मुक्तिबोध : सातवीं इन्द्री का औघड़ साधक

भरत प्रसाद

कुल आयु कुछ अधिक नहीं- महज 47 साल। मतलब नौजवानी से कुछ ही कदम आगे। पथ-प्रदर्शक आलोचना की विलक्षण मौलिकता लिए जीना, कविता की तीखी धार चमका-चमका कर महाबली कुसमय से लड़ने का हौसला बांधना और बित्ता भर की कलम के आगे अपने सुख, आनन्द, सुकून, शान्ति, स्वास्थ्य और जीवन को स्वाहा कर देना, कविता के इस औघड़ साधक का चिर स्थायी परिचय है। सृजन की प्रेरणा छायावाद से मिली, किन्तु अन्तर्दृष्टि को परिपक्वता मिली मार्क्सवाद से। सृजन की आरम्भिक यात्रा के बाद मार्क्सवाद से भी बढ़ने को कसमसाने लगे मुक्तिबोध- ‘मैं क्या न करूँ, क्या कर डालूँ’ की तर्ज पर। दरअसल वे रूकने, सुस्ताने, ठहरने और चूक जाने के लिए बने ही न थे। चक्रवात के मानिंद मस्तक में उमड़ती उनकी चिन्तनशीलता एक जगह ठहर जाने की छूट उन्हें नहीं देती थी। वे अपने अनुभवों के सहचर थे, अपनी अद्वितीय अनुभूतियों के अनुगामी, अपने बुद्धिसम्मत संकल्पों के सिपाही। इसीलिए बर्गसां, मार्क्सवाद को अपनाने, पचाने और आत्मसात करने के बावजूद मुक्तिबोध रूके नहीं, अपने अर्जित ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं हुए और न ही अपनी क्षमता पर आत्ममुग्धता की मुद्रा अख्तियार की बल्कि उम्र बढ़ने के साथ-साथ वे दसों दिशाओं में बिफरती बेचैनी के ज्वालामुखी का रूपक बन गये।

कुछ व्यक्ति परिभाषित होने, पहचान लिए जाने, समझ लिए जाने, सीमाबद्ध होने और व्याख्यायित हो जाने के लिए पैदा ही नहीं होते। ऐसी अपरिभाषेय प्रतिभाओं में कबीर, तुलसी और प्रेमचन्द के साथ मुक्तिबोध का भी नाम अग्रगण्य है। जीवन जीने का ढर्रा बेलीक, अपनों से आत्मीयता का अंदाज बेलीक, लबालब भावुकता की उफान बेलीक- मुक्तिबोध बेलीकी की अलख जगाने के लिए जन्मे थे। मुक्तिबोध ने आरम्भ की अपनी मुक्तियात्रा छायावादी भावोच्छवास के साथ, किन्तु व्याकुलता की तीक्ष्णता जनवादी योद्धा की तरह। अपने जन के सारे आंसुओं को पीने की प्यास कुछ इस कदर कि मुक्तिबोध महा जनवादी भक्त नजर आते हैं। तथ्य, सत्य, यथार्थ और दृश्य के मर्म में घुसपैठ लगाते-लगाते इतने, इतने गहरे उतर जाते हैं कि सामान्य मस्तिष्क की पकड़ में ही नहीं आते। वे छठीं नहीं, सातवीं इन्द्री के कवि हैं। उलझ-पुलझ कर लड़ते, गिरते, संभलते-दौड़ते मुक्तिबोध किसी दुर्गम मोर्चे पर अकेले लोहा लेते जिद्दी सैनिक हैं। मानो वे आज के वक्त में विपरीत समय से दो-दो हाथ करते खांटी ईमानदार, सीधे-सपाट, और भावुक खुद्दार इंसान का रूपक हों। मुक्तिबोध किले के मुख्यद्वार पर खड़े भारी-भरकम लोहे का दरवाजा हैं, सदियों से जमीन में धंसी हुई विशाल चट्टान, अपनी जादुई आकर्षण से रोमांचित करता कोई दुर्गम स्थली किला या फिर मन्द्र अन्तर्नाद में बेतरह उमड़ता करवटें बदलता समुद्र जो दिख कर भी नहीं दिखता, सुनाई पड़ते हुए भी समझ में नहीं आता, पास होते हुए भी छूट जान की ललक बनाये रखता है।

