मुसाफ़िर बैठा की दो कविताएँ

फिर भी आधुनिक

 

आप अपने घरों में

छत्तीस कोटि मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना

आपस में छत्तीसी रिश्ता बरतने वाले

देव अराधना में आकंठ डूबे-तैरें

स्वार्थ कर्म में पड़कर

स्वकर्म-धर्म छोड़

उनके जूते चाटें तलवे सहलाएं

आप फिर भी आधुनिक

 

कथित रामराज्य की शंबूक प्रताड़ना

औ कृष्ण काल के एकलव्य प्रति

द्रोणछल को बखूबी

अपनी सामंती मानसिकता में

आप अब भी सहलाएं पुचकारें

दलितों के प्रति वही पूर्वग्रही पुरा-सोच सम्हालें

आप फिर भी आधुनिक

 

आप लोकतंत्री न्यायी होकर भी भंवरी-न्याय सुनाए

और मानवता की परिभाषा भूल जाएं

किसी अवयस्क ब्राह्मण पुत्र को देव मानकर

उसकी चरण-बंदगी पर उतर जाएं

आप जज की कुर्सी पर बिराजकर भी

योर आनर मी लार्ड जैसे

रैयतग्राही एवं सामंती सुख संबोधन को

इस आधुनिक वैज्ञानिक समय में भी

बेहिचक निगलें पचाएं

आप फिर भी आधुनिक

 

आप आदमी आदमी में भेद रचे

रचे भेद को तादम नित गहरा बनाये

इस भेद रोटी को सेंक सेंक कर

सामाजिक वर्चस्व का समूचा श्रीफल

बिना डकारे ही खा जाएं

खा खाकर बेशर्मी से फूलें अघाएं

और दलितों को हक-अधिकार से

वंचित रख जाएं

आप फिर भी आधुनिक

 

आप दिल-दिमाग में रख छत्तीस का रिश्ता

पशु-पक्षी जड़-जाहिल को भी देव मान अराधे

आप श्वानों को भी अपनी गोद में थामें

चूमें-चाटें उन पर बेहिसाब प्यार लुटाएं

पर दलितों पर झज्जर-दुलीना बरपाने की

हद नीचता दिखलाने से बाज न आए

आप फिर भी आधुनिक

 

आप दुनिया का हर आधुनिक ठाट अपनाना चाहें

पर स्मृति-रामायण की कूप मानसिकता

और बाट न हरगिज छोड़ें

तन पर चढ़ जाएं लाख लिबास आधुनिक

मन को आपके

एक कतरा भी आधुनिकता न सुहाए

मनु-रक्त ही दौड़े आपकी रग-रग में रह रह

आप फिर भी आधुनिक

 

आप आधुनिकता को

जाने-अनजाने समझना न चाहें

आधुनिकता की राह में

लाख रोड़े अटकाएं

आधुनिक सोच को दिखाएं खूब अंगूठा

आपके अमानुष सोच के बजबजाते कूड़े-कचरे से

चाहे आए आधुनिकता की नकली खुशबू

आप फिर भी आधुनिक!

 मैं उनके मंदिर गया था

उस दिन
मैं उनके मंदिर गया था
चाहा था अपने ईश की पूजा-अभ्यर्थना करना
मंदिर द्वार पर ही मुझे धो दिया उन्होंने
लत्तम-जुत्तम कर अधमरा कर दिया

मेरी धुलाई का प्रसंग स्पष्ट किया-
गंदे नाली के कीड़े
गांधी ने हरिजन क्या कह दिया
दौड़े चले आये हमारी देवी मॉं के यहॉं
अपनी गंदगी फैलाने
किसी के कह देने भर से
लगे हमारी तरह के हरिजन बनने का स्वप्न देखने

मुझे क्या था मालूम
कि हरि पर तो कुछेक प्रभुजन का ही अधिकार है
और इस देवी मंदिर को
ऐसे ही प्रभुजनों ने
अपनी खातिर सुरक्षित कर कब्जा रखा था

