मिथिलेश कुमार राय की 5 कविताएं

मिथिलेश कुमार राय

24 अक्टूबर,1982 ई0 को बिहार में सुपौल जिले के छातापुर प्रखण्ड के लालपुर गांव में जन्म।

हिंदी साहित्य में स्नातक। सभी प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं व वेब पत्रिकाओं में कविताएं व (कुछ) कहानियाँ प्रकाशित।

वागर्थ व साहित्य अमृत की ओर से क्रमशः पद्य व गद्य लेखन के लिए पुरस्कृत। 

कहानी स्वरटोन पर ‘द इंडियन पोस्ट ग्रेजुएट’ नाम से फीचर फिल्म का निर्माण। 

पहला कविता-संकलन ‘आदमी बनने के क्रम में’ शीघ्र प्रकाश्य

कुछेक साल पत्रकारिता करने के बाद फिलवक्त ग्रामीण क्षेत्रों में अध्यापन।

संपर्क–
ग्राम व पोस्ट- लालपुर
वाया- सुरपत गंज
जिला- सुपौल (बिहार)
पिन-852 137  

फोन- 09546906392
ईमेल- mithileshray82@gmail. com

1. झूठ
    
उनसे जब मिलूंगा तो क्या कहूँगा
यह अभी से सोच लिया है
कहूँगा कि हाथ में कुछ आया तो था
लेकिन साथ ही एक आफत भी आ गई
उसी में फिर हार गया
आप भरोसा रखिए
जल्दी ही सब चुकता हो जायेगा

लेकिन अगर वह भी टकरा गया राह चलते
और पूछ लिया कि मिले नहीं 
तो उसे क्या जवाब दूंगा
कुछ भी कह दूंगा
जैसे कि सब छोड़-छाड़ कर बेटी के यहाँ भागना पड़ा
वह तकलीफ में आ गई थी
क्या करता अपना जाया है
देखा नहीं जाता
आपको यह सब बताने आज ही आता
कि अब सब ठीक है
जल्दी ही मिलूंगा आपसे
आगे कभी शिकायत का मौका नहीं दूंगा

किस-किस को कहता रहूँगा यह
कि पूरे साल खाऊँ
इतना भी नहीं मिला खेत से
कह भी दूंगा तो इससे उन्हें क्या
उन्हें तो अपना दिये से मतलब है

जैसे भी हो इसी अंकुरित दाने को दिखाकर
खींचना पड़ेगा जीवन
आगे जो होगा वह देखा जायेगा

2. साल

बेटा फागुन में आता लेकिन अगहन में ही लौट आया अचानक
फिर भी लगा कि परदेश से जहान की सारी खुशियां लौट आईं हैं
मगर क्या हुआ उसे कि देह पीला-पीला पड़ गया
उसकी भूख मर गई तो फिर किसे अच्छा लगता भोजन
बैंक में जमा था सात सौ रुपैया
गया तो बोला पांच सौ जमा ही रहेगा
दो सौ निकाल कर क्या कर लोगे

खेत में हरे धान के बिचड़े झूम रहे थे
लेकिन बहुत प्यारा होता है बेटा 
रहा बेटा तो खेत के कई टुकड़े अपने हो जाएंगे

कहाँ-कहाँ नहीं भटका
जिसने जहां सुझाया वहां दौड़ा
ऊपर से दुनिया कितनी सुन्दर दिखती है
भीतर से मगर यह सड़ गई है
सबने सुनाया इतना कि पैर के नीचे की जमीन खिसकती रही कई-कई बार
कई बार लगा ऐसा कि बेहोश होकर गिर जाऊंगा
और ऐसे ही किसी दिन मर जाऊंगा

अब क्या 
यह साल भी निकल गया दौड़ाते-धूपाते
हर एक दिन रहा वक्र
बेटी के हाथ के लिए
रंग पीला इस साल भी नहीं खरीद पाया
अब अगले साल पर रह गया है भरोसा 
पता नहीं वह भी क्या कुछ कर पाएगा

3. मालिक 

मालिक साफ-साफ कभी कुछ नहीं कहता
कि खूब सवेरे आओ
देर शाम तक रहो
और बीच में 
इस तरह दम न मारा करो

वो तो जब खैनी बनाने रुकता हूँ
या पेशाब करने उधर जाता हूँ
उनके चेहरे का भाव बदल जाता है

गुस्से में उनकी आँखें कैसी तो लाल हो जाती हैं
तब अगर वे कुछ बोलते हैं
उनकी बोली से सिर्फ कड़ुआहट ही टपकती है

तब यह समझना कौन सा मुश्किल काम है
कि मालिक क्या बोलना चाहते हैं

4. डर के बारे में नहीं

मुस्कुराहट के बारे में 
और नींद के बारे में सोचना था
खत के जवाब लिखने थे
और चाँद की शीतलता को महसूसना था

चाहे जिस ओर भी देखूं
आँखें हरियाली देखें 
पायल की रुनझून
और मीठी नींद में
सुनहरे सपने के बारे में सोचना था

भूख के बारे में 
रोटी के बारे में 
और रोजगार के बारे में तो कतई नहीं सोचना था
चेहरे पर एक रौनक होती है
आँखों में जो चमक होती है
सिर्फ उसके बारे में सोचना था

डर के बारे में बिलकुल नहीं सोचना था

5. विलाप

दुःख का साम्राज्य बहुत बड़ा है

यह एक बूढ़ी का वक्तव्य है
जो बोलती थीं तो लगता था 
कि गाढ़ा होकर दुःख ही बरस रहा है

दुःख सुनते हुए मैं लगातार भींग रहा था
उसी ने फिर सुखाया
सुख की बस कुछ यादें थीं उनके पास
जो आती थीं तो लगता था 
कि रौशनी आ गई है
कोई कुछ इस तरह आ गया है 
जो उसे आकर गुदगुदाता है 
और बदले में वह खिलखिलाने लगतीं हैं

सुख तो बस कुछ यादें हैं

यह भी उसी स्त्री का वक्तव्य है
जो दुःख से भींगकर जब थरथराने लगतीं
गांठ खोलतीं
और उसके थोथले मुँह हंसी से भर जाते

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