मुक्तिबोध के लिए स्वयं मुक्तिबोध ही पहेली थे। खोजने निकले खुद को और पहुँच गये कविता के महाद्वीप में। भाषा को छू दिया तो भाषा न भूतो न भविष्यति, की विलक्षणता में पहुँच गयी। अद्वितीय अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के लिए शैली को छुआ तो हिन्दी कविता के जटिलतम शैलीकार बन गये। उपमान, प्रतीक, बिम्ब, चित्र, मुहावरे, शब्द, संकेत- ऐसा क्या है जो मुक्तिबोध में जाना-पहचाना सा, रेडीमेड, पूर्व परिभाषित सा लगता हो। मुक्तिबोध-कंडीशन्ड पोएट थे, जोनल कवि, विलक्षण एहसासों में तपे-तपाए रचनाविष्ट सर्जक, जिसको रामविलास शर्मा जैसे बहुमुखी आलोचक भी न समझ सके और उन्हें मानसिक बीमारी का शिकार घोषित कर दिया। विलक्षण चेतना के नशे में डूबे रहना यदि कोई रोग है तो ऐसे बेमिसाल और बहुमूल्य रोग के सचमुच शिकर थे – मुक्तिबोध। काश ! यह रोग आधा-तिहाई भी हमारे समय के किसी कवि को लग जाता।
मुक्तिबोध सम्पन्नकर्ता हैं, हममें जोड़ते हैं, बहुत कुछ तोड़ते भी हैं, अन्तरात्मा को सींचते हैं, सड़ी-गली शरीर की पुनर्तराश करते हैं, मरी हुई आत्मा का पुनर्जागरण करते हैं, अपने इंसान होने का ज्वारीय विवेक पैदा करते हैं, चेतना का योद्धाकरण करते हैं और लौहसंकल्प की अग्नि प्रज्ज्वलित करते हैं। आज न मुक्तिबोध जीवित हैं, न वह समय, मगर नहीं- आज ही तो वे सबसे ज्यादा जिंदा हैं और उनका समय आज सबसे ज्यादा मौजूद है। उलझाऊ, जटिल, अबूझ, विकट, स्याह, रक्तवादी और प्रचंड ताकतवर समय। इसी मायावी समय से ही तो मोर्चा लेने के लिए मुक्तिबोध ने सारा जीवन जला-जलाकर भभकती मोम की तरह खुद को गला दिया।
यदि आज की साहित्यिक दशा पर एक नजर दौड़ायी जाय मानना पड़ेगा कि इस देश में कला और कलाकार का सम्मान तो हो रहा है, लेकिन कुछ लेन-देन या हानि-लाभ की गणित के साथ। वह रचनाकार जो साहित्य के इतिहास में नाम लिखाने की महत्वाकांक्षा से ग्रस्त हुए बिना एकाग्रचित होकर पूरी संवेदनशीलता के साथ सृजन कर रहा है, वह सम्मान उतना नहीं पा रहा है, जितना कि साहित्यिक-वादियों में घूम-टहलकर अपना कच्चा माल मीडिया या ‘कलम के बाजार’ में फेंक देने वाला। लिखने के लिए अपने सुविधाजनक भविष्य को भूल जाने वाले कुछ ऐसे भी उत्साहजीवी रचनाकार हैं जो इस दौरे के हानिकारक तंत्र को झेलते हुए भी सृजन कार्य में लगे हुए हैं। परन्तु हम और हमारा अधिकार प्रेमी समाज उन्हें ऐसी उदासीन सहानुभूति से देखता है – जैसे नौजवान-दल किसी साधु-सन्यासी को। यह सत्य है कि मनुष्य के शरीर में मस्तिष्क की जगह सबसे ऊपर है। इसी तरह इंसान को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि मस्तिष्क के मौलिक गुणों-चिन्तन, विवेक, तर्क और कल्पना का स्थान भी सर्वोपरि हो।

