कर रहा था मेरा

 

पानी – पानी

बारिश में

टूटकर बरसते देखा पानी

बहते देखा आँखों से पानी

बूंद भर पानी की चाहत में

ज़िन्दगी को होते देखा पानी – पानी |

कितनों का दामन भर गया

पानी से

कितनों का पानी उतर गया

पानी से |

 

क्या बचा रहेगा ?

हमने ईश्वर बांटा

खुद को बांटा

धरती बांटी और बांटा राजा प्रजा

तय है कि आगे भी

मार्ग प्रशस्त करते हुए

चीजों के ख़त्म होने तक

हिरोशिमा , नागासाकी ,गाजापट्टी और सीरिया पर

दुःख जताते हुए

टुकड़ों में बांटते जायेंगे |

 

बंटते हुए

बांटने के लिए

क्या कुछ रह जाएगा हमारे पास ?

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