मज़दूर दिवस पर पांच कवियों की कविताएं

हड़ताल  के बाद

गोपाल प्रसाद

स्व. गोपाल प्रसाद खुद मज़दूर थे। जूट मिल में मशीन चलाते थे। मशीन चलाते हाथों ने जब कलम पकड़ा तो मज़दूरों का दर्द बखूबी उभर कर सामने आया। ये कविता उनकी किताब ‘फूलों में दुपहरिया हो गया हूं’ से ली गई है।

गुल्ली-डंडा सब बंद
कुछ का ‘काठीभाजा’
थमाते हुए अपने राजा को
कहती वह-
जा बेटा जल्दी आना
तब शाम को सूरज उगेगा।

बाबा बेचारे तो हड़ताल पर हैं
और इस पड़ताल  में हैं कि
क्या होगा?
पेट के अंधेरे को दूर करने के लिए
भविष्य ‘फेरी’ करता है
लेकिन जब कभी
घर लौटने में देर करता है
तो मां की जान सूख जाती है
तोतली आवाज़ें
जब पूछती हैं एक साथ–
मां सूरज कब उगेगा?

हर घड़ी मत हलाल कर मालिक

नूर मुहम्मद ‘नूर
ये ग़ज़ल वरिष्ठ शायर-कथाकार नूर मुहम्मद ‘नूर के ग़ज़ल संग्रह ‘दूर  तक सहराओं’ में से ली गई है।

हम को हर दिन उबाल कर मालिक
हर घड़ी मत हलाल कर मालिक

तेरे  नौकर हैं, ठीक है, फिर भी
थोड़ा ढंग से सवाल कर मालिक

कल जो आंधी है, कल जो दहशत है
कल का  कुछ तो ख़्याल कर मालिक

आज जो कह दिया, क़हा लेकिन
कल से कहियो संभाल कर मालिक

मोच आ जाये ना बुलंदी में
राह चल देखभाल कर मालिक

इन अंधेरों को नूर होना है
तेरी हस्ती उछाल कर मालिक

तालाबंदी

शैलेंद्र शांत
ये कविता वरिष्ठ कवि शैलेंद्र शांत के कविता संग्रह ‘जनपथ’ से ली गई है।

एक
चिमनी के साथ-साथ
बुझती गई ज़िन्दगी

दो
सड़कें-गलियां
राशन की दुकान
सालो की जान-पहचान
हुए सारे किस्से तमाम

तीन
अपने ही लोग थे
बगल से गुजर गए

चार
था वह मनी-ऑर्डर का ठिकाना
झटके से बना बेगाना

टूटी नही है प्रतिबद्धता

नित्यानंद गायेन

ये कविता नित्यानंद गायेन  के फेसबुक वॉल से ली गई है

समय के कालचक्र में रहकर भी
टूटी नही है
कवि की प्रतिबद्धता
हौसला बुलंद है अब भी
बूढ़े बरगद की तरह

नई कोपलें फूटने लगी है फिर से
उम्मीदें जगाने के लिए
उन टूट चुके लोगों में …
कमजोर पड़ती क्रांति
फिर बुलंद होती है

कवि भूल नही पाता
अपना कर्म
कूद पड़ता है फिर से
संघर्ष की रणभूमि पर
योद्धा बनकर

तिमिर में भी लड़ता एक दीया
तूफान को ललकारता
लहरों से कहता –
आओ छुओ मुझे
या बहाकर ले जाओ
हम भी तो देखें
हिम्मत तुम्हारी ….

कविता

सत्येंद्र प्रसाद श्रीवास्तव

अपने पसीने से
धरती को सींचते किसान
अपने हथौड़े से
भविष्य को
शक्ल देते मज़दूर
हाथ रिक्शा से
बैल की तरह नधे रिक्शावाले
या
किसी भी मेहनतकश
आम आदमी से
मै जब-जब
करता हूं संवाद
बन जाती है एक कविता।

मुझे
किसान की खुरपी में
दिखती है
एक सुंदर कविता
हथौड़ा चलाते हाथ
हर चोट के साथ
रचते हैं नया गीत
रिक्शा खींचते
खुरदरे व्यक्ति की पगध्वनि से
फूटती है एक लंबी कविता।

मुझे
जब भी
पाना होता है संग
कविता का
मै
बतियाता हूं
इन मेहनतकश ईमानदार लोगों से
मैंने यहीं देखा है
आदमी को कविता
और
कविता को आदमी
में तब्दील होते।

Photo courtsey : mcnikander.com

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