मुक्तिबोध जब अपने विचारों की शिराओं में एक से बढ़कर एक बीहड़ कारनामों को महसूस करते हुए लिख रहे थे, तब उनके भी सामने उपेक्षा, अपमान और ईर्ष्या की काली धुंध उठने लगी थी लेकिन वे अपने विवेक की शर्तों पर जीने वाले कलाकार थे। उनका आत्मघाती निष्कर्ष था कि सच्चा कलाकार खुद का दुश्मन होता है। वह अपनी आत्मशांति को जलाकर ही लेखक बना रह सकता है। मुक्तिबोध को भी वह तरकीब और अदाकारी ज्ञात थी, जिससे वे अपने और अपने परिवार को, बल्कि सगे-संबंधियों और अपनी आगामी पीढ़ियों तक को अकेले वैभवशाली बना सकते थे। लेकिन ऐसा तभी होता जब उनका सैंतालीस वर्षीय शहीदी जीवन किसी सौ वर्षीय कुबेर के जीवन से कम गौरवपूर्ण लगता। रचनाकार की पहली शर्त होती है- आत्यन्तिक की ईमानदारी। वह अपनी अतल संवेदनशीलता और निःस्वार्थी मस्तिष्क से जैसा सही या गलत महसूस करता है- रचना में वैसा ही प्रस्तुत करता है। इसके साथ ही वह खुद को उन्नत विचारों में ढालने की कोशिश भी करता है। मुक्तिबोध ने अपनी कविताओं में जैसी कठोरता प्रस्तुत की है, वैसी कठोरता उनके जीवन में भी थी। रचना में परिवर्तन लाने वाली शक्ति तभी आती है, जब रचनाकार सचमुच परिवर्तन का प्यासा हो। चिन्तन और चरित्र में जितनी ही प्रगाढ़ता होती है, रचना उतनी ही श्रेष्ठ बनती है। मुक्तिबोध की कविताओं में प्रश्नों का बवण्डर और सच्चाइयों की लू चलती है। जितनी व्यग्रता और कसक के साथ उन्होंने कविता को लिखा उससे एक बात साफ जाहिर होती है कि वे खिलाफत के लिए पैदा हुए थे। उनका सीधा वक्तव्य था कि आज के कलाकार उस जिंदगी को लिखने से भागते हैं, जिसे वह भोग रहे हैं। मानो वे कह रहे हों – रचनाकार निर्भीकता का शौकीन बनें। ‘संतन को कहाँ सीकरी सो काम’ वाली निडरता रचनाकार की ऊँची शर्त है। रचनाकार सर्वोच्च है- धन, ऐश्वर्य, अधिकार और बल में नहीं, बुद्धि’ चिंतन और बेहतर दुनिया की कल्पना में।
भौतिक सुख-सुविधायें और ऐश्वर्य में सहयोग करने वाली शक्तियाँ निश्चित रूप से चुम्बक की तरह खींचती हैं, लेकिन युग की बेहाल धड़कन को अपनी धड़कन में महसूस करने वाला रचनाकार इस खिंचाव का विरोधी होता है- क्योंकि यह शक्ति आम जनता की बहुमूल्य मेहनत को सोखकर जुटायी गयी संपत्ति से बनी होती है। संपत्ति से साहित्य की तनातनी इसलिए रहती है कि संपत्ति विचारों और मूल्यों की उपेक्षा पर आधारित होती है। और साहित्य विचारों और मूल्यों के सम्मान पर। विचारों का धन से कोई प्राकृतिक विरोध नहीं है, लेकिन मनुष्य जब