मिहिर कुमार की पांच कविताएं

जिंदगी की किस्त….

वो लम्हे जो चुरा रखे हैं मैंने
तुम्हारे साथ के, तुम्हारे पास के
चंद कतरे तुम्हारी यादों के
कुछ उजाले तुम्हारी मुस्कुराहट के
जिन्हें मैंने बहुत अंदर सीने में छिपाए रखा
दुनिया की नजरों से बचाये रखा
हर सुबह मैं तुमको थोड़ा याद करता हूं
हर रोज़ जिंदगी की एक किस्त भरता हूं

कुछ ऐसे याद करता हूं
कुछ ऐसे याद करता हूं
तुम्हें अक्सर
जैसे पत्तियां पतझड़ में
शाखों से झरती हैं
जुदा होने का दरख्तों से
दुख जैसे मनाती हैं
जैसे कोई बच्चा रूठा
तरसता है मचलता है
मां के आंचल को
बेज़ार सा दिन
यूं आंखें तरेरे सूरज सा
कुछ ऐसा हाल होता है
मेरा इन दिनों
जैसे माथे से टपकता है
पसीना बूंद बनकर
मैं भीग जाता हूं
अपने पसीने में तरबतर
जब भी तुमको याद
करता हूं
कुछ ऐसे याद करता हूं
जैसे याद आता हो
बरसों पहले का
वो छूटा सा चौबारा
जहां तुलसी पर
आज भी दिया जलता है
धुंधला सा अंधेरों से
ठिठकता और लड़ता सा
मैं अक्सर तुमको
कुछ ऐसे याद करता हूं

तुम्हारी यादों के साये में…

तन्हाई की ये शामें
बहुत भारी गुजरती हैं
रातों के सन्नाटे जब
कांटों की तरह चुभते हैं
बहुत चुपके से तुम तब
आती हो यादों में मेरी
मन के किसी कोने में
टंक जाती हो दुआ बनकर
मैं चुपके से नजरें चुराकर
पोंछ लेता हूं आंखें अपनी
तुम्हारी यादों के साये में
कुछ ऐसे दिन गुजरते हैं
तुम्हारे बिना मेरा
कुछ ऐसा हाल रहता है
जैसे तपते मौसम में
कुम्हला जाए पौधा कोई
जैसे इन दिनों चुभती धूपों में
मन साये के लिए मचलता है

हर शाम …

हर शाम मेरे चेहरे पर
लिख जाती है इबारत
तुम्हारे ना होने का दुख
टंक जाता है चेहरे पर
दिन एक औऱ यूं ही
बीत जाता है
एक रात उदासी की
खामोश सुलगती सी
मेरा मन तड़पाती है
तुमसे मिलने को
यूं ही भटकती है
बेचैन सी इन रातों को
कोई नाम कभी देना
हो सके कभी तो
मेरे सन्नाटों को सुनना

अब लकीरें गहरी हो गई हैं…..

अपनी तन्हाइयों से बातें करता हूं अक्सर
आंखें बंदकर सोचता हूं चुप रह कर
बहुत अंदर कहीं तम्हारा अक्स झिलमिलाता है
तुम्हारी दिव्य आंखें जगमगाती हैं
मन के अंधेरों को रौशन कर जाती हैं
मैं पूछता हूं खुद से चुपचाप गुमसुम
कैसे जी पाया इतने दिन बिन तुम
यादों की परछाईंयों का पीछा करते
मैं दौड़ता हूं, भागता हूं, हांफता हूं
थककर वहीं कहीं रुक जाता हूं
अपनी पेशानी से पसीना पोंछता हूं
जिनपे अब लकीरें गहरी हो गई हैं

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