मोहन कुमार झा की 3 कविताएं

मोहन कुमार झा
अररिया, बिहार 
सम्प्रति अध्ययनरत् काशी हिन्दू विश्वविद्यालय 
मो. 7839045007
1. हारे हुए लोग
 
अच्छा होता है बेहतर चुनना
मगर उससे भी अच्छा होता है सबसे बेहतर चुनना
सिर्फ जीतने वाले नहीं
हारे हुए लोग भी अच्छे होते हैं।
 
ख्वाब बगैर नींद के भी देखी जा सकती है
आदमी को बनाया जा सकता है देवता
एक पल में खत्म हो सकता है सदियों का प्यार
कोई एक बात बदल सकती है पूरी जिन्दगी
 
एक झूठा भरोसा पहुँचा सकता है 
किसी को सूखी नदी के किनारे
एक सूखी नदी ले सकती है किसी प्यासे के प्राण
एक निर्णय तय कर सकता है मन में 
धृणा और प्रेम ।
 
धर्म तय करता है सम्मान
न्याय तय करता है अधिकार
एक दुनिया में सबकी दुनिया अलग-अलग 
मगर सबकी अलग-अलग दुनिया में
धर्म की ध्वजा एक
न्याय का रंग एक !
 
जीतने वालों में होती है 
सोने के जैसी चमक
मगर
हारे हुए लोगों में 
छिपा होता है पारस 
और उसकी पहचान मुश्किल से होती है।
 
2.  सृजन का मूल
 
पर्वत-शिखर पर पहुँचने वाले के मन में 
होना चाहिए 
ऊँचाई से गिरने का डर।
रेगिस्तान में चलने वालों को 
आना चाहिए 
रेतीली आंधी से बचने का तरीका।
समुन्दर में जाने वालों को 
समझ होनी चाहिए
हवाओं के रुख की।
 
प्रेम करने वालों को
ज्ञात होना चाहिए
घृणा का अर्थ
साथ रहने वालों को 
आना चाहिए
सहन करना वियोग की पीड़ा।
सर्वस्व अर्पित करने वालों को
त्याग देनी चाहिए
क्षुद्र प्रतिदान का अनर्थकारी मोह।
 
इस असीम संसार में
सबकी होती है एक सीमा
पर्वत 
समुद्र
रेत 
सब अपनी सीमा में।
 
परन्तु 
मनुष्य करता है अतिक्रम
अपनी सीमा का।
मनुष्य प्रेमी है 
प्रेम मूल है सृजन का।
मनुष्य अपराधी नहीं
सर्जक है
सौन्दर्य का ।
 
3. जो हम चाहते हैं
 
जैसे सब जाते हैं और लौटकर नहीं आते,
हम भी चले जाएंगे !
जैसे सब चुप हो जाते हैं और फिर कभी नहीं बोलते
हम भी चुप हो जाएंगे !
जैसे धीरे-धीरे आग ख़त्म हो जाती है और धुआँ बचा रहता है
हम भी ख़त्म हो जाएंगे !
 
उजालों में साज़िश बहुत होती है
इसलिए हम हो जाना चाहते हैं
गहरी अंधेरी रात !
फूलों को हार बनाकर बेच दिया जाता है बाज़ार में
इसलिए हम हो जाना चाहते हैं धूल
ईमानदारी छलावा बन गया है अब
इसलिए हम हो जाना चाहते हैं एक पवित्र गलती !
 
हम नहीं चाहते हैं एक अन्तहीन अन्तराल 
अपने अकृत्य अपराध के प्रायश्चित के लिए !
हम दया नहीं मांगते हैं 
हम याची हैं जीवन की अभिलाषा के !
 
हम चाहते हैं आना वापस 
नदियों-तालाबों के घोंघे होकर
हम चाहते हैं शरमाना रोज
छुईमुई के पौधे होकर
हम चाहते है जीना-मरना-जीना सदियों तक
हर बार मरकर जी उठने की कला सीखकर !

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