सामान्य मानवीय विचारों पर झाड़ू मारक कूड़ा-करकट विचारों को जीवन में सजाने लगता है – तब साहित्य को उसकी मरम्मत के लिए तत्पर होना पड़ता है। मुक्तिबोध की सावधान करतीं कविताएं बिना थके-हारे या संकोच किए ऐसे ही मूर्ख बुद्धिमानों की नंगी तलाशी लेती हैं। उनकी कविताओं की खूबी व्यक्ति को सलोने रूप में पेश करने की नहीं,  उसके सलोने आडम्बर  को खुरदरे  और भद्दे रूप में पेश करने की है। यद्यपि बेहतरी की चाहत उनकी कविताओं में बहुत है, परन्तु यहाँ-वहाँ के बिगड़ाव को मिटा देने के बाद। वे सुधार की नसीहत देने वाली कविताएं नहीं हैं, बल्कि बनावटी सीधे को सचमुच में टेढ़ा बना देने वाली कविताएं हैं। ‘पाश’ के शब्दों में कहें तो इन कविताओं में भी बीच का रास्ता नहीं है। आम जनता के शब्दों में ये कविताएं – आर या पार की लड़ाई हैं। ऐसा सभी मानते हैं कि मुक्तिबोध की कविताएँ अलग तरह की हैं। कुछ ऐसा है जो विशेष जैसा लगता है, जिसे अब तक की काव्य-संस्कृति में नहीं देखा गया था। यह कुछ क्या है ? यह विशेष क्या हो सकता है ? मुक्तिबोध की कविताओं के प्रसंग में ये दोनेां सवाल प्रांसगिक लगते हैं। पहली सच्चाई तो यह कि उनकी कविताओं में कुछ नहीं, बहुत कुछ है। एक अर्थ में सब कुछ कि वह देखे और भोगे गये सच को रग-रग में महसूस करा देता है- संपूर्ण रहस्यमयता के साथ। इसके अलावा दर सच को पेश करने का अंदाज मुक्तिबोध का अलग है। उसको वे न तो सीधे दिखाते हैं, न सिर्फ प्रतीकों में, न बिम्बों में और न ही लुका-छिपा सा, बल्कि वह सच इन सबका मिला-जुला विस्तार होता है। उनकी कविताओं के अर्थ को अभी भी स्वाभाविक रूप में नहीं समझा जा सकता। उसके लिए हमें खुद में तनाव वाली मानसिकता का सृजन करना पड़ेगा। वे वस्तुतः अप्रत्याशित दशाओं की असाधारण कविताएं हैं। असाधारण सिर्फ इस अर्थ में नहीं कि वे कालजयी हैं, बल्कि इस अर्थ में भी कि कविता लिखने की स्वीकृत पद्धति से अलग है।
मुक्तिबोध वस्तुतः सच के प्रति अपने अनुभव को सबसे अलग अर्थ देना चाहते थे। वे शैली के सारे प्रचलित रास्तों को छोड़कर एक ही साथ सौ रास्तों पर चलना चाहते थे। यह उद्देश्य जीवन में तो पूरा नहीं हो सकता था, अतः कविताओं में ही अपनी प्रतिभा का विस्फोटक प्रयोग करते हुए एक साथ सैकड़ों अर्थवान मार्गों का निर्माण कर डाला। सिर्फ एक जटिल वास्तविकता का कोना-कोना ढूंढ़ लेने के लिए वे अपनी फैंटेसी, कल्पना, स्मृति इत्यादि रचनात्मक गुणों को जितने ऊँचे-नीचे और दूर तक दौड़ा सकते थे- दौड़ाया। उनके पास हतप्रभ कर देने वाली बिम्बात्मक कल्पना का अकूत भण्डार था। किसी एक घटना को अनेक बिम्बों में प्रस्तुत कर देने की बड़ी क्षमता उन्हें हासिल थी। उनकी कविताओं पर जटिलता का जो आरोप लगाया जाता है वह भाषा और शैली के कारण।
