मिहिर कुमार की 7 कविताएं

एक

मत पूछो कि कौन हो तुम

मेरे मन का मौन हो तुम

मेरी ताकत मेरा ख्वाब हो तुम

खुशबू से भीना अहसास हो तुम

दूर हो के भी सबसे पास हो तुम

घुप्प अंधेरे में चांद बन के

मेरे मन के आसमान में

चमकती हो तुम

रात भर ओस में भीगकर

रजनीगंधा की तरह महकती हो तुम

दो

वो लम्हे जो चुरा रखे हैं मैंने

तुम्हारे साथ के, तुम्हारे पास के

चंद कतरे तुम्हारी यादों के

कुछ उजाले तुम्हारी मुस्कुराहट के

जिन्हें मैंने बहुत अंदर सीने में छिपाए रखा

दुनिया की नजरों से बचाये रखा

हर सुबह मैं तुमको थोड़ा याद करता हूं

हर रोज़ जिंदगी की एक किस्त भरता हूं

 तीन

 मेरे पास है ही क्या सिवा तुम्हारे

तुम्हारी मुस्कुराहट, तुम्हारी हंसी

आंखों की कोर में छिपी सी नमी

तुम्हारी छुअन, चंद कतरे तुम्हारी यादों के

इसके सिवा क्या पास है मेरे

गमों की अंधेरी गलियों से

जब भी गुजरता हूं

तुम्हारी याद की ताबीज से

खुद को महफूज रखता हूं

 चार

सर्द सी इन शामों की सदाएं

तुम्हें पास बुलाएं

जब दूर कहीं उस मोड़ पे

दिन के आखिरी छोर पे

छिप जाए कहीं सूरज

रस्ता भूल के घर का

बौराया भटके सूरज

उन सर्द सी शामों में

तुम यूं ही चले आना

पांच

 तुम्हारे प्यार की नरमाहट

कभी सुलाए लोरी बन कर

बचपन की मांओं जैसा

छुटपन के गांव जैसा

कभी जगाए ख्वाब दिखाए

इन जाड़ों में जब भी ठिठरूं

सर्द हवाओं से कतराऊं

तुम्हें सोच के, तुम्हें ओढ़ के

गरमाहट में मैं सो जाऊं

बचपन की मांओं जैसा

छुटपन के गांव जैसा

प्यार तुम्हारा मुझे बुलाये

मेरे सीने में बहुत गहरे कहीं

इश्क की मद्धम अलाव जलाये

 छह

 मन के जंगल में जब

यादों की एक

आंधी सी चलती है

बूढ़े से दरख्तों के

पीले से पत्ते झड़ते हैं

महुआ के पेड़ों से

फूलों की तरह टपकती तुम

दो शाखों से धूप की तरह खिलती तुम

मन मेरा बौरा जाए

जब खुशबू की तरह महकती तुम

मन मेरा मचले

जब तितली की तरह उड़ती तुम

मेरे मन के जंगल में

काश कि ऐसा हो जाए

जो छू ट गया वो वक्त

फिर से ठहर जाए

 सात

जानती हो

मेरा मन इक

आवारा कमरा है

बिस्तर पे तुम्हारी

यादें बिखरी पड़ी हैं

किताबों की तरह

मन की दीवारों पर

इक फ्रेम में टंकी है

तुम्हारी हंसी

फर्श पे

अखबारों के पन्ने

कुछ खुले

कुछ ऐसे ही

हवा के झोंको में

आवारगी से उलटते पुलटते

उन्हीं इबारतों में

सुबह के ताजा अखबार की स्याही की तरह

ताजा रहती हैं यादें तुम्हारी

हर सुबह मैं तुमको

कुछ ऐसे याद करता हूं

हर दिन जिंदगी तुम बिन

कुछ ऐसे जीता हूं

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2 Responses

  1. Richa Sakalley says:

    Arey wah Mihirji adbhut akalpniya & vishvasniya

  2. Abyaz says:

    शानदार…ज़बरदस्त…ज़िंदाबाद

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