मिथिलेश कुमार राय की 3 कविताएं

मिथिलेश कुमार राय

1. दिसंबर
(कल दिसम्बर की बात छिड़ गई तो उसने कहा कि यादों में सब कैद हो जाता है यहाँ तक कि आवाजें भी हमेशा के लिए हवा में कैद होकर रह जाती हैं)

मेरी जनवरी में थोड़ी सी सर्दी है
गेंदे के कुछ फूल हैं
लाल-लाल दानों वाला
एक मजेदार फल है
मेरी जनवरी में गेहूं के नन्हें-नन्हें पौधे हैं
सरसों में आ रहे फूल हैं

मेरी जो जनवरी है
उसमें एक बच्चा है
बच्चे के होंठों पर एक निश्छल सी मुस्कान है
दिसम्बर जो अभी-अभी गुजरा है
उसमें मेरे पीछे एक वियावान था
जिसने मेरे चेहरे पर एक उदासी की परत चढ़ा दी थी
जनवरी में भी वह भय
मेरे चेहरे पर कुछ-कुछ मौजूद है

मेरा दिसम्बर कोई महीना नहीं था
वह कोई नारा था जैसे
जो अब गया तो लगता है
कि खतरा टल गया है

2. संवाद

माई प्रणाम

खुश रहो बेटी
सदा सुहागिन रहो
दूधो नहाओ पूतो फलो

चाय हो गई माई
हां बेटी, अभी-अभी
भोजन क्या अब भी देर से करती हो
क्यों करती हो
अब तो घर मे बहू है
आराम करो
खाओ-पीओ

भाभी अभी क्या कर रही हैं

बच्चे को शांत करा रही है
घर मे दो-दो बच्चे हैं
दिन भर उधम मचाए रहता है
बेचारी को चैन नहीं
फिर भी बहुत ध्यान रखती है
सुबह चार बजे जगकर
तेरे पिता के लिए चाय बनाती है
मैं जान-बूझकर बिछावन देर से छोड़ती हूँ
कि मेरी आँखों के सामने गृहस्थी सीख ले

तुम अपना सुनाओ बेटी
बच्चा सब ठीक है
और दामाद जी

यहाँ सब राजी-खुशी है माई
आशीर्वाद है तुमलोगों का
यह बताओ, भैया स्वास्थ्य पूछता है कि नहीं

हां, रोज शाम को कुछ देर पास बैठता है
नहीं भी कहती हूँ तो रोग समझ जाता है
कल दवाई लाकर दिया है
कि सोने से पहले याद से पी लूं
लेकिन बहू कभी-कभी डांट देती है
समय से नहाने में चूक जाती हूँ तब

अच्छा है
तुम वैसे सुधरोगी भी नहीं
ऐसे बेटे-बहू बड़े भाग्य से मिलते हैं
अब रखती हूं
कभी कोई दिक्कत हो तो जरूर कहना
प्रणाम

खूब खुश रहो बेटी

3. जागरण

मैं रात भर जगा रहा
और बारिश की बूंदों का बजना सुनता रहा
मैं रात भर इसके लिए नहीं जगा
कि मुझे नींद नहीं आई
नींद आती इससे पहले
बारिश आ गई और बूंदों ने बजना शुरू कर दिया
फिर नींद कैसे आती

मुझे लगता है कि मेरी नींद
बारिश में भींगकर वापस लौट गई होगी
या नहीं तो वो मेरी नींद थी
इसलिए कहीं ठहर कर संगीत में मग्न हो गई होगी
और मुझ तक आना भूल गई होगी

कल रात
रात भर बारिश होती रही
(अच्छा, इसे मैं ऐसे लिख देता हूँ)
कि कल रात, रात भर बूंदों का संगीत बजता रहा
कल रात बहुत सारी आंखों से नींद उड़ी रही

चूंकि मेरा घर टीन का एक छपरी है
टीन की छपरी पर बारिश की बूंदों का बजना अच्छा सधता है
आप कभी टीन की छपरी में सोएंगे तो आपको पता लगेगा
कि वहां से आवाज कितनी साफ सुनाई देती है
एक बार जब मैं सीमेंट की छत वाले घर में सोया था
तब भी रात भर बारिश हुई थी
लेकिन इस बात का पता गीली मिट्टी देखकर भोर लगा
मुझे तो अपने बचपन का भी याद है
कि फूस के घर पर गिरती बूंदें
धरती पर गिर कर जब भी धुन बजाती थीं
तभी पता चल जाता था

टीन के घर से
बारिश की बूंदों का बजना सुनने का यह फायदा है
कि वहां से आवाज बड़ी साफ आती है
एक फायदा यह भी है
कि इस घर को तोड़ना आसान है
और टूटे घर को फिर से बनाना भी

जब कभी बारिश की बूंदें
कई-कई दिनों तक संगीत बजाती ही रहती हैं
तब नदी जोश से भर जाती है
फिर उसमें हिलोर उठने लगते हैं
तब लगता है कि बारिश की बूंदें
नदी को उन्मत करने को ही बज रही थीं

जब भी कभी ऐसा होता है
घर दहलने लग जाता है

हम इसलिए टीन का घर बनाते हैं
और बूंदों के संगीत को साफ-साफ सुनने
रात-रात भर जगे रहते हैं

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