कोई रचना तब तक नहीं मरती, जब तक उसमें उठाए गये सवाल दुनिया से अपना उत्तर नहीं पा लेते। कबीर के मनभेदी दोहे हों, मीरा की टीस हो, प्रेमचन्द का कफन हो या निराला का भिक्षुक आज हमारे इर्द-गिर्द सवाल बन कर खड़े हैं। वह अपनी दुर्दशा का जबाव मांगती हैं। जब तक उन्हें हक नहीं मिल जाता, तब तक इनमें से कोई भी सवाल मरने वाला नहीं। मुक्तिबोध की कविताएं भी जबाव मांगती हैं। जब तक उन्हें हक नहीं मिल जाता तब तक इनमें से कोई भी सवाल मरने वाला नहीं। मुक्तिबोध की ‘अंधरे में’, ‘भविष्य-धारा’ और ‘इस नगरी में’ तीन ऐसी अर्थ बरसाने वाली कविताएं हैं- जो अपने समूचे बीहड़पन और कठोरता के साथ तब तक जीवित रहेंगी- जब तक जमाना उसका उत्तर देने में समर्थ नहीं हो जाता। अत्याधुनिक आदमी के बारे में यदि हम गंभीरता और मोहमुक्तता से विचार करें तो उसकी कई नयी प्रवृत्तियाँ उभरकर सामने आती हैं। दैनिक अखबारेां में छपी हिंसक घटनाओं, चोरी, जालसाजी और लूटपाट की खबरों को पढ़ने के बाद यह आशा ओझल होने लगती है कि आगामी युग में ऐसी घटनाओं का क्षेत्रफल कुछ कम होगा। अपने अपराधी ‘सुपुत्र को सुखी रखने के लिए शासक-प्रशासक वर्ग क्या कुछ नहीं करता।
मुक्तिबोध की दहशत पेश करने वाली कविताएं अब पाशविक हिंसा की घटनाओं के संदर्भ में बहुत प्रासंगिक की उठी हैं। बिहार और उत्तर प्रदेश में जनसंहार और गुण्डा शासन अब ऐसी वास्तविकताएं हैं, जो मुक्तिबोध की फैंटेसी को सच कर देती हैं। इतना सब होने के बावजूद हिन्दी साहित्य में मनहूसी आराम की थकावट इतनी ज्यादा है कि इन घटनाओं को चुनौती देने वाला कोई मुक्तिबोध नजर नहीं आता। मानव-मन के मशहूर कथाकार ‘जैनेन्द्र कुमार’। उनकी एक यादगार सूक्ति है कि ‘ज्ञान जानने में नहीं, बल्कि वैसा बनने में है।’ आज भी यह एक कड़ा और बड़ा सवाल है कि आखिर ज्ञान का मतलब क्या है ? इसे अमूल्य क्यों कहा गया ? क्या ज्ञानी होने के लिए ज्ञान प्राप्त कर लेना काफी है ? ज्ञान वस्तुतः व्यक्तित्व के परिष्कार का सूत्र है। लेकिन ज्ञान सीखने वाले मुख्यतः तीन तरह के होते हैं। एक वे जो उसका उपयोग अपनी सामान्य जिंदगी की जरूरतों के लिए करते हैं। दूसरा वे जो ज्ञान का उपयोग अपने बहुमुखी विकास के लिए करते हैं, और तीसरे वे जो ज्ञान को व्यवहार एवं आचरण का रूप देते हैं। इनमें से पहले और दूसरे प्रकार के लोग बेहिसाब जनसंख्या के हैं। ऐसे सज्जन इस देश में यत्र-तत्र-सर्वत्र मिल जायेंगे। लेकिन तीसरे प्रकार के बुद्धिमान इस देश की मिट्टी में दबे हुए ऐसे दुलर्भ तत्व हैं जो कहीं-कहीं तो हैं, लेकिन जमाने की गरम हवा के कारण उनके उगने की उम्मीद बहुत कम नजर आती है।

