मुक्ता वेद की पांच कविताएं

  1. बोगनवेलिया

मौसम तो है ये
गुलाब गेंदा गुलदाउदी का
तो क्या?
उसकी यादों में लहराता
झूमता है बोगनवेलिया

चटख गुलाबी बोगनवेलिया
उसके घर की छज्जी पर
लहराता झूमता

निकलता था वो
गीले बालों को झटकता
खिले बोगनवेलिया की
आड़ से
पल भर ढूंढती उसकी आँखें
सामने की लॉन में किसी को

समय का अंतराल था
जाती थी अक्सर वो
बोगनवेलिया की आड़ से
ढूंढती उसकी आँखों को ढूंढने

मुंदी आखों से सोचती
क्या छज्जी पर अब भी होगा
उसके वही बोगनवेलिया
या लगाया होगा उसने
घर की छज्जी पर

खुश्बूदार मालती के लत्तर
उसके सुगंधरहित बोगनवेलिया
को उखाड़ कर

जब की थे वे भी चटख गुलाबी
रंग बिखेरते।

 

  1. गुनगुनाती कहानी

पसरी है, फैली है कहानियाँ
अपने साथ चारों ओर
कुछ मुंदी आँखों से दिखती
कुछ खुली आँखों के समक्ष

कुछ सुलझी कहानियाँ
कुछ अनसुलझी कहानियाँ
कुछ सबूझ कुछ अनबूझ
अनेक अनंत पात्र हैं ।

ठीक उस अनंत आकाश के तारों जैसे
ध्रुव तारा से लेकर सप्तऋषि तक
आकाश गंगा में फैले तारों जैसे
सब की अपनी अलग कहानी ।

टिमटिमाती हुई, मंद किन्तु प्रकाशवान
अँधेरे में लौ से पथ दिखाती
चलते समय को ।

इस पृथ्वी के विस्तार में
फैली अनंत अगोचर कहानियाँ
ढूंढते सभी , अपनी कहानी
इसी अनंत में, मुंदी आँखों से ।

खोज उसी कहानी की , जो चलता रहता
प्रति श्वास के साथ
सबकी वही कहानी

जो जीवित रहा,कुछ गिने दिन,
कुछ गिने पल ही ।

फिर विलीन हुआ, झंझावात में
कभी दृष्टि गोचर ना होने को
चलता रहता साँस दर साँस
सुलझी हुई, पर सबके द्वारा
अनसुलझी बनाते हुए ।

साँस के अंतिम छोर तक
वही कहानी
गांठदार होकर भी
गुनगुनाती हुई।

 

  1. नीम और मिश्री

    मिश्री की डली थी वो
    अब कहते सभी उसे
    नीम चिरैते सी कड़वी ।

मीठी रही या कड़वी?
कभी अपने एकांत में
पूछती है खुद से
उत्तर को तलाशती ।

याद है उसे , उन मीठे दिनों की
साथ थे उसके चौबिस घंटे
नृत्य की सभी मुद्राएं
रेडियो पर बजने वाले गीत
गुनगुनाते होंठों पर सजते हुए ।

अब प्रातः से संध्या तक
चलती दौड़ती घर सम्भालती
सभी नृत्य मुद्राएं अब
समाहित हैं इसी चलने और दौड़ने में ।

रेडियो के वो मनभावन गीत
बदल गए सुबह के मैथिली प्राती में
पूरे घर को जगाना है उसे इसी प्राती से ।

फिर भी कहती वो
मीठी हूँ , अब भी मिश्री की डली सी
सभी नृत्य मुद्रा प्रेम राग
गीत राग
अब भी हैं साथ उसके ।

सुप्त रात्रि में जगे हुए
उसके अर्धनिद्रा में
निशा रात्रि में मन उसका
अब भी गाता वही प्रेम राग ।

बस बदला है समय
है अब भी वह मिश्री की डली
सोते ऊँघते नीरव रात्रि में
और जगते दिन में
नीम चिरैते सी कड़वी।

 

  1. मन का पतझड़ बसंत

    सघन वन में बहने लगी
    फिर से पुरवाई
    ऋतु पतझड़ की फिर आई।

पलाश के सघन वन में
पत्रहीन सूखी नंगी डालियाँ
वन में सर्वत्र व्याप्त
उदासियाँ वीरानियाँ।

पत्तों के ढेर में
ढकी पड़ी पगडंडियां
लड़की पहचानती उस
ढके राह को।

सुबह दोपहर और शाम
वह रखती अपने पांव
उन सूखे पत्तों की चड़मराहट पर
यह ध्वनि भी मधुर थी उसके लिए।

कुछ ही अंतराल पर वसंत
का था आगमन
फिर भरेंगी डालियाँ
खिल उठेगा फिर पलाश।

सघन वन को लाल करते
जल उठेगा फिर से वन
पलाश के उस लाल रंग में।

गुथेंगे फिर से पलाश
जूड़े में उसके
पत्ते बनेंगें पुनः
कंठहार उसके।

निकलेगी फिर वो इस
दहकते वन में
पत्रहीन साफ दृष्टिगोचर
उन पगडंडियों पर।

वन के इस छोर से उस छोर तक
दिखता है प्रति बसंत में
वन के उस अंतिम छोर पर
चिर परिचित वही आकृति।

पुकारती पास बुलाती
प्रत्येक वर्ष पतझड़ और वसंत में
लड़की का मन है अब तक
पतझड़ और वसंत सा।

पलाश के उस वन सा
कभी उदास कभी वीरान
कभी पलाश के लाल रंग
सा दहकता
मन में पतझड़
बसंत को
हमेशा रखता।

 

  1. पँखरहित

तोता पंखी धूप
मन को उड़ाती तोते सा
कोहरा रहित ऊँचे आसमान
में

मन पर उड़ मत तोतापंखी
धूप में
तोते के पंख हैं
धूप अपना रंग बदले
और तू विहग अपने पंख
फैला उतरेगा सकुशल फिर
इस ज़मीन पर

और मन उड़ना जाने पंख रहित
उड़ेगा गर सतरंगी धूप में
ऊँचे नभ् में
सोच ले अपना अंजाम
कहीं धूप हुई तीखी

सह न सकेगा ताप
पँखरहित तो है तू
गिरेगा धरती पर
घायल विवर्ण रक्तरंजित

धूप हो तोतापंखी
सतरंगी
उड़ना छोड़
गर करना नहीं
अपना सर्वनाश।

 

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