मार्टिन जॉन की दो कविताएं

मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ

 

उसने शपथ ली ,

“मैं ईश्वर की शपथ लेता हूँ ……….”

और वह राजा बन गया

 

इसके पहले मज़हबी क़िताबों की कसमें खा चुका है

कई कांडों को सरअंजाम देने के मामले में .

 

ईश्वर सर्वशक्तिमान है

ईश्वर उसे शक्ति देगा

ईश्वर उसे उर्जा देगा

ईश्वर उसे अभयदान देगा

ईश्वर की अनुकम्पा से उन सुचिंतित कामों को

अंजाम देगा जिसका रोडमैप

उसके दिमाग में है .

 

ईश्वर का रहमोंकरम बरकरार रहा तो

उसकी मुट्ठियों में होंगी अग्नि और धुंआ

और वह चाहेगा कि शहर अग्नि से रौशन हो

आसमान धुंधुवा जाये .

 

ईश्वर महान है

ईश्वर दयावान है

ईश्वर कृपालु है

उसकी कृपा से ही काले कपोतों को

आसमान में उडाएगा

पतंगबाजों को भरोसा दिलाएगा कि

उन सब की डोर उसी के अटेरन में है .

 

ईश्वर उसके साथ रहेगा

उसकी अगुवाई करेगा

अगली बार फिर शपथ लेगा ,

“ मैं ………………संविधान के प्रति सच्ची श्रद्धा और निष्ठा रखूँगा “

 

और वह दिन भी आएगा

जब राजा की आत्मा

शहर के बीचो बीच

एक विशालकाय मूर्ति में समा जाएगी

.

सिर्फ़ नब्बे ( इरोम शर्मिला के लिए )    

इक आग थी वहाँ

धुंआ धुंआ सा पसरा है राख के साथ

अंधेरों ने निवाला बना लिया

लपटों से निकली उम्मीदों की चिंगारियों को

जिन्हें छूना था आसमान

मिलकर सूरज के साथ

उजास की स्याही से लिखना था

विजय के गीत |

 

हमने आग से प्यार किया

आग की तपिश से तपतपाए ज़ज्बे को सलाम किया

खौफ़ज़दा अँधेरी रात की अंधी गलियों में

जुगनुओं का इंतज़ार किया

वक़्त की बेशर्म सितमगरी ने तुम्हे

सचमुच कितना शर्मसार किया |

 

ऐसे समय में

शहर-शहर , नगर-नगर के गली चौराहे में

राजाओं , महाराजाओं के चेहरे बोलियाँ बोल रहे थे

अंधों-बहरों की दिशाहीन भीड़ में

तुम्हारे पास न तो हाथियों का झुण्ड था

और न शाही घोड़ों का हुजूम

ढोल-नगाड़ों और जुलूस के बीच

अकेली थी तुम

कारवां बन जाने की बेरहम उम्मीद ने अंततः

अकेला ही छोड़ दिया |

 

सैकड़ों गोलियों की रक्तपिपासु गूंज

लगता है , तंत्र के उन्मादी उत्सव में गुम हो गयी

दफ़न नहीं हो पाएगी वो बर्बर गूंज

शायद कभी तुम्हारे सीने में |

 

झकझोरती रहेगी पूरे दम ख़म के साथ

नब्बे के आंकड़ों की चोट से

स्खलित होता विश्वास

सियासत के कब्रिस्तान में

धू धू कर जलती भरोसे की चिता |

 

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