मुसाफ़िर बैठा की चार कविताएं

पिता की निर्ब्याज याद

बचपन में गुजर गए पिता की

याद का कोई ठोस मूलधन भी

नहीं है मेरे पास

जिस पर

यादों का कोई ब्याज

जोड़-अरज पाऊं मैं

 

पिता के बारे में अलबत्ता

मां के बयानों को कूट-छांटकर

मेरे मन ने

जो इक छवि गढ़ी है पिता की

उसमें पिता का

जो अक्स उभरता है झक भोरा

उस हिसाब से

उन जैसों के लिए

इस सयानी दुनिया का कोई सांचा

कतई फिट नहीं बैठता

जहां वे रह-गुजर कर सकते

 

मां की कभी भूल से भी

पिता की डांट-डपट खाने की

हसरत नहीं हो पाई पूरी

और मेरा बाल-सुलभ अधिकार

जो बनता था

पिता की डांट-धमक का

चेतक धन पाने का

उसके दैनिक हिसाब का एक हर्फ भी

नहीं लिख सके थे पिता मेरे नाम

और इस मोर्चे पर

साफ कर्तव्यच्युत सा रह गये थे वे

 

अब जबकि

मेरी डांट-धमक से

मेरे बच्चों की दैनन्दिनी

और पत्नी की

अनियतकालिक बही-खाते के पन्नों को

भरा-पूरा देखती हैं

मेरी जर्जर काय स्मृतिपूरित पचासी वर्षीया मां

तो उनका हिय जुरा जाता है

 

मानो उस डायरी और बही-खाते के

हर एक अक्षर का

खुद भी एक हिस्सा बन गई हों वे।

 

मां की आंखों में पिता

मेरी अभी की बत्तीसा वय में

पिता से टूट चुका था

मेरा दुनियावी नाता

जबकि अपने छहसाला पुत्र की उम्र में

मैं रहा होऊंगा तब

 

अब तो पिता के चेहरे का

एक कोना तक याद नहीं मुझको

नहीं स्मरण आता मुझे

पिता का कहा बोला एक भी हर्फ

बरता हुआ कोई बात व्यवहार

जो मेरे प्रति उनके भाव स्वभाव

डांच-पुचकार, हंसी-दिल्लगी, रोष-प्रीति के

इजहार का एक कतरा सबूत भी जुटा पाता

और मैं अपनी नन्हीं जान संतान की

कम से कम उस हठ प्रश्न की आमद से

अपना पिंड छुड़ाने की खातिर उन्हें परोस पाता

कि तुम्हारे दादा ऐसे थे वैसे थे

कि कैसे थे

 

पिता के बारे में

मेरी यादों के रिक्थ का

सर्वथा रिक्त रह जाने का

खूब पता है

मेरी उम्र जर्जर मां को

जिसके खुद के कितने ही मान अरमान

दुनियादारी के मोर्चे पर

विफल रह गए पिता के

असमय ही हतगति होने से

रह गए थे

कोरे अधपूरे अनपूरे

और अनकहे तक

 

कहती है मां

तुम्हारे पिता तो

नादान की हद तक थे भोले

उन्हें तो अपने बच्चों तक पर

प्यार लुटाना नहीं आता था

मेरे मन में झांक पाने की

बात तो कुछ और है

 

मेरी मूंछों से

अपनी मां की स्नेहिल मौजूदगी में

खेलते चुहल शरारत करते

अपने पोते को देखकर

मेरे पिता के चेहरे को

मुझमें ढूंढ़ती शायद

कहीं और खो जाती है बरबस मां

बाप बन अब मैं समझ सकता हूं खूब

कि मुझ बाप बेटे का

राग रंग हंसी दिल्लगी निरखना

मां को बहुत प्यारा अपना ही रूपक सा

क्यूंकर लगता है।

 