मेरे अंतर्मन ने ईश्वर के बौनेपन का साक्षात्कार किया
और आप-ही-आप सवाल किया
फ्लैश बैक में कुछ टोहने टटोलने लगा
विद्या की देवी सरस्वती
धन की लक्ष्मी
हमारे तैंतीस करोड़ देव-देवियों का हुजूम
अब सौ करोड़ भारतीयों में एक देव के हिस्से
अमूमन तीन आदमी का सुरक्षा दायित्व
बल्कि विधर्मियों, ईश-उदासीनों की संख्या
को घटाकर और भी कम लोगों का
फिर भी हम रहे सदियों
विद्या वंचित अकिंचन धनहीन
क्यों कर पाता कोई हमारा
हक, हिस्सा और स्वत्व ले छीन

क्या यह एक सवाल हो सकता है
कि औरों से मुंह फेरे जो ईश्वर
समाज-सत्ता संचालकों के घर जा बैठता है
ईश्वर उनका ही परिकल्पित-मनोकामित
उनके ही गुणसूत्रों का धारक
कोई अनगढ़ अन्यमनस्क पैदावार तो नहीं

हमीं में से जो लोग
ईश्वर की सत्ता शक्ति लौट आने के इंतजार में हैं
इंतजार की अनगिन घड़िया गिनते रहें
फिर जाएं मंदिर
पाते रहें प्रसाद ईश-प्रीत के
मैं तो अब महसूस गया हूं
कि दरहकीकत यह कमबख्त ईश्वरीय सत्ता ही
प्रभुवर्ग की प्रभुता का सबब है
और हमारी अशक्यता, हमारे पराभव का कारक भी
अब हमें किसी गैरदुनियावी, अलौकिक
शक्ति सहायता की दरकार नहीं
किसी का इंतजार नहीं करना
अपने बाजुओं का ही अहरह भरोसा है

 

 

 

 

 

आत्मवृत्त

जन्म तिथि – 05 जून, 1968 (शैक्षिक प्रमाण-पत्रों में दर्ज, यकीनी बिल्कुल नहीं)

पारिवारिक पृष्ठभूमि – बिहार प्रांत के सीतामढ़ी जिले के गांव, बंगराहा में एक कबीरपंथी दलित भूमिहीन परिवार  में जन्म।

पढ़ाई लिखाई  -पटना विश्वविद्यालय से हिन्दी दलित आत्मकथा विषय में पी-एच. डी.

नौकरी -अभी गृह सूबे की राजधानी स्थित एक सरकारी संस्था की प्रकाशन शाखा में। पूर्व में इसी प्रांत के बैंक तथा शिक्षा एवं सहकारिता विभाग में

रचनाकर्म –  कविताएं, लघुकथाएं, कहानियां, आलेख, निबंध, समीक्षा, अनुवाद, रपट, सामयिक टिप्पणियां इत्यादि

हंस, कथादेश, आलोचना, नया ज्ञानोदय, कादंबिनी, वर्तमान साहित्य, समकालीन जनमत, पाखी,

जनविकल्प, युद्धरत आम आदमी, अपेक्षा, दलित साहित्य, बयान, संवेद, साक्ष्य, आज, हिन्दुस्तान,

प्रभात खबर, प्रतियोगिता दर्पण जैसे प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित

सम्मान & पुरस्कार – बिहार राष्ट्रभाषा परिषद् का नवोदित साहित्यकार पुरस्कार

– कादंबिनी एवं प्रतियोगिता दर्पण द्वारा आयोजित अखिल भारतीय प्रतियोगिताओं में

कतिपय आलेखों & निबंधों को प्रथम व उल्लेखनीय स्थान प्राप्त

संपर्क – बसंती निवास, प्रेम भवन के पीछे, दुर्गा आश्रम गली, शेखपुरा

डाकघर – वेटेरिनरी कालेज, शेखपुरा, पटना, बिहार, पिन-800014

-मोबाइल-09835045947

ईमेल – musafirpatna@gmail.com

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