मीनू परियानी की लघुकथा ‘माता का जगराता’

सुबह से ही कोठी में रौनक थी। नौकर-चाकर सब दौड़ रहे थे। शाम को माता का जगराता जो होने वाला था। बेटा, बहू सब अति व्यस्त। आज सुबह से माँ कुछ अस्वस्थ थी। बेटा एक बार जाकर माँ का हाल पूछ आया था। बहू तो वैसे  ही अतिव्यस्त थी।

‘माँ को भी यहाँ बैठा देंगे’ बेटे ने कहा,

‘अरे  नहीं, वो तो वैसे ही बीमार हैं। और ज्यादा तबीयत बिगड़  गई तो?

‘हाँ,  ये तो है।’  बेटे ने भी सहमति में सिर हिलाया। शाम हो आई । भजन मंडली ,गाना बजाना, माता की भेंटें –सब विधि विधान से चालू हो गया।  अंदर कमरे में माँ की तबीयत बिगड़ने लगी थी। एक दो बार सब को आवाज़ भी दी,पर बाहर के शोर में सब कुछ दब कर रह गया। जैसे जैसे रात गहराती जा रही थी, भक्तों का जोश बढ़ता जा रहा था। सभी गायक के भजनों पर झूम रहे थे, नाच रहे थे। धीरे-धीरे भोर का उजाला होने को था।  माता का जगराता पूरे  जोश के साथ सम्पन्न हो गया।  सब थक चुके थे,जोश भी ठंडा पड़ गया, और अंदर कमरे में माँ का शरीर भी ठंडा पड़ गया था,  रात भर के जगराते के बाद।


मीनू परियानी, जवाहरनगर, कोटा, राजस्थान

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