मां का अछोर आंचल

मां की जननी नजरों में

कभी वयस्क बुद्धि नहीं होता बेटा

मां के प्यार में इतनी ठहरी बौनी

रह जाती है बेटे की उम्र कि

अपने साठसाला पुत्र को भी मां

घर से विदा करने के वक्त

लगा देती है दिठौना

लेती है बलइयां

ताकि उसे किसी की नजर न लगे

टोकरी भर हिदायतें

थमा जाती है उसे ऐसे

मानो कोई दूधपीता बच्चा ही हो अभी वह

 

कहती है ऐसी ऐसी बात कि

अन्यथा वो हंसी करने लायक बात होती

कि बेटे सावधानी से

गाड़ी-घोड़े में चढ़ना उतरना

बरतना सड़क पार करने में अतिरिक्त सावधानी

आगे पीछे दायें बायें मुड़ देख कर

हो लेना इत्मीनान

खूब मेरे लाल

ताकि छू न पाए

किसी अशुभ अचाहे का

कोई कोना रेशा भी तुझे

 

मां की आंखों से

गर दूर जाता हो बेटा

तो आंख भर देखकर भी

नहीं भरता उसका ममता स्नात मन

और बेटे से एक पल की दूरी

उसे सौ योजन समान लगने लगती है

और ममता की सघन आंच लिए

आंखें बिछी रहती हैं उसकी लगातार

अपने जिगर के टुकड़े द्वारा तय की राहों में

बिना कोई खरोंच लगे वापस उसे पाने तक

 

अपने अनुभवों की

मानो सारी उम्र उलीच

झूठ-सच, बुरा-भला, अकर्तव्य-कर्तव्य का

पूरा पाठ पढ़ा

कालिदास ही बना देना चाहती है मां

अपनी आंखों से ओझल होते

पुत्र को उसी वक्त

जबकि दुनिया से

खूब दो चार हो चुका होता है वह तब तक

 

नाती पोते के वैभव से

हरियर पुत्र को भी

मां की यह हिदायत होती है आयद

कि परदेस जाते हो बेटा तो

दो बातों का गठरी में बांधकर रखना खयाल

जीभ और जुबान पर

हमेशा लगाए रखना लगाम

कि इन्हीं दो बातों का

टंटा है सारी दुनियाजहान में

यही मुंह खिलाता है पान

यही मुंह लात

 

मां हो जाए

लाख बूढ़ी जर्जरकाय कार्यअक्षम

बेटे की खातिर वह

बर्तन छुए बिना नहीं रह सकती

नहीं पा सकता पुत्र

नवविवाहिता पत्नी से भी

दाल औ कढ़ी बरी में

वह अन्तस् की छौंक व महक

जो मां की जननी हाथों की

छुअन में होती है

 

मां चाहती है कि

उसके बेटे का दामन भरा रहे सदा

खुशियों के अघट घट से

और उसके दुख दर्दां की बलइयां लें

खुद नीलकंठ बन वह

बेटे के सुख सुकून की निगहबानी कर

अपना हिय सतत जुराती रहे

 

बाकी सारे प्यार में कुछ न कुछ मांग है

मां के निर्बंध प्यार में सिर्फ दान ही दान है।

 

जननी- हाथ

 

शरीर से बीत चुकी माँ
मेरे शरीर के आकार लेने से
अपने शरीर के बीतने तक
लगातार अपनी सतर्क चिंताओं से
करती रही है निगहबानी
अपनी इस संतान की

माँ होने का यह मतलब
बिलकुल एकतरफ है

अकेला है, अनूठा है

एक माँ जो मेरे बच्चों की है
वह लगातार है उनके औ मेरे साथ
अब अपनी संतान के
अपनी माँ के प्रति लाड़- प्यार को
जब देखता होता हूँ
तो अपनी माँ को
साथ न पाने के ऐहसास में
गहरी सांसें भरता
माँ की सामने टंगी तस्वीरों में
कसक भरी चुप्पी से अपनी आँखें
टिका देता हूँ
का देखता हूँ बरबस कई बार

तस्वीरों की माँ तब
जिन्दा लगती होती है साबुत
सहलता होता है अधेड़ वय माथा मेरा
निकल आते हैं फोटू से बेसाख्ता
ममत्व में पगे जननी- हाथ

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