मुक्तिबोध की चिंतन शैली आदिम प्रकृति के रहस्यमय अस्तित्व की तरह है, जो हतप्रभ करती है, रोमांच भरती है, सम्मोहित करती है, साथ ही डराती, कंपाती और असहज भी बना देती है। अपनी गांठों, उलझनों, अनिर्णयों, जटिलताओं और अलक्षित भावनाओं को लिए-दिए उतर पड़े मुक्तिबोध  सृजन की युद्ध भूमि में । काटना,  छांटना, गढ़ना, तराशना और अविरल कल्पना प्रवाह में कविता को बहा देना मुक्तिबोध ने अपने ही अंदाज में सीखा था। इसीलिए बने-बनाए पैटर्न पर उनकी कविताएं सुगठित हो जाने से विद्रोह करती हैं। उनका अपरिभाषेय कवि न समय के प्रति, न आम या खास पाठक के प्रति, न ही साहित्य के प्रति जबावदेह है, बल्कि वे अपनी स्वयंभू प्रतिभा और अभिनव चिंतन में सुलगते-धधकते व्यक्तित्व के प्रति अंतिम रूप से जबावदेह हैं। वे कविता का स्थापत्य वर्तमान साहित्य के लिए नहीं खड़ा कर रहे थे। उनका स्थापत्य कविता की कसौटियों को चुनौती देता है, ढांचे में बंधने से इंकार करता है और चेतना की बेहद्दी में उठने को आमंत्रित करता है। उनकी सारी रचनात्मकता का रहस्य विकट कल्पनाशीलता के अनहदपन में छिपा हुआ है। इस क्षेत्र में वे छायावादी महाकवियों से भी दो कदम आगे निकलते नजर आते हैं। फैंटेसी कल्पनाशक्ति की कसौटी है, बल्कि हद्द कहिए। अपनी मानवीय कल्पनाशक्ति के सत् को निचोड़ डाला इस फैंटेसी के औघड़ साधक ने। निहितार्थ की तहों में धंसे तो अंत कर डाला उतरने का, अर्थ की संभावनाओं को खेाजने उड़े तो दिशाओं को रौंद डाला और अनुभूतियों के समुद्र में डूबे तो दुस्साहसिक गोताखोर की तरह एक से बढ़कर एक मोती लेकर बाहर निकले। अपनी सैकड़ों व्याख्याओं के बावजूद मुक्तिबोध की कविताएं अलक्षित रह जाने वाली मोहक चुनौतियां हैं। आम जन की वेदना में आकंठ डूबी होकर भी, उनकी समझ से हजारों कदम दूर। इसे मुक्तिबोध के कद का अधूरापन कहें या उनकी स्थायी दुर्बलता – वे अपने आम पाठकों की पहुँच से सदैव दूर रहीं और आगे भी रहेंगी। कई बार इन कविताओं का अर्थ समझ में नहीं आता, भावों का ठीक-ठीक पता नहीं चलता और मर्म उलझ-पुलझकर रह जाता है, बावजूद इसके कविताओं की अन्तध्र्वनि कुछ इस तरह कानों में गूंजती है, अर्थों की भंगिमा कुछ ऐसी मन को भाती है, लय की सुगंध चित्त पर ऐसा नशा करती है कि कविता रत्ती भर समझ में न आती हुई भी, बुद्धि-विवेक पर गहरा और असीम असर छोड़ती है- रहस्यवादी साधक की अलौकिक वाणी की तरह।
भरत प्रसाद
एसोसिएट प्रोफेसर, हिन्दी विभाग
पूर्वोत्तर पर्वतीय विश्वविद्यालय
शिलांग – 793022 (मेघालय)
मो. 9863076138

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फोटो : छत्तीसगढ़ में मुक्तिबोध पुस्तक के कवर पेज से साभार

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